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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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पीर अज़हर

‘‘आठवीं क्लास का रिजल्ट आने वाला था इसलिए मैं जल्दी जल्दी स्कूल पहुंचना चाहता था ताकि मैं भी अपनी मेहनत का फल देख सकूं। स्कूल पहुंचने पर क्लास टीचर ने मेरे पास होने की खुशखबरी दी तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। मुझे इस बात की भी खुशी हो रही थी कि मेरी मजदूरी मेरी पढ़ाई में रूकावट नहीं बनी है। अचानक मुझे ख्याल आया कि नए साल यानि नौंवी क्लास के लिए किताबें कहां से लाउं? इसी सोंच में मैं एक बार फिर मजदूरी की तलाश में निकल पड़ा। हालांकि कई बार कम उम्र होने के कारण लोग काम नहीं देते हैं या फिर कम मजदूरी देते हैं। लेकिन अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए मुझे मजदूरी करनी पड़ती है।‘‘

यह कोई कहानी नहीं बल्कि कड़वी सच्चाई है, धरती का स्वर्ग कहलाने वाले कश्मीेर के कुपवाड़ा का रहने वाला बाल मजदूर मोहम्मद असलम की। असलम कुपवाड़ा के तिरगाम ब्लॉक के मरहामा गांव का रहने वाला है। जो वर्श 2010 में अपने ही क्षेत्र के रहने वाले आईएएस टॉपर डॉक्टर शाह फैसल की तरह कामयाबी के सपने देखता है। मगर वह भूल रहा है कि डॉक्टर फैसल की मां एक ऐसी टीचर थीं जिन्होंने अपने यतीम बच्चे की न सिर्फ अच्छी परवरिश की बल्कि उसके ख्वाब को पूरा करने में दिन रात एक कर दिया था। दूसरी ओर यह लड़का जो अपनी शिक्षा का खर्च उठाने के लिए मजदूरी कर रहा है ताकि अपने भविश्य के सपने को कुछ हद तक पूरा कर सके। अब उसके सपने पूरे होते हैं या फिर मजदूरी के बोझ में दबकर खत्म हो जाते हैं। यह तो आने वाला वक्त और शिक्षा विभाग ही बताएगा। कश्मी र के इस सीमावर्ती क्षेत्र में असलम जैसे सैंकड़ों बाल मजदूर हैं। इनमें से कुछ को कुपवाड़ा बस स्टैंड पर आसानी से देखा जा सकता है। चाहे वह कश्मीीरी पौधे बेचने वाला मुब्बशीर अहमद सूफी या थैले बेचने वाला ग्यारह साल का शेख मुनीर अहमद या फिर किसी दुकान पर काम करने वाला कोई अन्य बाल मजदूर।

मगर तारीफ करनी होगी इन बच्चों की जो अपनी गरीबी और मजबूरी के बावजूद शिक्षा ग्रहण करने के न सिर्फ सपने देख रहे हैं बल्कि उन्हें पूरा करने के लिए अपने घर परिवार पर बोझ बनने की बजाए मजदूरी करके अपना बोझ खुद उठा रहे हैं। यहां तक के अपने उज्जवल भविश्य की खातिर प्राइवेट स्कूलों में भी पढ़ाई कर रहे हैं और इसका खर्चा मजदूरी करके पूरा कर रहे हैं। खास बात यह है कि यह बच्चे केवल अपनी शिक्षा का खर्चा उठाने के लिए ही मजदूरी कर रहे हैं। 11 वर्शीय बाल मजदूर शेख मुनीर अहमद का कहना है कि वह कुपवाड़ा बस स्टैंड पर दिन भर बैग बेच कर 70 से 120 रूपए कमा लेता है। इसी वर्श उसने पांचवी क्लास का इम्तेहान दिया है और छुटटी के दिनों में वह बैग बेचने का काम करता है। जिससे उसके स्कूल की 280 रूपए फीस भी निकल आती है। मुनीर के पिता बस स्टैंड पर ही छाछ बेचने का काम करते हैं। लेकिन उनकी इतनी आमदनी नहीं हो पाती है कि वह अपने बच्चों की फीस भर सकें। मुनीर के स्कूल प्रशासन को उसकी मजदूरी के बारे में मालूम है।

इन सब बातों से यह अनुमान लगाना मुष्किल नहीं है कि कश्मीशर में बाल मजदूरी की क्या सूरतेहाल है। इस संदर्भ में खोजी पत्रिका तहलका की रिपोर्ट के अनुसार पूरे देश में बाल मजदूरों की सबसे ज्यादा तादाद जम्मु-कश्मी र में है। राज्य में करीब 2 करोड़ 40 लाख से अधिक बाल मजदूर हैं। रिपोर्ट के अनुसार श्रीनगर और इसके आसपास बड़े घरों में बच्चों से मजदूरी करवाई जाती है। जो अधिकतर कुपवाड़ा और राजौरी जैसे पिछड़े इलाकों से ताल्लुक रखते हैं। एक गैर सरकारी संगठन सेव दी चिल्डैªन के अनुसार देश में आज भी 12.6 मिलीयन बाल मजदूर हैं। जो अधिकतर फैक्ट्रियों, खेतों और घरों में काम करते हैं। जहां न सिर्फ उनसे सख्ती से काम लिया जाता है बल्कि उनका शोषण भी किया जाता है। इस संबंध में प्रोफेसर फैयाज अहमद नुक्का के मुताबिक जम्मू-कश्मीणर में बाल मजदूरी का सबसे प्रमुख कारण गरीबी, पिछड़ापन और शिक्षा की कमी है। जिसका फायदा कहीं भीख मगंवाने वाले तो कहीं देश के दुष्मन तक उठा लेने की कोशिश करते हैं। शिक्षा में कमी और बेरोजगारी का ही फायदा उठाकर 90 की दहाई में कश्मीेर के बहुत से नौजवानों को उन्माद में भड़काकर सरहद पार ले जाकर मिलीटेंसी की ट्रेनिंग दिलाई गई थी।

सरकार ने बाल मजदूरी कानून 1986 के अंतर्गत ऐसे क्षेत्रों को चुना है जहां बाल मजदूरों की संख्या अधिक है और जो हानिकारक उद्योगों में काम कर रहे हैं। सरकार ने लगभग देश के 250 जिलों में राश्ट्रीय बाल मजदूरी परियोजना द्वारा और 21 जिलों में इंडस प्रोजेक्ट द्वारा जिलाधिकारियों को आदेश दे रखा है कि वह बाल मजदूरी को दूर करने के लिए हरसंभव प्रयास करें। इसके लिए विशेष स्कूल संचालित किए जाए, बाल श्रमिकों के परिवारों के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध करायी जाए और 18 साल के पहले किसी भी दशा में उनसे मजदूरी न करायी जाए। इसके अलावा 1975 में बनाया गया इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट स्कीम भी काफी कारगर योजना रही है जिसके अंतर्गत 0 से 6 वर्श तक के बच्चों के शारीरिक और मानसिक वृद्धि के लिए उपाए किए गए हैं। 1995 में दोपहर का भोजन और 2001 में सर्व शिक्षा अभियान के माध्यम से शिक्षा की रौशनी फैलाने का कार्य किया गया। देश में शिक्षा के अधिकार कानून को उस वक्त मील का पत्थर कहा जा सकता है जब अप्रैल 2010 में केंद्र सरकार ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम बनाया था। जिसमें 6 से 14 वर्श की आयु के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रावधान था।

इतने कारगर और सटीक कानून के बावजूद कश्मी र के इन बच्चों का अपनी फीस भरने के लिए मजदूरी करना कहीं न कहीं हमारी व्यवस्था की कमजोरियों को ही उजागर करता है। जिसकी ओर ध्यान देने की आवश्यककता है। सलाम करना चाहिए हमें ऐसे बच्चों को जो केवल इसलिए मजदूरी कर रहे हैं ताकि उनकी शिक्षा में रूकावट न हो सके। शिक्षा के प्रति ऐसी ललक रखने वाले बच्चों की हौसलाअफजाई के लिए सरकार और उससे ज्यादा समाज को आगे बढ़कर कुछ करने की जरूरत है। (चरखा फीचर्स)

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