लेखक परिचय

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी, दैनिक समाचार पत्र दैनिक मत के प्रधान संपादक, कविता के क्षेत्र में प्रयोगधर्मी लेखन व नियमित स्तंभ लेखन.

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सन्दर्भ: जंगल राज और नमो का बिहार अभियान

 

राजनीति तथा कूटनीति के कालजयी सूत्रों को रचनें वाले आचार्य चाणक्य ने कहा है कि असहज मैत्री समाज में, असहज सम्बन्ध कुटुंब में, असहज भागीदारी व्यवसाय में और असहज गठबंधन राजनीति में सदैव ही दुष्परिणामों तथा असहज स्थितियों का निर्माण करती हैं. बिहार में नितीश लालू की राजनैतिक मैत्री और गठबंधन इसका नूतन, ज्वलंत किन्तु निकृष्टतम उदाहरण है. अपनें मुख्यमंत्रित्व काल में बिहार में जंगल राज और घोटाला राज के लिए देश भर में पहचानें जानें वाले लालू के संदर्भ में नितीश ने जो कहा उससे आचार्य चाणक्य का यह सूत्र सिद्ध होता है. बिहार में लालू संग सत्ता में आनें पर नितीश सुशासन और विकास का एजेंडा कैसे लागू कर पायेंगे यह प्रश्न पूछे जानें पर नीतिश ने जो जवाब दिया उसनें इस गठबंधन के स्वभाव, चरित्र, भविष्य के साथ साथ मृत्यु की तिथि भी तय कर दी है!! बिहार में नितीश-लालू की सत्ता आनें पर बिहार में जंगल राज से आशंकित एक प्रश्न के उत्तर में नितीश नें रहीम का जो दोहा सुनाया उससे बिहार की जनता को इस बेमन के गठबंधन के असहज, असंतुलित, असाम्य तथा अटपटेपन का पता चल जाना चाहिए. बिहार में विकास के एजेंडे के विषय में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में नितीश ने कहा कि – जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग। चन्दन विष व्याप्त नहीं, लिपटे रहत भुजंग।’ अर्थात कवी रहीम कहते हैं कि जो उत्तम स्वभाव और दृढ-चरित्र वाले व्यक्ति होते हैं, बुरी संगत में रहने पर भी उनके चरित्र में विकार उत्पन्न नहीं होता .जिस प्रकार चन्दन के वृक्ष पर चाहे जितने विषैले सर्प लिपटे रहें, परन्तु उस वृक्ष पर सर्पों के विष का प्रभाव नहीं पड़ता अर्थात चन्दन का वृक्ष अपनी सुगंध और शीतलता के गुण को छोड़कर जहरीला नहीं हो जाता. गठबंधन की शिशु अवस्था में ऐसी टिपण्णी से बिहार की जनता को बहुत कुछ समझ में आ गया होगा. नितीश कुमार ने स्वयं को चन्दन तथा लालू को भुजंग अर्थात सांप बताया!! विकास एजेंडे की झूठी कसमें खानें वाले नितीश मुख्यमंत्री बननें पर गठबंधन धर्म को यदि निभायेंगे तो अल्पमत हो जायेंगे और इस स्थिति में वे या तो लंगड़ी, अक्षम और असंतुलित सरकार चलाते हुए शीघ्र ही बिहार को पुनः चुनाव के चौराहे पर ला खड़ा करेंगे या फिर उनके शब्दों में व्यक्त भुजंग को दूध पिला-पिलाकर जंगल राज चलनें देनें को मजबूर होंगे.

बिहार में मुख्यमंत्री प्रत्याशी नितीश की यह टिप्पणी राजनीति को अन्दर तक गरमा गई है. यद्दपि नितीश इस टिप्पणी को अन्य अर्थों की ओर मोड़नें का प्रयास कर रहें हैं, तथापि सभी जानतें हैं कि ह्रदय की जो बात अनायास उनकें मूंह से निकली है उसमें कितना दम है. शिशु गठबंधन के कई बड़े नेता नितीश के इस बयान से लगी अंगार को बुझाते और डेमेज कंट्रोल करते दिखाई दिए. नीतीश ने स्वयं अपने ट्वीट पर हास्यास्पद सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने रहीम के दोहे का प्रयोग किया है वह राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के लिए नहीं, बल्कि भाजपा के लिए किया गया है. सच्चाई यही है कि भाजपा के साथ गठबंधन और सत्ता की एक लम्बी पारी खेल चुके नितीश अब अपनी इस टिप्पणी जितना भी प्रयास कर लेंवें भाजपा की तरफ नहीं मोड़ पा रहें हैं. गठबंधन की भ्रूण ह्त्या हो जानें के भय तथा आगामी चुनाव में बिहार की सत्ता हथियानें को येन केन प्रकारेण पानें के प्रयासों में इस बयान के पाप को धोनें में राजद-जदयू के नेता एड़ी चोटी का जोर लगानें पर भी सफल नहीं हो पा रहें हैं. इस डेमेज कंट्रोल अभियान में अंततः नितीश को भी लालू के महा दबाव में पुनः ट्वीट कर सफाई देनी पड़ी. बड़ा ही हास्यास्पद और बचकाना सा लगता है नितीश का यह कहना, कि ट्वीट में इतिहास की पृष्ठभूमि बतायी गयी है कि भाजपा जिसका विचार जहरीला है, जो जहर के समान है उनके साथ रहने के बाद भी मुझ पर जहर का कोई असर नहीं पड़ा तो आगे किसी भी परिस्थिति से चिंता करने की जरूरत नहीं है. वैसे भी नितीश सुविधानुसार साम्प्रदायिकता और सेकुलर की परिभाषाओं को रचते रहें हैं. धर्म निरपेक्षता के नए-नए सुविधाजनक माडलों को गढ़नें में प्रवीण नितीश भाजपा के साथ एक दशक से अधिक रहे तब तक भाजपा धर्म निरपेक्षता की गंगा थी और इनके अलग होनें से अचानक वह साम्प्रदायिक हो गई, उनकी इस बात को बिहार का कोई भी समाज कतई माननें को तैयार नहीं है. सभी जानतें हैं कि प्रधानमंत्री बननें के मोह ने ही उन्हें एनडीए से पृथक होनें को विवश किया है.

आज राजद-जदयू के गठबंधन के मध्य यह जहरीला वातावरण प्रथम अवसर पर बना है ऐसा नहीं है. नितीश को इस तथाकथित महा गठबंधन में मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित करते समय लालू प्रसाद यादव ने इसी व्यंजना तथा लक्षणा पूर्ण भाषा का उपयोग करते हुए कहा था कि वे बिहार में भाजपा को सत्ता में आनें से रोकनें के लिए जहर पीनें को भी तैयार हैं. उस समय भी इस जहर पीनें वाली बात पर यह हल्ला उठा था कि जहर किसे कहा गया है?! लालू के जहरीले व्यक्तव्य के बाद नितीश स्वयं उत्तर देते फिर रहे थे कि लालू ने उन्हें जहर नहीं कहा है.

आज बिहार में चुनाव पूर्व की बेला में इन दोनों घटनाओं का विस्तार से उल्लेख और विश्लेषण करना आवश्यक है. राजनीति में गठबंधन यदि एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है जिसका धरातल मानसिकता की साम्यता तथा स्वभाव के मिलान होनें पर आधारित होता है. भारतीय राजनीति में केंद्र की नमो सरकार का अपवाद छोड़ दें तो जिस प्रकार का राजनैतिक दौर चल रहा है उसमें राजनैतिक गठबंधन की तुलना वैवाहिक सम्बन्ध के महत्त्व के आस पास ही निर्धारित होती है. इस गठबंधन के सत्ता में आनें पर, बिहार में लालू के जंगल राज की स्मृतियों को मन में बैठाए नितीश के, इस प्रकार अनायास किन्तु पूर्वाभासी कथन को बिहार की जनता ने गंभीरता से लेना चाहिए. कुछ लाख अवसरों पर नितीश ने लालू के जंगल राज का उल्लेख बिहार बड़ी ही तीक्ष्ण शैली में किया है तथा लालू ने भी इसी लाखों की संख्या में नितीश को अपनी आलोचना का केंद्र बनाया है. इन दोनों नेताओं का समीप आना भारतीय राजनीति में सत्ता मोह नहीं अपितु केवल और केवल सत्ता पिपासु होनें की पराकाष्ठा के रूप में ही देखा जा सकता है. इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो स्पष्ट आभास होता है कि सगाई के साथ ही परस्पर एक दूजे पर बेवफाई और चारित्रिक दोष लगानें वाला नितीश–लालू का नवयुगल बिहार को अतिशीघ्र पुनर्विवाह अर्थात पुनर्चुनाव के चौराहे पर ला खड़ा करेगा.

नमो का मुजफ्फरपुर से शंखनाद

प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, दिनकर, कृपलानी, जार्ज फर्नांडिस, श्याम नंदन सहाय, लंगट सिंग, जानकी वल्लभ शास्त्री, रामदयालु जैसे दिग्गज राजनीतिज्ञों तथा विद्वजनों के नाम से पहचाना जानें वाला मुजफ्फरपुर उत्तर बिहार की अघोषित राजधानी कहलाता है. 25 जुलाई को प्रम नमो नें मुजफ्फरपुर से बिहार में होनें वाले विस चुनाव अभियान का शंखनाद यहीं से किया. गत लोस चुनावों में, भाजपा की पिछड़ों की राजनीति में नए समीकरणों का जन्म यहीं से हुआ था. तब मुजफ्फरपुर में नमो के मंच पर रामविलास पासवान, उपेन्द्र कुशवाह, कैप्टेन निषाद प्रथम बार आये थे. जेल में रहते हुए जार्ज ने यहाँ से लोस चुनाव जीता था. जार्ज फर्नांडिस की कर्मस्थली रहे मुजफ्फरपुर और सम्पूर्ण बिहार के लोग जानतें हैं कि जार्ज का जीवन कांग्रेस विरोध की राजनीति करते हुए बीता है. लोग यह भी जानतें हैं कि नितीश कुमार को बिहार की राजनीति में यहाँ तक पहुँचानें में दो तत्व महत्वपूर्ण रहे हैं वह है जार्ज फर्नांडिस का नितीश को अवसर देना और फिर जार्ज तथा नितीश का मिलकर संयुक्त धुर कांग्रेस विरोध. आगामी चुनाव में कांग्रेस विरोध की राजनीति से जनित नितीश को कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ते देखना बिहार की जनता के लिए खासा अरुचिकर होगा.

तिरहुत मंडल के मुख्यालय मुजफ्फरपुर में 49 विधानसभा सीटें हैं जिसमें से वर्तमान में 21 भाजपा के कब्जे में है. लोस की आठों सीटें भी एनडीए के पास है. भूमिहार राजनीति का भी गढ़ माने जाने वाले मुजफ्फरपुर और तिरहुत प्रमंडल को बिहार का पिछड़ा और अविकसित क्षेत्र माना जाता है. नेपाल का पडोसी यह क्षेत्र प्रत्येक वर्ष बाढ़ का शिकार रहता है, सड़क परिवहन की दृष्टि से पिछड़ा है, उद्योग बीमार हैं यद्दपि कमोबेश यही पिछड़ी स्थिति बिहार के प्रत्येक प्रमंडल की है तथापि मुजफ्फरपुर का साधन सम्पन्न होते भी पिछड़ा होना इसे अन्य प्रमंडलों में अधिक चर्चित करता है.

नमो ने अपनें उद्बोधन में बिहार की जनता को स्मरण कराया जो उन्हें बिहार में आनें ही नहीं देना चाहते थे, वे आज भी कहते हैं कि वे मोदी के बिना काम चला लेंगे; ऐसे अलोकतांत्रिक लोग किस प्रकार केंद्र के साथ अपनी प्रदेश सरकार चला पायेंगे. नमो का बिहार को यह ध्यान दिलाना प्रभावी रहा कि केंद्र सरकार के अधिकतर महत्वपूर्ण मंत्री पद बिहारियों के पास है और वे देश चला रहें हैं. भूटान में नमो ने जिस हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्लांट का एग्रीमेंट किया है उसकी बिजली बिहार को भी मिलनें का उल्लेख नमो ने किया, और कहा किकेंद्र सरकार के अति महत्वपूर्ण तथा बहुउद्देशीय अभियान “स्किल डेवलपमेंट” का मुखिया बिहार का ही है. नमो ने बिहार की इस श्री गणेश रैली में जता दिया कि वे बिहार को हर हाल में प्राथमिकता दे रहे हैं और उसके विकास को लेकर न केवल कटिबद्ध हैं अपितु इसकी देखरेख भी वे स्वयं कर रहें हैं.

 

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1 Comment on "चंदन कोई है नहीं – भुजंग फैले हर कहीं"

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suresh karmarkar
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दस वर्षों तक भाजपा के प्रेमपाश में बंधे रहने के बाद उसे सर्प की उपमा देना और और स्वयं को चन्दन बताना बड़बोलापन नहीं तो कम से कम धोखा तो है/यही भाजपा नमो के स्थान पर नीतीशजी को प्र.म। पद का दावेदार बनाती तो भाजपा चंदन हो जाती. लोकसभा चुनाव में हुई हार के कारण जब जवाबदारी ली और मांझीजी को मुख्यमंत्री बनाया तो फिर वापस क्यों सत्तासीन हो गये. असल में नीतीशजी ने जो छबि बनायी थी स्वयं ने ही ध्वस्त कर दी, अब उनका कॅरियर अंतिम पड़ाव पर है. आने वाले चुनाव में यदि लोकसभा के परिणाम दोहराये… Read more »
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