लेखक परिचय

डॉ. मनोज चतुर्वेदी

डॉ. मनोज चतुर्वेदी

'स्‍वतंत्रता संग्राम और संघ' विषय पर डी.लिट्. कर रहे लेखक पत्रकार, फिल्म समीक्षक, समाजसेवी तथा हिन्दुस्थान समाचार में कार्यकारी फीचर संपादक हैं।

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डॉ. मनोज चतुर्वेदी 

नानाजी देशमुख उर्फ चंडीदास अमृतराव देशमुख का नाम कोई अनजाना नहीं है। महाराष्ट्र राज्य के हिंगोली (परभणी) जिला तथा कडोली जैसे निर्धनतम ग्राम में पैदा हुए नानाजी ने 1934 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से देशसेवा का व्रत लिया तो उन्होंने प्रचारक रूप में ही देश के लिए तन, मन और धन समर्पित कर दिया। लगभग 80 वर्षों तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक जीवन में 1948-51 तक ‘पांचजन्य’साप्ताहिक, मासिक ‘राष्ट्रधर्म’ तथा ‘दैनिक स्वदेश’ के प्रबंध निदेशक तत्पश्चात जनसंघ के संगठन मंत्री, आपातकाल में राष्ट्रीय सचिव तथा 1976-77 से दीनदयाल शोध संस्थान के दायित्वों का निर्वाह किया। राजनीति के जिस फसल को काटने के लिए आज के राजनीतिज्ञ लालायित रहते हैं उस अवस्था को उन्होंने ऐसे त्यागा। जिस प्रकार सांप अपने केंचुल को त्यागकर शांतचित हो जाता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक विश्वव्यापी तथा भारत का सबसे बड़ा संगठन हैं। मोहिते के बाड़े से प्रथम शाखा की शुरूवात के बाद अब तक एक लाख से उपर शाखाओं का विस्तार हुआ है। यह सब संघ के प्रसिध्दपरांङ्गमुखता के द्वारा ही संभव हुआ है तो देश के बुध्दिजिवियों का ध्यान बरबस संघ के तरफ आकृष्ट होता है। उनका कहना है कि संघ की दृष्टि क्या है? यह कोई एक-दो दिनों का फल नहीं है बल्कि यह 86 वर्षों की कठिन साधना द्वारा ही संभव हुआ है। ‘परं वैभवं नेतुमेतत स्वराष्ट्रम्’ ही संघ का ध्येय वाक्य है। संघ, संघ के स्वयंसेवक, प्रचारक तथा विशाल संघ विचार परिवार इस पुनित कार्य में तन, मन और धन के साथ खड़ा है। संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार के ये अनुयायी देवभूमि, पुण्यभूमि, मातृभूमि की सेवा को ही अपना सर्वस्व मानते हैं। इन्हीं का विचारोत्तेजक अध्ययन किया था नानाजी ने। वे सबके नाना, मामा, भाई तथा राष्ट्र-ॠषि थे। उन्होंने लगभग 80 वर्षों के कालखंड में जिस प्रकार संघ को देखा उसे लिखा।

पुस्तक की भूमिका में नानाजी ने लिखा है। मैं लेखक नहीं हूं। आजतक मैने कोई पुस्तक नहीं लिखी। लेख भी बहुत थोड़े ही लिखे होंगे। भाषण अवश्य दिए हैं और आवश्यकता पड़ने पर देते रहता हूं, क्योंकि जिस तरह का कार्य मैं करता हूं, उसका यह अवश्यक अंग है। फिर, यह पुस्तक मैंने क्यों लिखी है? इसका महत्वपूर्ण कारण है। मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्यकर्ता रहा, फिर भारतीय जनसंघ का कार्यकर्ता बना और इसके बाद जब आदरणीय जय प्रकाश जी के प्रताप, प्रभाव और आशीर्वाद से शासन के तानाशाही को चुनौती देने के उद्देश्य से पहले संपूर्ण क्रांति आंदोलन तथा बाद में इंदिरा सरकार को गिराकर जनता सरकार बनी, उस सबका (बिना मंत्री बने) कार्यकर्ता रहा और आज भी हूं। पर बिना किसी दोष के जनता पार्टी के पूर्व मित्रों ने मेरे पूर्व दलों को आखेट बनाकर उस जनता पार्टी को घृणित कार्य तथा षड़्यंत्र आरंभ ही नहीं किया, उसे तोड़ भी डाला जिसे हम सबने मिल-जुलकर और आपातकाल में थोड़ा-बहुत त्याग करके बनाया था, जिसे न तोड़ने की हमने महात्मा गांधी की पवित्र समाधि पर प्रतिज्ञा की थी, औरा देश के नव-निर्माण में जिसका योगदान अभी पूरा नहीं हुआ था तो मेरे दिल को गहरी चोट लगी। संघ के वातावरण में बड़े होने वाले कार्यकर्ता विरोध एवं प्रतिक्रिया की भावना में ज्यादा विश्वास नहीं करते, उसे व्यक्त करते जरा संकोच करते हैं-जिसका प्रमाण उनकी ओर से बहुत कम अवसरों पर उत्तर का दिया जाना है – परंतु राष्ट्रीय विश्वासघात के इस दुर्दिन में मुझे लगा कि आगे बढ़कर कुछ कहना, कुछ लिखना ही चाहिए और आम लोगों को बताना चाहिए कि हमारे विरूध्द जो दुष्प्रचार किया जाता है वह सही नहीं है कि संपूर्ण क्रांति के आंदोलन तथा अभियान में हमने भी कुछ किया है कि हमने जो किया है, ज्यादा बड़बोले लोगों ने जो किया है, उससे ज्यादा ही हो।

उपर के बातों से यह स्पष्ट हो जाता है कि नानाजी द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पुस्तक लिखने का एकमात्र कारण यही था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा संघ परिवार किसी भी प्रचार के अराष्ट्रीय विचारधारा में विश्वास नहीं रखता। नानाजी देशमुख की तरह ही हमने अपने छोटे से जीवन में यह अनुभव किया कि संघ की दृष्टि में ”स्वतंत्रता संग्राम” का अर्थ मात्र सता का हस्तांतरण नहीं। संघ पूर्ण स्वतंत्रता में विश्वास करता है। अतः उसने जहां जब जैसे अनुभव किया। स्वयंसेवकों को स्वयं की प्रेरणा से उस कार्य में जाने हेतु प्रोत्साहित व समर्थन किया। नानाजी ने इस पुस्तक में संपूर्ण क्रांति तक के ऐतिहासिक घटनाओं को पिरोने का प्रयास कियाहै। जबकि मेरा प्रयास रामजन्मभूमि आंदोलन तथा गौ-ग्राम यात्रा तक केंद्रित रहेगा। संघ पर होने वाले घातों-प्रतिघातों का मुकाबला लेखनी द्वारा बहुत ही जरूरी है।

पुस्तक के द्वितीय संस्करण का पुरोकथन वरिष्ठ पत्रकार, लेखक तथा संपादक श्री रामबहादूर राय ने लिखी है। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रशिक्षित स्वयंसेवक हैं तथा आपातकालीन संघर्ष एवं संपूर्ण क्रांति आंदोलन में श्री के.एन. गोविन्दाचार्य के साथ लंबे समय तक कार्य करने के पश्चात पत्रकारिता जीवन में आए।

जनता पार्टी को तोड़ने वाले लोगों में श्री मधु लिमये तथा चौधरी चरण सिंह का बहुत बड़ा हाथ था। मधु लिमये की एक राजनीतिक छवि बन गयी थी कि जनता पार्टी को तोड़ने वालों में नंबर एक थे। सक्रिय राजनीति से जब उन्हें फुर्सत मिली तब उन्होंने जनता पार्टी पर दो खंडों में पुस्तक लिखी। पहले खंड में 1975-77 का वर्णन है। उन्होंने अपनी पुस्तक का नाम दिया ‘जनता पार्टी ऐन एक्सपेरिमेंट’। इस पुस्तक में जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम का एक अध्याय है। इसमें उन्होंने अपने विचार लिखे हैं कि जनसंघ संघ परिवार का अंग है और वह जनता पार्टी में सबसे अधिक सुगठित है। वह संघ से अपना संबंध बनाए रखता है तो जनता पार्टी में इसलिए टकराव होगा क्योंकि सेक्यूलर नेशनलिज्म को खतरा पैदा हो जाएगा। वे अपनी बात आगे बढ़ाते है और कहते हैं या तो संघ बदले या जनसंघ। उससे अपना नाता तोड़े। इसे वह जनता पार्टी का सबसे विस्फोटक विषय मानते थे। उन्होंने लिखा है कि जनता पार्टी के विधिवत गठन से पहले ही यह सवाल उसी कार्य समिति में उठा था।

कुल दस अध्यायों में विभाजित इस पुस्तक के प्रथम अध्याय में ‘झुठे आरोपों का शिकार’ के अंतर्गत आपातकाल में कुछ स्वयंसेवकों को सरकारी नौकरी से निकाल दिया गया तो वे न्यायालयों में गए तो सरकार उनके कथित अपराधों का कोई प्रमाण उपस्थित नहीं रह सकी और न्यायालयों ने इस पर सरकार की भर्त्सना भी की।

द्वितीय अध्याय ‘दोहरी सदस्यता का प्रश्न में’ नानाजी ने लिखा है कि यह पता लगाना चाहिए कि देश के अन्य दलों में-उदाहरण के लिए सर्वोदय एवं आर्य समाज में-भी दोहरी सदस्यता के प्रश्न उठाए जाते हैं। यह जानने की चेष्टा करनी चाहिए कि उनका विश्वास किस विचारधारा में है। यह भी देखना चाहिए कि विभिन्न राजनीतिक नेताओं के विश्वास और घोषणाएं तथा उनके वास्तविक विश्वास क्या है?

तिसरे अध्याय में ‘सांप्रदायिकता का आरोप में’ यह लिखा है कि संघ किसी भी प्रकार के सांप्रदायिक हिंसा में विश्वास नहीं करता है तथा संगठन से संबंधित घटनाओं का जिक्र किया है।

चौथे अध्याय में ‘जनसंघ विरोध की प्रेरणाएं’ के अंतर्गत उन्होंने यह बताने का प्रयास किया है कि सत्ता पिपासु दलों का लक्ष्य ऐन-केन-प्रकारेण संघ के प्रति नकारात्मक प्रचार-प्रसार करना है ताकि उनकी राजनीतिक दूकान चले।

पांचवें अध्याय में ‘जेपी मुवमेंट एंड आरएसएस’ के अंतर्गत अग्रिम पंक्ति में संघ के स्वयंसेवकों का संपूर्ण क्रा्रंति में सहभागिता का जिक्र किया है। किस प्रकार के. एन. गोविंदाचार्य, सुब्रमण्यम स्वामी, जे.के. जैन, कृष्णलाल शर्मा, मदनलाल खुराना इत्यादि कार्यकर्ताओं में संपूर्ण क्रांति के आंदोलन को सफल बनाया तथा लाठी-गोली के प्रहारों को सहा। उनके साथ रोंगटे खड़ा करने वाले कृत्य किए गए।

छठवें अध्याय में ‘भारतीय राजनीति में जनसंघ’ के योगदान तथा सातवें में जनसंघ की सफलताओं का व्योरा प्रस्तुत किया है।

आठवें अध्याय में ‘चरण सिंह की राजनीति’ नौवें अध्याय में ‘खतरों से सावधान’ तथा दशवें अध्याय में ‘सेवाभावी राजनीति की ओर’ पर प्रकाश डाला है। नानाजी ने लिखा है कि चौधरी चरण सिंह का एकमात्र लक्ष्य सत्ता केंद्रित राजनीति रही है। स्वयं उन्होंने मुख्यमंत्री हेतु मुझसे निवेदन किया था और उन्होंने सत्ता प्राप्ति के लिए ही जनता पार्टी को तोड़ डाला।

प्रस्तुत पुस्तक विधार्थियों, अध्यापकों, अधिवक्ताओं, प्रशासनिक अधिकारियों, पत्रकारों तथा शोध संस्थाओं के लिए पठनीय एवं संग्रहणीय है। पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर चिंतनशील मुद्रा में नानाजी चित्र है। पुस्तक की भाषा शैली सरल, सहज एवं बोधगम्य है। 208 पृष्ठों की पुस्तक का मूल्य मात्र 90 रूपये है जो कि हर पाठक के लिए सरल हो सकता है।

पुस्तक का नाम :  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

लेखक : नानाजी देशमुख

मूल्य :  95 रूपये मात्र

प्रकाशक : प्रभात पेपर बैक्स, 4/19, आसफ अली रोड, नई दिल्ली – 02

संस्करण :  द्वितीय, 2011।

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