लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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– विजय कुमार

अस्पृश्यता, जातिभेद तथा ऊंचनीच हिंदू परंपरा का अंग नहीं हैं। उक्त बीमारियां मुसलमान आक्रांताओं की देन हैं जिन्हें अंग्रेजों ने अपने हित के लिए खूब हवा दी। इस विचार को समाज में स्थापित कर समरसता अभियान को नयी दिशा देने वाले श्री रामफल सिंह का जन्म ग्राम मऊ मयचक (अमरोहा, उ.प्र.) में अगस्त, 1934 में श्री दलसिंह के घर में हुआ था।

अपनी शिक्षा पूर्ण कर वे अध्यापक बन गये। इस दौरान उनका संपर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और श्री अशोक सिंहल से हुआ। संघ से प्रभावित होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी और प्रचारक बन गये। सहारनपुर, रुड़की, बाराबंकी, फर्रूखाबाद, कानपुर आदि में संघ कार्य करने के बाद उन्हें हिमाचल प्रदेश का संभाग प्रचारक बनाया गया। वहां उन्होंने छह वर्षों तक कार्य किया।

1991 में उन्हें विश्व हिन्दू परिषद के कार्य में भेजा गया। प्रारंभ में वे उ0प्र0 एवं मध्य प्रदेश के संगठन मंत्री रहे। उनकी संगठन क्षमता के कारण श्री रामजन्मभूमि आंदोलन में इन राज्यों के रामभक्तों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। उनके तर्कपूर्ण भाषण युवकों के हृदय उद्वेलित कर देते थे। कुछ वर्ष बाद उन्हें विश्व हिन्दू परिषद का केन्द्रीय मंत्री और सामाजिक समरसता आयाम का प्रमुख बनाकर दिल्ली बुला लिया गया। यह काम कुछ अलग प्रकार का था। निर्धन, निर्बल, वनवासियों, वंचित जातियों, जनजातियों को सेवा कार्य द्वारा समाज की मुख्यधारा में लाना इसका एक पहलू था; पर रामफल जी का ध्यान इसके दूसरे पहलू पर गया और वे इस बारे में शोध व अध्ययन करने लगे।

शोध के दौरान उनके ध्यान में आया कि हिंदू समाज के जिन वर्गों को अस्पृश्य या निम्न माना जाता है वे सब वस्तुतः क्षत्रिय हैं। इन्होंने ही मुगल आक्रमणों को अपने सीने और तलवारों पर झेला था। युद्ध में सफल होकर मुगलों ने व्यापक धर्मांतरण किया। धर्मांतरित लोगों को धन, धरती और दरबार में ऊंचा स्थान दिया गया, पर जिन्होंने किसी भी लालच, भय और दबाव के बावजूद अपना धर्म नहीं छोड़ा, उनके घर, दुकान और खेती की जमीनें छीन ली गयीं। उन्हें मानव मल साफ करने जैसा गंदा काम करने और गांव से बाहर रहने को मजबूर किया गया। सैकड़ों साल तक, पीढ़ी दर पीढ़ी यही काम करते रहने से वे हिंदू समाज की मुख्य धारा से कट गये। उनकी आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक स्थिति खराब हो गयी। लोग उन्हें हीन मानकर उनसे दूर रहने लगे। इसी में से फिर छुआछूत और अस्पृश्यता का जन्म हुआ।

रामफल जी ने इन तथ्यों के आधार पर अनेक पुस्तकें लिखीं। ‘छुआछूत गुलामी की देन है’, आदिवासी या जनजाति नहीं, ‘ये हैं मध्यकालीन स्वतंत्रता सेनानी’, ‘सिद्ध संत गुरू रविदास’, ‘प्रखर राष्ट्रभक्त डॉ. भीमराव अम्बेडकर’, ‘समरसता के सूत्र’, ‘घर के दरवाजे बन्द क्यों’, ‘सोमनाथ से अयोध्या-मथुरा-काशी’ और ‘मध्यकालीन धर्मयोध्दा’ उनकी बहुचर्चित कृतियां हैं। उन्होंने अध्ययनशील लोगों को इस विषय में और अधिक शोध के लिए प्रेरित भी किया।

इसके लिए उन्होंने देश भर में प्रवास कर सभी राज्यों में इन जातियों, जनजातियों के इतिहास को उजागर किया। इससे इन वर्गों का खोया आत्मविश्वास वापस आया। उनमें नयी चेतना जाग्रत हुई तथा कार्यकर्ताओं को बहुत सहयोग मिला। लगातार प्रवास से उनके यकृत (लीवर) में कई तरह के रोग उभर आये। काफी इलाज के बाद भी वे नियंत्रित नहीं हो सके और 9 जून, 2010 को दिल्ली के एक चिकित्सालय में उनका शरीरांत हुआ।

समरसता के काम में उनके मौलिक चिंतन, अध्ययन और शोध से जो नये अध्याय जुड़े वे आज भी सबके लिए दिशा सूचक एवं प्रेरक हैं।

* लेखक समाजसेवी तथा ‘राष्ट्रधर्म’ के सह संपादक रह चुके हैं।

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9 Comments on "रामफल सिंह : समरसता के नव संशोधक"

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Vijay Madal
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आलेख में दम है. बेबाकी भी. आज जातिवाद को तोड़ने में रामफल जी जैसे लोगो की जरूरत है. इसी में सबका भला है–चाहे कथित सवर्ण हो या कथित दलित.

Jeet Bhargava
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रामफल जी काम स्तुत्य है. उनके विचारों और कार्यो को जानकार खुशी हुई. दर असल देश में एक तबका नहीं चाहता की हिन्दू समाज में समरसता आये. वह खुद को जनवादी, प्रगतीशील, मानवाधिकारवादी और सेकुलर कहता है लेकिन हिन्दू समाज में विभाजन करके अपनी दूकान चलाता है. वह दलित उत्थान , दलित विमर्श और दलित चेतना जैसे लुभावने नारे देते हुए चर्च और विदेश से पैसा पाता है. वह हर कीमत पर हिंदुत्व और तथाकथित सवर्णों को गाली देने को ही दलित-उत्थान मानता है. वह यह दुष्प्रचार करता है की संघ-भाजपा आदि सवर्णवादी और दलित विरोधी है. इन दलित मसीहाओ… Read more »
डॉ. राजेश कपूर
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गांधी जी ने कहा था की चुन-चुन कर भारत की बुराईयों का वर्णन करने की मानसिकता वाले भारत के गटर इंस्पेक्टर हैं. हर देश और समाज में अछाईयाँ और बुराईयाँ होती हैं पर हमारे देश में कुछ ऐसे लोग हैं की जिन्हें भारत की प्रशंसा बर्दाश्त ही नहीं होती. वे भारत को बुरा कहने के लिए बड़े कमीटिड हैं. ऐसा क्यों ? इसका जवाब वे स्वयं दें तो अधिक अछा है. क्यों उन्हें अपने देश की अछाईयाँ नज़र ही नहीं आतीं. क्या यह कोई मानसिक , मनोवैज्ञानिक रोग है? अपनी माँ, अपने देश, अपनी संस्कृती की प्रशंसा और गौरव करने… Read more »
Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'
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Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'
आदरणीय डॉ. कपूर साहब, यहाँ पर और अन्य अनेक स्थानों पर आपकी टिप्पणियों को पढकर ऐसा लगने लगा है कि आपको भारत के इतिहास, वर्णव्यवस्था और जातिव्यवस्था, दमितों का शोषण और छुआछूत जैसी सच्चाईयों में तनिक भी विश्वास नहीं है। आपके विचारों से लगता है कि ये सब बातें हवाई बातें हैं, जिनका हिन्दू समाज में न तो कभी अस्तित्व था और न ही वर्तमान में है और यदि कहीं था भी तो वह मुसलमानों या अंग्रेजों का कियाधरा है। इसमें हिन्दुओं का कोई दोष नहीं। यही नहीं आपके समक्ष ऐतिहासिक तथ्य प्रस्तुत करने वाले को आप मानसिक रूप से… Read more »
दीपा शर्मा
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aap ne to kamal kar diya, swami dyanad, swami vivekanad bhagat singh ko hi galat tehra diya, aajkal to sangh bhi bhagat singh ji ke gun ga raha hai pata nahi ye chuk aapse kese ho gai hai, mujhe to lagta hai aap aatmmugdta ke shikaar ho rahen hain, thodha sochkar comment likhen rajesh kapoor ji……… aapke liye dil se shubhkaamnayen

Anil Sehgal
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Vishwa Hindu Parishad may please consider establishing a Chair – position of professorship in an appropriate university in the name of Shri Ramphal Singh Ji for research on untouchables and caste in Hindu society to carry forward research of Ramphalji.

दीपा शर्मा
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महोदय, इसके अतिरिक्त इन को भी देखिये,,,,,,,,,,,,,,, 16 खंडों में प्रकाशित धर्मकोश के संपादक और 1951 में पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के प्रथम प्रधान पुरोहित जोशी जी अपनी चर्चित कृति वैदिक संस्कृति के विकास में लिखते हैं- वर्णपरिवर्तन की क्रिया के शिथिल पड़ने तथा अंत में रुक जाने की वजह से जातिभेद की नींव डाली गई। परिवर्तन की क्रिया के अवरोध का एक महत्वपूर्ण आर्थिक कारण भी है। यह है ग्राम संस्था के पोषक ग्रामोद्योगों की वंश परंपरा से चली आनेवाली स्थिरता। सिंधु संस्कृति के विध्वंश के उपरांत भारतवर्ष में नगर संस्कृति को प्रधानता किसी भी समय न मिली। ग्राम अथवा… Read more »
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