लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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देशवासियों के आदर्श एवं प्रेरणास्रोत-fb2

‘माता भूमि पुत्रो अहं पृथिव्या’ इस वेद की सूक्ति में निहित मातृभूमि की सेवा व रक्षा की भावना से सराबोर देश की आजादी के अविस्मरणीय योद्धा, देश के प्रथम गृहमंत्री एवं उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने देश की आजादी और और उसकी उन्नति के लिए जो सेवा की है वह इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। गुजरात प्रान्त के करमसद गांव में 31 अक्तूबर सन् 1885 को आपका जन्म हुआ। आपके पिता श्री झबेर भाई पटेल दूसरे व्यक्तियो की भूमि पर खेती कर जीवनयापन करते थे। आप बहादुर एवं पक्के देश भक्त थे। श्री झबेर भाई पटेल सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में महारानी लक्ष्मी बाई की सेना में भर्ती होकर आप अंग्रेजों एवं उनके भारतीय वफादारों के विरूद्ध लड़े थे। इंदौर के महाराजा ने गिरफ्तार कर आपको अपने यहां बन्दी बनाया जहां संयोग से महाराजा को शंतरज के खेल में अपनी चालों से विजय दिलवाकर आप मुक्त हुए। यहां से आप अपने गांव पहुंचे और पुनः खेती करने लगे।

श्री झबेर भाई के दो पुत्र थे। बड़े पुत्र श्री विट्ठल भाई ने असेम्बली के प्रधान के रूप में आश्यर्चजनक प्रतिभा का परिचय दिया। दोनों भाईयों को बहादुरी एवं युद्ध प्रियता के गुण अपने पिता से विरासत में मिले थे। वल्लभ भाई की प्रारंभिक शिक्षा माता-पिता की देखरेख में गांव में हुई। इसके बाद नदियाद एवं बड़ोदा में आपने शिक्षा प्राप्त की। मैट्रिªक की परीक्षा आपने नदियाद से पास की। बचपन में आपकी वीरता का उदाहरण तब मिला जब आपकी कांख के फोड़े को लाल गर्म लोहे की सलाखा से भोंकने वाले व्यक्ति में हिम्मत की कमी देखकर आपने स्वयं ही गर्म लाल लोहे की सलाख से फोड़े को दाग दिया। मौलाना शौकत अली ने एक बार आपके बारे में यथार्थ ही कहा था कि वल्लभ भाई बरफ से ढके ज्वालामुखी के समान हैं। उनके साथियों ने यह अनुभव किया कि उनके हृदय में हमेशा आग धधकती रहती है जो असंख्य लोगों को दग्ध करने की क्षमता रखती है। इसी कारण उनका रक्त सदैव उबाल मारता रहता था, भुजायें फड़कती रहती थी एवं वाणी सदा पाप, अन्याय व अत्याचार के विरूद्ध आग उगलने के लिए तत्पर रहती थी।

यद्यपि वल्लभ भाई विदेश जाकर बैरिस्टर बनना चाहते थे परन्तु पारिवारिक विपन्नता के कारण आपने अपने इस विचार को स्थगित कर मुख्तारी की परीक्षा पास करके गोधरा में प्रैक्टिस की। आपकी प्रैक्टिस अच्छी चली और अल्प-काल में ही विदेश यात्रा हेतु आवश्यक धन अर्जित कर लिया। आपके बड़े भाई विट्ठल भाई भी विलायत जाने के इच्छुक थे। स्वर्जित धन से आपने पहले बड़े भाई को विदेश भेजा एवं स्वयं उनके तीन वर्ष बाद सन् 1910 में विलायत गये। कालान्तर में बड़े भाई के राजनीतिक गतिविधियो में भाग लेने के कारण आपने उन्हें पारिवारिक दायित्वों से मुक्त कर कुटुम्ब का पालन किया। गोधरा में गांधी जी की अध्यक्षता में प्रांतीय राजनीतिक सम्मेलन में वल्लभ भाई को राजनीतिक कार्यों की उपसमिति का मंत्री बनाया गया। आपके महत्वपूर्ण कार्यों के कारण आप शीघ्र ही गुजरात प्रांत में लोकप्रिय हो गये। सार्वजनिक जीवन में आपको पहली सफलता गुजराज में ‘बेगार प्रथा’ का उन्मूलन करने पर मिली। आपके द्वारा सत्याग्रह की धमकी से कमिश्नर घबरा गया। आपसे वार्तालाप कर उसने बेगार प्रथा के उन्मूलन की मांग स्वीकार कर ली।

गांधी जी के सम्पर्क में आने पर उनकी रीति-नीति के प्रति आपको विशेष रूचि नहीं हुई। आपको लगा कि अहिंसा एवं सत्याग्रह कमजोर आदमी के हथियार हैं। अहमदाबाद के मजदूरों के आन्दोलन की सफलता पर पहली बार आपको गांधी जी केे आत्मबल का परिचय मिला। गांधी जी के प्रति आपके मैत्री भाव ने ही आपको सक्रिय राजनीति में प्रविष्ट कराया। सन् 1917 में खेड़ा जिले में जब फसल खराब हो गई और सरकार द्वारा किसानों की लगान वसूल न करने की मांग को ठुकरा दिया गया तब भी गांधी जी की प्रेरणा पर आपने यह कार्य अपने हाथ में लिया। अहमदाबाद के इस कुशल बैरिस्टर ने गांव-गांव घूमकर चेतना पैदा की। किसान लगान के विरूद्ध सत्याग्रह के लिए कमर कस कर तैयार हो गये। किसानों के तेवर को देखकर सरकार झुक गई। इस सफलता ने गांधी जी के प्रति आपके आदर भाव को और बढ़ा दिया। प्रथम महायुद्ध की समाप्ति पर रालेट एक्ट का विरोध करने के लिए गांधी जी ने देशभर में हड़ताल की घोषणा की। 4 मार्च 1914 को देश ने नये युग में प्रवेश किया। अहमदाबाद में बल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में रालेट एक्ट के विरूद्ध की गई हड़ताल को मिली भारी सफलता से सरकार डर गई। जुलूस में सत्याग्रहियों पर गोलियां चलाईं गईं। दिल्ली की हड़ताल का नेतृत्व गुजरात के टंकारा गांव में जन्में महर्षि दयानंद सरस्वती के शिष्य स्वामी श्रद्धानन्द ने किया। दिल्ली के चांदनी चौक पर अभूतपूर्व जुलूस को जब अंग्रेजी सरकार के गोरखे सैनिकों ने बंदूक की संगीने दिखाकर विफल करना चाहा तो इस वीर पुरूष ने संगीनों के सामने जाकर छाती खोकर ललकार कर कहा कि ‘‘हिम्मत है तो चलाओं गोली।” इस घटना ने भी आजादी के आंदोलन में एक नया इतिहास रचा। सन् 1920 में कांग्रेस द्वारा असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पारित करने पर वल्लभभाई पटेल ने बैरिस्टरी का ही त्याग नहीं किया अपितु अपने दोनों पुत्रों को भी अध्ययन हेतु विलायत जाने से रोक दिया। आप दोनों पुत्रों की उच्च शिक्षा हेतु विलायत जाने की पूरी तैयारी कर चुके थे।

गांधी जी के बंदी बना लिए जाने पर गुजरात में कांग्रेस के नेतृत्व का भार आपको सौंपा गया जिसे आपने सफलतापूर्वक निभाया। असहयोग आंदोलन में स्कूल व कालेजों का बहिष्कार करने वाले विद्यार्थियों के लिए आपने ‘‘गुजरात विद्यापीठ” की जुलाई 1920 में स्थापना की और इस निमित्त धनसंग्रह कार्य में भी सफलता प्राप्त की। धन संग्रहार्थ आप बर्मा भी गये। इससे पूर्व गुरूकुल कांगड़ी, हरिद्वार हेतु धन संग्रहार्थ आचार्य रामदेव एवं विद्यामार्तण्ड पं. विश्वनाथ विद्यालंकार आदि भी बर्मा गये थे। राष्ट्र निर्माण में इन दोनों संस्थाओं ने बहुमूल्य सेवायें दी हैं। सन् 1923 में बोरसद के किसानों को एक ओर जहां डाकुओं ने परेशान किया वहीं सरकार ने पुलिस पर अतिरिक्त व्यय को भी लगान में जोड़ दिया। परेशान किसानों ने बल्लभ भाई के पास जाकर अपना रोना रोया। आपने किसानों को बढ़ा लगान देने से मना किया और बोरसद का स्वयं भ्रमण कर स्थिति का जायजा लिया। आपके प्रयास से वहां 200 स्वयं सेवक तैयार किए गए जिन्होंने डाकुओं का मुकाबला करने का संकल्प लिया। परिणाम यह हुआ कि डाकुओं के आक्रमण बंद हो गये और सरकार भी पटेल जी की हुंकार से झुक गई। इस सफलता ने भी आपको देश भर में लोकप्रिय बना दिया।

नागपुर के एक भाग में राष्ट्रीय झंडे पर प्रतिबन्ध एवं जमना लाल बजाज की गिरफ्तारी के बाद वल्लभ भाई ने सत्याग्रह का मोर्चा संभाला। पुलिस ने वल्लभ भाई की सक्रियता से भयभीत होकर प्रतिबंध वापिस लेकर उन्हें अजेय योद्धा सिद्ध किया। इसके बाद गुजरात में बाढ़ से हुई तबाही के अवसर पर भी आपने 2,000 स्वयं सेवक तैयार कर सहस्रों बाढ़ पीड़ितों के प्राणों की रक्षा की। इन दिनों आप गुजरात प्रदेश में कांग्रेस के प्रधान के साथ अहमदाबाद म्युनिस्पल बोर्ड के भी अध्यक्ष थे। पांच वर्षों के कार्यकाल में आपने जन कल्याण एवं नागरिकों के स्वास्थ्य संबंधी जो उपयोगी योजनायें बनाई थी, वह देश भर के लिए अनुकरणीय सिद्ध हुईं। गुजरात में जल प्रलय के बाद बाढ़ से खेतियों को हानि से अन्न के अभाव ने स्थानीय किसानों को भुखमरी के कगार पर ला खड़ा किया। इस अवसर पर भी वल्लभ भाई ने दुर्भिक्ष पीड़ितों को सरकार से एक करोड़ पचास लाख रूपयों की सहायता स्वीकृत करवाकर उसके वितरण की सराहनीय व्यवस्था की जिसमें भ्रष्टाचार की लेशमात्र भी कहीं गुंजाइश नहीं थी। सरकार ने भी आपकी प्रबंध व्यवस्था की सराहना की। इस कार्य ने वल्लभ भाई को एक सक्षम नेता के साथ योग्य व्यवस्थापक भी सिद्ध किया।

गुजरात के एक ताल्लुके बारदौली में सरकार द्वारा लगान में तीस प्रतिशत की वृद्धि से परेशान किसान वल्लभ भाई के पास आये और उन्हें न्याय दिलाने हेतु प्रार्थना की। वल्लभ भाई ने स्वयं छानबीन कर इस वृद्धि को अन्यायपूर्ण पाया। आपने किसानों को समझाया कि इस अन्याय के विरूद्ध संघर्ष का परिणाम सरकार द्वारा नानाविध किसानों का उत्पीड़न होगा जिसमें कुर्की, बलात्कार, बच्चों की भुखमरी भी शामिल है। किसानों द्वारा हर प्रकार के त्याग का आश्वासन देने पर आपने आंदोलन की बागडोर संभाली। सन् 1928 में गवर्नर से लगान वृद्धि पर पुनर्विचार करने को कहा गया। आपके द्वारा की गई मांग ठुकरा दिये जाने से आंदोलन आरंभ हुआ। सरकार द्वारा लगान चुकाने की तिथि निश्चित कर संवेदनाशून्य होने का परिचय दिया। इस पर वल्लभ भाई ने किसानों को लगान की एक पाई भी सरकार को न देने का एलान किया। इस एलान से मानसिक दृष्टि से असंतुलित सरकार ने उत्पीड़न के सभी साधनों का प्रयोग किया। वल्लभ भाई हर स्थिति से जूझने के लिए पहले से ही तैयार थे। बारदौली को आपने कई भागों में बांटकर वहां छावनियां स्थापित कर दी थीं जिनमें संदेशवाहक निरन्तर सम्पर्क रखते थे एवं आपके गुप्तचर सरकारी गतिविधियों की सभी सूचनायें वल्लभ भाई तक पहुंचातें थे।

बारदौली का यह सत्याग्रह देश भर में चर्चित हुआ। मुम्बई असेम्बली के अनेक सदस्यों ने सदस्यता से त्यागपत्र देकर सरकार के विरूद्ध अपना असन्तोष प्रकट किया। अन्ततः सरकार को झुकना पड़ा। इस सत्याग्रह की सफलता ने आपको देश का प्रथम पंक्ति का नेता बना दिया। सरदार की उपाधि भी आपको इस अवसर पर मिली। इसके बाद आप सरदार पटेल के नाम से जाने गये। 31 दिसम्बर 1929 को लाहौर कांग्रेस के अधिवेशन में पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पारित हुआ। इसके अनुसार गांधी जी ने डांडी यात्रा की तैयारी की। सरदार पटेल ने गुजरात के एक गांव ‘‘रास” में सभा करके इलाके के कलेक्टर के प्रतिबन्ध को चुनौती दी। परिणामतः आपको गिरफ्तार किया गया और पांच सौ रूपये जुर्माने के साथ तीन माह की कैद का दंड मिला। बंदीगृह में आपका भार पन्द्रह पौण्ड घट गया। इस कारण 26 जून 1930 को आप रिहा हुए। यह आपका आजादी के आंदोलन में प्रथम कारावास था।

जब आप बाहर आये तो स्वतंत्रता आंदोलन पूरे यौवन पर था। आंदोलन की बागडोर पं. मोतीलाल नेहरू के हाथों में थी। उन्होंने जेल जाते समय सरदार पटेल को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर देश का नेतृत्व उन्हें सौंप दिया था। मुम्बई से आपने स्वतंत्रता आंदोलन का संचालन किया। 1 अगस्त को लोकमान्य तिलक की बरसी पर लाखों लोगों की अनुशासित भीड़ ने मुम्बई में जुलूस निकाला। बोरी बंदर स्टेशन से आगे पुलिस ने जुलूस को जाने नहीं दिया। शक्ति परीक्षण हुआ। लाखों की भीड़ ने वहां रात्रि भर बैठकर मोर्चा संभाला। रूष्ट पुलिस ने लाठी और गोलियां चलाई। सैकड़ों को गोलियां लगी और लोगों के सिर फूटे। सरदार पटेल को जिम्मेदार मानकर उन्हें गिरफ्तार किया गया एवं मुकदमा चलाया। तीन माह का कारावास का आपको दंड मिला। इसी बीच गांधी-इरविन समझौता हो जाने पर 25 जनवरी 1931 को आप रिहा कर दिए गए।

कांग्रेस में सरदार पटेल का गांधी जी के पश्चात दूसरा स्थान बन गया। यही कारण था कि आपको कांग्रेस के अधिवेशन का अध्यक्ष बनाया गया। कराची का मार्च 1931 का अधिवेशन घटनापूर्ण रहा। अधिवेशन से कुछ दिन पूर्व ही भगत सिंह को फांसी पर चढ़ाया गया था। आर्य विद्वान अनूप सिंह का मानना था कि यदि गांधी जी चाहते तो भगत सिंह को फांसी से बचा सकते थे। अहिंसा को समर्पित बापू ने प्रसिद्ध क्रांतिकारी दुर्गा भाभी के इस संबंध में निवेदन को भी गंभीरता से नहीं लिया था। यह तथ्य भगत सिंह के साथी शहीद सुखदेव लिखित पुस्तक में दिए गए थे। भगत सिंह, सुखदेव एवं राजगुरू की शहादत से आहत कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष सरदार पटेल ने सभापति के जुलूस का समारोह इन देशभक्तों की याद में स्थगित कर अद्भुत साहस का परिचय दिया। अध्यक्ष पद से सरदार पटेल द्वारा दिया गया भाषण ऐहितहासिक सारगर्भित एवं अनोखा था।

कराची कांग्रेस में सत्याग्रह की घोषणा की गई। गांधी जी विलायत से खाली हाथ लौटे थे। सरदार पटेल को सरकार ने पुनः गिरफ्तार कर लिया । जेल में आपका स्वास्थ्य अत्यधिक गिर जाने के कारण आपको रिहा कर दिया गया। स्वास्थ्य की परवाह न कर आपने चुनाव युद्ध में कांग्रेस के प्रत्याशियों को सफल बनाने के लिए देश का व्यापक दौरा किया। आप कांग्रेस पार्लियामेंटरी बोर्ड के अध्यक्ष थे। आठ प्रांतों में कांग्रेस का मंत्रिगंडल सत्तारूढ़ था। मंत्रियों पर सरदार पटेल का कड़ा अनुशासन था जिसके परिणामस्वरूप मध्य प्रांत के मुख्य मंत्री डाक्टर खरे को पद छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था। सन् 1942 के स्वाधीनता के निर्णायक युद्ध में कांग्रेस कार्य समिति के सदस्यों के साथ 9 अगस्त 1942 को आपको अहमदनगर जेल में बंद कर दिया गया। 15 जून 1945 को आप जेल से मुक्त हुए। इसी दिन अंग्रेजी सरकार ने भारत को स्वतंत्रता प्रदान करने की अपने संकल्प की घोषणा भी की। मुस्लिम लीग द्वारा आजादी के रास्ते में डाली जा रही अड़चनों का आपने मुंहतोड़ करारा उत्तर दिया और जिन्ना को लताड़ते हुए कहा कि तलवारों का जवाब तलवारों से दिया जायेगा और आजादी विरोधी बातें करने वालों को कड़ी सजा दी जायेगी। सरदार पटेल ने आत्मरक्षा के लिए जनता को हथियार उठाने के उनके अधिकार की पुष्टि की और कहा कि कायर की तरह मरने से हथियार चलाते हुए स्वाभिमान से मरना अधिक अच्छा है। देश की आजादी के बाद हैदराबाद रियासत के नवाब उस्मान अली की कार पर बम फेंकने वाले दो आर्य युवकों को भी आपने दिल्ली में बुलाकर सम्मानित किया था। 21 सितम्बर 1946 को कांग्रेस मंत्री-मण्डल बनने पर आपको रियासती विभाग, गृह विभाग एवं प्रचार मंत्री के साथ उप प्रधानमंत्री बनाया गया। आपने अपनी बुद्धिमत्ता से जो सफलतायें प्राप्त कीं उसने देश विदेश के राजनीतिज्ञों को आपका प्रशंसक बना दिया। मुस्लिम लीग के विरोध एवं अंग्रेज सरकार के उसके प्रति सहयोगी रूख के बावजूद 9 दिसम्बर, 1946 को संविधान सभा का अधिवेशन करवाकर आपने अपनी अदम्य इच्छा शक्ति, दृणता एवं दूरदर्शिता का परिचय दिया। आपने चुनौती पूर्ण शब्दों में कहा था कि ‘आकाश चाहे गिर पड़े, पृथिवी चाहे फट जाये, विधान सभा का अधिवेशन 9 दिसम्बर से पीछे नहीं होगा।’ आपने अपनी चुनौती को सत्य सिद्ध कर दिखाया।

पाकिस्तान को पृथक राष्ट्र बनाकर लगभग 600 रियासतों को स्वतंत्रता प्रदान कर एवं मुसलमानों में हिन्दू विरोधी भावनायें भरकर अंग्रेजों ने विप्लव एवं अराजकता की स्थिति पैदा कर दी थी। सरदार पटेल ने इस विषम परिस्थिति में अपनी कूटनीतिज्ञता से देश के शत्रुओं के सभी षडयंत्रों को विफल कर भारत के इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया। 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अल्पकाल में 552 रियासतों के भारत में विलय की घटना सरदार पटेल के यश को सदैव अक्षुण रखेगी। यह ऐसी घटना है जिसके लिए यह देश हमेशा सरदार पटेल का कृतज्ञ रहेगा। कश्मीर, जूनागढ़, एवं हैदराबाद रियासतों के असहयोगी रूख का भी आपने यथोचित समाधान किया। कश्मीर पर पाकिस्तान के आक्रमण ने कश्मीर के भारत में विलय का कार्य प्रशस्त किया। जूनागढ़ के नवाब की बुद्धि भी आपने बिग्रेडियर गुरदयाल सिंह के नेतृत्व में भारतीय सेनायें भेज कर ठिकाने लगाई। नवाब रियासत छोड़कर ही भाग गया। 12 नवम्बर, 1947 को जूनागढ़ पहुंचकर आपने हैदराबाद के नवाब को खबरदार करते हुए कहा कि उसका भी वही हश्र होगा जो जूनागढ़ का हुआ है। 17 सितम्बर, 1948 को आपने मात्र 4 दिन के पुलिस एक्शन में हैदराबाद रियासत के घुटने टिकवा दिये। इस प्रकार आपने अंग्रेजों द्वारा स्वतंत्र सभी रियासतो का भारत में विलय करवाकर राष्ट्र यज्ञ को सफलतापूर्वक सम्पन्न किया।

सरदार पटेल ने स्वाभिमान का जीवन जीकर स्वयं में लौह पुरूष के व्यक्तित्व को चरितार्थ किया। गांधी जी के शब्दों में आपकी निमर्मता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता था कि जब अदालत में वकील की हैसियत से बहस करते हुए आपको अपनी पत्नी की मृत्यु (11 जनवरी, सन् 1909) का समाचार मिला तब भी आपने अपना कर्तव्य नहीं छोड़ा और बहस जारी रखी। मृत्यु के तार को पढ़ लिया औरे मोड़कर जेब में रख लिया। बहस समाप्त होने के बाद आपने अदालत से विदा ली। 15 दिसम्बर, सन् 1950 को प्रातः 9.30 बजे मुम्बई में हृदयरोग से आपकी मृत्यु हुई। इससे पूर्व स्वास्थ्य लाभ हेतु आप देहरादून भी आये थे। आपकी मृत्यु से देश ने अपने सबसे बहुमूल्य रत्न को खो दिया। भारत की राजनीति में यह महापुरूष ‘न भूतो न भविष्यति’ सिद्ध हुआ।

लौहपुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने अंग्रेजों द्वारा स्वतंत्र सभी रियासतों को भारत में मिलाकर जो उदाहरण प्रस्तुत किया उसकी संसार के इतिहास में कोई मिसाल नहीं है। आपने वह असम्भव कार्य कर दिखाया जो सम्राट अशोक और चन्द्रगुप्त भी नहीं कर सके और अन्य किसी नेता में यह क्षमता नहीं थी। उन्होंने विधर्मियों द्वारा लूटे गये सोम मन्दिर का भी पुनरूद्धार कर एक अविस्मरणीय कार्य किया। यह देश का सौभाग्य था कि उन दिनों सरदार पटेल हमारे पास थे अन्यथा इतिहास हमारे लिए अत्यन्त दुःखद होता। देश के हित में किए गए यशस्वी कार्यों के कारण यह देश उनका हमेशा ऋणी रहेगा। भारत के इतिहास में आप सदा-सदा के लिए अमर हैं और देश की राजनीति में नेताओं के प्रेरणास्रोत रहेंगे। हम यह भी कहना चाहते हैं कि श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्रीय सरकार ने सरदार पटेल की स्मृति को अक्षुण बनाने के लिए जिन कार्यों की घोषणायें की हैं, वह स्वागत योग्य है। उनके जन्म दिवस 31 अक्तूबर, 2014 को भी केन्द्र सरकार के नेतृत्व में आजाद देश के इतिहास में पहली बार सरदार पटेल की गरिमा के अनुरूप देश की ‘‘एकता एवं अखण्डता दिवस” के रूप में मनाया गया। उनकी जो 182 मीटर की देश की सबसे ऊंची और भव्य मूर्ति बनाई जा रही है वह भी सरदार की ओर से उनको यथोचित एक स्तुत्य कार्य है। किसी को भी इस कार्य को मूर्ति पूजा की दृष्टि से नहीं देखना चाहिये। सरदार पटेल के आकार व शारीरिक रूप के अनुरूप ही यह मूर्ति बनेगी और वहां जो भवन व संग्रहालय बनेगा उसमें उनसे सम्बन्धित पुष्ट जानकारी के साथ देश भर में उनके योगदान की चर्चा होगी। पर्यटल स्थल बनने के कारण देश विदेश के लोगों सहित हमारी वर्तमान और भावी पीढ़ी इनकी गरिमा को जान सकेगी। हमें लगता है कि सरदार पटेल के साथ न्याय किए जाने से सीमित अर्थों में देश में अच्छे दिन आ गये हैं। सरदार पटेल की स्मृति को कोटिशः नमन। हम यह भी कहना चाहते हैं कि देश में एक व्यक्तित्व और ऐसा है जिसके साथ देश ने न्याय नहीं किया है। उसका नाम है महर्षि दयानन्द सरस्वती। उन्होंने विलुप्त वेदों के आधार पर सत्य सनातन धर्म और संस्कृति का पुनरूद्धार करने के साथ कांग्रेस की स्थापना से 10 वर्ष पूर्व सन् 1875 में अपने कालजयी ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के माध्यम से देश को स्वतन्त्रता और स्वराज्य का सर्व प्रथम मूलमन्त्र दिया था। देश से अज्ञान, अन्धविश्वास, कुरीतियां व पाखण्डों को दूर कर देश को आधुनिक युग के अनुरूप बनाने में सर्वाधिक योगदान किया। देश को विधर्मियों द्वारा षडयन्त्र पूर्वक किए जा रहे धर्मान्तरण से बचाया। क्या इनके साथ देश कभी न्याय करेगा?

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