लेखक परिचय

शिवदेव आर्य

शिवदेव आर्य

आर्ष-ज्योतिः मासिक द्विभाषीय शोधपत्रिका के सम्पादक

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शिवदेव आर्य

संसार के विभिन्न क्रियाकलापों को देखकर बड़ा आश्चर्य होता है। चित्र-विचित्र इस संसार में परिस्थितियों को देख ऐसा लगता है कि शायद परिस्थितियां पहले से ही विद्यमान है और मनुष्य समाज इन परिस्थितियों का मात्र अनुसरण कर रहा है। कभी ऐसा भी प्रतित होता है कि परिस्थितियों का निर्माण स्वयं मनुष्य करते हैं।

परिस्थितियों के अनुरूप चलने वालों में अच्छे तथा बुरे दोनों प्रकार के लोग होते हैं। परिस्थितियों का निर्माण करने वाले बड़े विचित्र होते हैं। परिस्थितियों के निर्माण करने वाले लोग अच्छे तथा बुरे दोनो ही होते हैं किन्तु अन्तर इतना ही है कि परिस्थितियों के अनुरूप बहने वाले सामान्य होते हैं और मानव हितकारी परिस्थितियों का निर्माण करने वाले असाधारण और महान होते हैं। लोग बुरे लोगों को अपना मार्गदर्शक बना देश का पतन करते है तथा अच्छे लोग श्रेष्ठ मार्गदर्शन देकर देश की उन्नति के लिए सदैव प्रयासरत रहते हैं।

क्या सदैव संसार की दिशा बदली जा सकती है? दिशा बदलने का समय तब आता है जब आसुरी प्रवृत्तियां तीव्र रुख धारण कर लेती है और देववृत्तियां शान्त हो जाती है तब कोई इस संसार की दिशा बदलने का सार्थक प्रयत्न करता है। शाश्वत सत्य सिद्धान्त है कि बुरी तथा अच्छी प्रवृत्तियां आरम्भ से ही चली आयी है। इनका कभी भी सदा के लिए अन्त नहीं होता। दोनों ही एक दूसरे पर हावी होने के लिए सदैव उद्यत रहती है। कुछ समय के लिए किसी एक प्रवृत्ति का प्रभाव कम हो जाता है किन्तु यह सदैव स्थिति नहीं रहती। कुछ समय के अन्तराल में दुसरी प्रवृत्ति बड़े परिश्रम तथा पुरुषार्थ के साथ संसार की दिशा बदलकर अपनी स्थिति को स्थापित करती है।

सरल-सी भाषा में कहा जाये तो ये सृष्टि त्रिगुणात्मिकी है। इन तीनों गुणों के नाम सत्व, रज और तम हैं। ये तीनों ही गुण मनुष्य  के अन्दर होते हैं। जब व्यक्ति के अन्दर तामसी प्रवृत्ति की अधिकता होती है तब वह पशुता की ओर अग्रसरित होता है अर्थात् नीच कर्मों को करता है। जब सात्त्विक प्रवृत्ति की अधिकता होती है तब वह देवत्व के कर्मों को करता है और जब राजसी प्रवृत्ति की अधिकता होती है तब  वह बहुत गतिशील बनता चला जाता है।

राजसी प्रवृत्ति स्वयं एकाकी ही नहीं रहती अपितु वह सात्विक अथवा तामसिक प्रवृत्ति का साथ अवश्य लेती है। राजसी तथा तामसिक प्रवृत्ति का समावेश हो तो श्रेष्ठता का मार्ग प्रशस्त होता है।

संसार में देवासुर संग्राम निरन्तर चलता ही रहता है। यही संसार का नियम है। असुरता का साम्राज्य अल्प प्रयत्न से ही विस्तार को प्राप्त हो जाता है किन्तु देवत्व का साम्राज्य बहुत पुरुषार्थ करने पर भी विस्तार को प्राप्त नहीं होता है। यह बहुत बड़ी विडम्बना है।

आज हमारे समाज का भी हाल कुछ इसी प्रकार का है। आसुरी प्रवृत्ति का विशाल साम्राज्य कायम हो चुका है। असत्य, अन्याय, छल-कपट, पाप, अत्याचार, शोषण आदि की बहुलता होती जा रही है। लोग इन्हीं में लिप्त होकर इनका ही साथ देते हैं। अच्छाई का नाश होने की कगार पर है। इसके दोषी वे अच्छे लोग है जो बिखरे हुए हैं, सदैव स्वयं के तुच्छ स्वार्थों में डुबे हुए है। आज आवश्यकता है एकत्रित होने की, साथ मिलकर चलने की, तभी जाकर आसुरों की प्रवृत्ति का साम्राज्य समाप्त हो सकेगा।

श्रेष्ठ भारत को बनाने के लिए एकत्रित होना होगा तभी अच्छी शक्तियों का विस्तार हो सकेगा और समाज में सद्व्यवहारों का आचरण हो सकेगा। हमें अपने तुच्छ स्वार्थों को भूलाना होगा। हिन्दु, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई इन सभी से ऊपर उठकर भारत को श्रेष्ठ बनाने के लिए कृत संकल्प होना होगा।

लेकिन कैसे श्रेष्ठ भारत का निर्माण हो पायेगा? लोग सोचते हैं कि – मैं तो अकेला हूं, मैं तो जाति से हीन हूं, अरे! भला मैं क्यों करु? जैसा चल रहा है वैसा ही चलने दो। सुधार से मुझे क्या मिलेगा? सफल नहीं हुआ तो जग हॅंसेगा, नाम बदनाम होगा, कारोबार बन्द हो जायेगा, इत्यादि बातों पर प्रायः लोग विचार-विमर्श करते हैं। विचार-विमर्श के पश्चात् कुछ लोग हताशा तथा निराशा के शिकार हो जाते हैं और कुछ लोग आशावादी बन जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हर एक चीज के दो पहलू होते हैं। जैसे ईश्वर ने बुद्धि सभी को प्रदान की है। कोई उसका उपयोग धर्मार्थ में लगाता है तो कोई निजी स्वार्थ में। सबका अपना-अपना मत होता है। जो देशप्रेमी, देशहितैषी होते हैं वो लोग आशा व  उत्साह को प्राप्त होकर कठिन से कठिन परिस्थिति में भी संघर्ष के लिए सदैव उद्यत रहते हैं। ऐसे ही लोगों ने आजादी के मैदान में अपने तुच्छ स्वार्थों को विस्मृत करते हुए अपने सर्वस्व की आहुति राष्ट्र की बलिवेदी को समर्पित की।

क्या आज हमारा कर्तव्य नहीं है कि हम राष्ट्र को सन्मार्ग पर ले जाने वाले बने? क्या हममें उन वीर अमर हुतात्माओं के खून का अंश नहीं है? क्या  हमारा स्वाभिमान समाप्त हो चुका है? क्या हमारी आपसी फूट समाप्त नहीं हो सकती? क्या हम अपने जीवन का नाम मात्र अंश भी देश हित में नहीं लगा सकते ? ऐसा नहीं है, हम कर सकते है, किया था और इस जन्म में भी करते रहेंगे। हमें अपने इतिहास की गौरव गाथा को सुनकर प्रसन्न होने की आवश्यकता नहीं है प्रत्युत भारतवर्ष को पुनः विश्वगुरु के दर्जे पर पहुँचाना है। पुनः नव भारत का उदय करना है, इन्हीं भावों (विचारों) को धारण कर देश निर्माण का संकल्प ले सत्त्वगुणात्मिक16  होकर अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान् बन कार्य में लग जायें।

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1 Comment on "देश निर्माण का संकल्प"

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मनमोहन आर्य
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प्रशंसनीय लेख। युवा लेखक में भविष्य में देश का एक स्वतंत्र विचारक वा चिंतक बनने की सम्भावना स्पष्ट दिखाई देती है।

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