लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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-मनमोहन कुमार आर्य-
hawan

हवन क्या है? हवन एक कर्मकाण्ड है, जिसमें एक हवन कुण्ड, यज्ञ की समिधायें, एक पात्र में घृत, उसमें एक चम्मच या चमसा, आचमन के लिए जल व उनमें चम्मच, यजमानों व याज्ञिकों की संख्या के अनुसार प्लेटों में हवन सामग्री व याज्ञिकों के बैठने के लिए आसन आदि का प्रबन्ध किया जाता है। यज्ञ में हवन के मन्त्र बोले जाते हैं जिनकी भाषा वैदिक संस्कृत है। मन्त्रों को बोलने का प्रयोजन यह है कि इससे वेदों में निहित ईश्वरीय ज्ञान की रक्षा व इनके अर्थों को जानकर इनसे होने वाले लाभ विदित होते हैं व इनसे भी स्तुति-प्रार्थना-उपासना हो जाती है जो अन्यथा नहीं हो सकती। यह भी यहां स्पष्ट कर दें कि थोड़े से परिश्रम व कुछ बार आवृत्ति करने पर स्मरण हो जाते हैं। हमने देखा है कि जिन परिवारों में यज्ञ होता है, वहां के छोटे-छोटे बच्चों, जिनको ठीक से भाषा का ज्ञान नहीं होता, अपनी तोतली भाषा में ही मन्त्रोच्चार करते हैं, तो वह दर्शक को बहुत प्रिय व अच्छा लगता है। जो व्यक्ति, बूढ़ा, युवक, विद्यार्थी व बच्चा, विश्व की श्रेष्ठतम धर्म व संस्कृति की रक्षा के लिए इतना भी नहीं कर सकता, अपितु हवन का विरोध करता है, उससे क्या आशा या अपेक्षा की जा सकती है, वह उस ईश्वर के प्रति व देश समाज के प्रति कृतघ्न होता है, जिसने यह संसार बनाया व उसे जन्म व सुखों की नाना प्रकार की सामग्री से समृद्ध किया है। आरम्भ में मन्त्रों को बोल कर आचमन, इन्द्रिय स्पर्श आठ स्तुति, प्रार्थना व उपासना के मन्त्र, फिर स्वस्तिवाचन, शान्तिकरणम, पश्चात हवन अर्थात् हवन कुण्ड में आहुति देने का क्रम प्रारम्भ होता है। प्रथम अग्न्याधान, पश्चात, समिदाधादान, घृत-आहुतियां, जल-सिंचन व भिन्न-2 नामों व विषयों की आहुतियों का क्रम होता है। पूर्णाहुति, यज्ञ प्रार्थना, शान्तिपाठ व इनके पश्चात ईश्वर से कुछ क्षण व अधिक मौन प्रार्थना से यज्ञ समाप्त होता है। यह समस्त कार्य 15 से 30 मिनट में पूरा किया जा सकता है। यह कुछ संक्षिप्त परिचय हवन का है। हवन क्या है- का कुछ उत्तर इन पंक्तियों में आ गया है, कुछ शेष है। हवन- वह पद्धति है, जिससे गृह व निवास स्थान की दूषित व रोगोत्पादक वायु को बाहर निकाला जाता है, बाहर की शुद्ध वायु को घर में रोशन दान, खिड़की व दरवाजों से प्रवेश कराया जाता है, रोग न हों और यदि किसी सदस्य को है तो उसका निवारण या उपचार होता है। इसके अतिरिक्त वैद्य या डॉक्टर के परामर्श से औषधि का सेवन भी अवष्य करना चाहिये। हवन अपना कार्य करेगा और बचा हुआ कार्य औषधि के सेवन से होगा। हवन से घर के अन्दर की वायु की शुद्धि होती है। शुद्धि दो प्रकार के हैं। पहली अन्दर की वायु- हवन की अग्नि के ताप व गर्मी से हल्की होकर बाहर निकल जाती है तथा बाहर की शुद्ध वायु, हवन से हल्की हुई अन्दर की वायु के निकलने पर प्राकृतिक व विज्ञान के नियमों के अनुसार स्वतः गृह में प्रविष्ट होती है। यज्ञ में जो पदार्थ आहुत किये जाते हैं, वह अग्नि से सूक्ष्म हो जाते हैं। वह सारे घर में फैल जाते हैं। सूक्ष्म पदार्थों का हमारे स्वास्थ्य पर अधिक प्रभाव पड़ता है। जिस प्रकार अग्नि में एक मिर्च को डालने पर उसकी धांस से वहां लोगों का बैठना कठिन हो जाता है जिसका कारण मिर्च के प्रभाव में वृद्धि का होना होता है। इसी प्रकार यज्ञ में आहुत द्रव्यों का प्रभाव बहु-गुणा होकर उससे अनेकशः अदृष्य आध्यात्मिक व भौतिक लाभ मिलते हैं। हानिकारक रोग उत्पन्न करने वाले वायु में विद्यमान कीटाणुओं व बैक्टिरियाओं का नाश होता है। गीता के अनुसार यज्ञ करने से बादल बनते हैं, बादल से वर्षा होती है, उस वर्षा के जल में हवन में होम किये गये पदार्थ सूक्ष्म होने के कारण घुले-मिलं होते हैं, हवन में आहुत सूक्ष्म पदार्थों व वर्षा के जल से हमारे खेतों में यह जल उत्तम खाद का काम करता है। पुरूष व प्राणी इस प्रकार यज्ञों से प्रभावित उत्पन्न हुए अन्न का भक्षण करते हैं, तो इस अन्न से शरीर की विभिन्न इन्द्रियां व सभी अंग स्वस्थ व बलवान होकर पौरूष शक्ति उन्नत होती है। ऐसे स्रीसे-पुरूषों से जो सन्तानें उत्पन्न होतीं हैं, वह श्रेष्ठ होती हैं। हवन में वेद मन्त्र का बोलना आवश्यक है। पूर्ण वर्णित लाभ से अतिरिक्त इसका अन्य लाभ यह है कि बोले जाने वाले मन्त्रों के अर्थों को जानकर यज्ञ में रूचि व प्रवृत्ति बढ़ती है। आजकल यज्ञों में बोले जाने सभी मन्त्र व उनके अर्थ लघु पुस्तिकाओं में उपलब्ध हो जाते हैं। थोड़ा सा प्रयास मात्र करना है। इससे सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर प्रदत्त व सृष्टि इतिहास में सर्वश्रेष्ठ वैदिक ज्ञान व विचारों वाले इन वेद मन्त्रों की रक्षा होती है जो कि मनुष्यमात्र का प्रथम कर्तव्य है। इसका कारण संसार में ज्ञान से बढ़कर कुछ नहीं है तथा यह मन्त्र श्रेष्ठ व अपौरूषेय ज्ञान का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जिनकी रक्षा आवश्यक है। यहां ध्यान देने योग्य बात है कि सृष्टि व वेद की उत्पत्ति को 1,96,08,53,114 वर्ष हो चुके हैं। हमारे पूर्वजों ने प्राणपण से वेदों की इतनी लम्बी अवधि तक रक्षा की है। यह संसार के इतिहास में अपूर्व व आश्चर्यजनक है। हम तो इसे संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य कहेंगे। आज वेदों की रक्षा करना पहले से आसान है। पुस्तकों द्वारा, सीडी/वीसीडी आदि के द्वारा मन्त्रों को बोलकर व स्मरण कर इनकी रक्षा होती है। जो लोग वेदों के सन्ध्या व हवन के मन्त्रों को बोलना अनावश्यक समझते हैं, उनसे हम यह कहना चाहते हैं कि जब छोटे-छोटे कार्यों में गृहस्थी अपना लम्बा समय व बड़ी धनराशि व्यय कर सकते हैं तो ईश्वर, जिसने हमारे लिए सृष्टि बनाई, हमें यह मानव शरीर दिया व हमारे माता-पिता, पुत्र व पुत्रियां आदि सम्बन्धी हमें दिये तो क्या उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकाशित करने के लिए सन्ध्या व हवन नहीं करना चाहिये, हम समझते हैं कि सभी बुद्धिमान पाठक कहेंगे कि अवश्य करना चाहिये। अतः जो बन्धु न करते हों उनसे हमारा अनुरोध है कि आज से ही हवन करना आरम्भ कर दें और इसके दृश्य व अदृश्य लाभों से वंचित न हों।

अब सन्ध्या व हवन से होने वाले लाभ की कुछ चर्चा और कर लेते हैं। सन्ध्या से तो ईश्वर से निकटता होती है। इससे बुरे गुण-कर्म-स्वभाव का छूटना व श्रेष्ठ गुण, कर्म व स्वभाव का बनना होता है। कालान्तर में इसको निरन्तर करते रहने से ईश्वर साक्षात्कार होकर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है। हवन से घर का वायु मण्डल शुद्ध होने से चित्त प्रसन्न रहता है। बच्चों पर व परिवार में आने-जाने वालें लोगों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। अंधविश्वासों, पाखण्डों, दुश्कर्मों आदि से बचते हैं। सभी सदस्य स्वस्थ रहते हैं या रोग बहुत कम होते हैं। ईश्वर की आत्मा में प्रेरणायें होती रहती है। अच्छे कार्यों में प्रवृत्ति होती है जिससे व्यक्ति अच्छे कर्म करता है। अच्छे कर्मों से सुख मिलने के साथ प्रारब्ध में पुण्यों की अधिकता से यह जन्म व भावी जन्म सुधरता व उन्नत होता है। याज्ञिक परिवार के लोगों का स्वास्थ्यय अच्छा होना व दीर्घायु होने से अनेकानेक लाभ होते हैं। ईश्वर ने यज्ञ करने वालों का देवता कहा है। हम यज्ञ करते हैं तो हम ईश्वर की दृष्टि में देवता होते हैं। यह पृथिवी देवों द्वारा यजन किये जाने से ईश्वर इसके लिए वेदमन्त्र में देवयजनि शब्द का प्रयोग करते हैं। हम यह भी कहना चाहते कि जो व्यक्ति, वह चाहे किसी भी मत, मतान्तर, सम्प्रदाय, मजहब, विचारधारा या मान्यता का क्यों न हो, यदि यज्ञ नहीं करता तो वह ईश्वर के नियमों को तोड़कर अपराधी होने से ईश्वर द्वारा उसे मनुष्य जन्म दिये जाने को असफल सिद्ध करता है व दण्ड का भागी होता है।

इसे इस प्रकार से समझ लें कि कोई व्यक्ति सरकारी या निजी क्षेत्र में नौकरी करता है। वहां उसे 10 बजे आने के लिए कहा जाये और वह देर से पहुंचे या न पहुंचे तो वह दण्डस्वरूप नौकरी से निकाल दिया जाता है, इसी प्रकार से यज्ञ की ईश्वराज्ञा वा वेदाज्ञा का उल्लंघन करने या न मानने से वह ईश्वरीय दण्ड का भागी हो जाता है। हम समझते हैं कि जिस प्रकार आजकल अपराध करने पर सजा बहुत बाद में मिलती है। पहले जांच होती है, मुकदमा चलता है, सजा होती है और फिर अपराधकर्मी उसे जेल में रहकर या आर्थिक दण्ड आदि के रूप में सहन व वहन करता है। ईश्वर भी सभी कर्मों के दण्ड एक साथ नहीं देता। वह अन्न के दानों की तरह, जब पक जाते हैं, तब वह उपयोग करने योग्य होते हैं। इसी प्रकार कर्मों के पक जाने व पूर्ण हो जाने पर दण्ड मिलता है, तब फल मिलने पर कर्ता अपनी अल्पज्ञता व अज्ञानता से उसे भूल जाता है, परन्तु ईश्वर के सर्वव्यापक, सर्वान्तरयामी, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान व हर क्षण व पल का साक्षी होने के कारण प्रत्येक कर्म का स्मरण रहता है और कोई भी कर्म बिना भोग किए समाप्त नहीं होता। अवश्वमेव हि भोक्तव्यं कृत कर्म शुभाशुभम्। अतः ईश्वरीय दण्ड को सामने रखकर विवेकपूर्वक ही कर्मों को करना चाहिये। एक गलती प्रायः लोग यह करते हैं कि लोभी, स्वार्थी, अल्पज्ञानी, अज्ञानी व मूर्खों को अपना धर्मगुरू बना लेते हैं। ऐसे लोगों की वही दशा होती है जो अज्ञानी को गुरू बनाकर पढ़ने वालों की होती है। ऐसे विद्यार्थी हर परीक्षा में अनुतीर्ण होते हैं। इसी प्रकार धार्मिक चेलों का भी अज्ञानी गुरू के विद्यार्थियों वाला हाल होता है।

हमने निष्पक्ष भाव से मनुष्य-देश-समाज के हित को सामने रखकर संक्षेप में यज्ञ व हवन के विषय में लिखा है। आषा है कि पाठक इन पर विचार करेंगे और इन्हें सत्य पायेगें। हम उनसे अपेक्षा करते हैं कि वह भी सन्ध्या व हवन को अपनायेंगे और दूसरों को भी इसके लिए प्रोत्साहित करेंगे और ऐसा करके पुण्य के भागी बनें। हम यह भी कहना चाहेंगे, यदि किसी यज्ञ प्रेमी के पास यज्ञ करने के लिए घृत, सामग्री, स्थान आदि की समस्या हो तो वह यज्ञ को छोड़ें नहीं, अपितु अपने मन्त्रों को बोल या मन से उनका पाठ कर हवन को सम्पन्न करें। हम समझते हैं कि यदि दैनिक यज्ञ में स्वस्तिवाचन व शान्तिकरण को भी सम्मिलित कर सकें तो इससे अधिक लाभ होने की सम्भावना है।

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1 Comment on "हवन क्यों करें, करें या न करें"

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madhusudan vyas
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हवन आग जलाकर कुछ वस्तुओं को अग्नि की भेट चढ़ाना तथा उसके धूम से वायु शुद्धता की बात सही हैं। यह एक प्रारम्भिक कथन लगता हैं। उसके साथ वेद मंत्रो का उच्चारण करना तथा उनको दोहराना भी जरूरी कहा गया हैं। मेरा विचार इसके साथ ही कुछ भिन्नता लिए हुए है। हवन एक कर्म काण्ड कहा जा सकता है। जीवन को चलाने का हर कर्म एक काण्ड है। जैसे माँ ,पत्नी या बहिन द्वारा भोजन बनाना भी एक कर्म काण्ड है। उसकी भी एक प्रक्रिया है। सो यह तंत्र भी है कर्म काण्ड भी है। यह भी नियम विरुद्ध किया… Read more »
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