लेखक परिचय

रामस्‍वरूप रावतसरे

रामस्‍वरूप रावतसरे

एक जागरूक पत्रकार और कर्मठ समाजसेवी रामस्वरूप रावतसरे गत 20 वर्षों से लगातार लेखन के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। अखिल भारतीय साहित्य परिषद राजस्थान के संगठन मंत्री रामस्वरूप जी ने अनेक पत्र-पत्रिकाओं मे अपनी लेखन कला की छटा बिखेरी है। संप्रति- सहायक सम्पादक (भारतीय पक्ष मासिक पत्रिका)

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रामस्वरूप रावतसरे

शिक्षा ही अवसरवादी हो गर्इ है ।

मैं अपने घर में बैठा था कि हमारे घर के तथा कथित नीति निर्धारक चाचा चतरू ने दरवाजे पर आकर नोकिगं की । मै उठता उससे पहले ही मेरी बेगम ने उठ कर दरवाजा खोला और आदब की पाजिषन में आते हुए उनका स्वागत सत्कार कर घर में प्रवेश दिलाया, यह अलग बात है कि हम जितना बाहर वालों के लिये बिछ जाते है उसके पांचवें हिस्से का भी सम्मान घर वालों को नही देते।

खैर वे आये और उनके लिये अतिथि देवों भव: का सा व्यवहार हुआ । हम एक नपुषक की तरह यह सब देख रहे थे । चाचा चतरू का ध्यान जब हमारी बेगम से हटा तो हम उन्हें नजर आये बोले छुटटन तुम अभी घर में ही हो मेरे कबाड युक्त दिमाग में बिजली सी चमकी कि क्या चचा चतरू मेरी अनुपसिथति जान कर ही घर में आये थे। जैसे कि हमारे यहां राजनीति में होता रहा है । लेकिन बेगम की चचा चतरू में उत्सुक्ता को ध्यान में रखते हुए हमने अपने आप को अपने फटे पुराने कपडों में ही सीमित रखा। क्यों कि बाहर आते तो निश्चित है कि कपडों को ही फाडकर बाहर आया जाता । फिर महिलाऐं जिसकी नजरों में चढी रहना चाहती है उसकी आप बेइज्जती करों, यह अपने हाथों पैर पर कुल्हाडी मारने जैसा है ।

मैंने कहा हां! चचा आपकी दुआ से मै घर पर ही हू। वे बोले अरे मेरे कहने का मतलब है कि तुम आज कहीं काम वाम पर नही गये क्या? मैंने कहा चचा एक ही काम करते करते उकता गये है। अब कोर्इ नया काम करने की जुगत कर रहे है। चचा ने कहा तुम क्या नया काम करोगें मजदूरी के अलावा। मैंने भी हुकार भरी कि जब निकम्मे समझे जाने वाले देश को चला सकते है तो क्या हम कोर्इ नया काम नही कर सकते बस किसी का आशीर्वाद मिल जाय ।

चचा चतरू ने मुझे तिरछी नजरों से देखा और बोले हमारे यहां यह चलन है कि किसी बडे आदमी का हाथ सिर पर आजाय फिर देखों गधा भी घोडे को मात दे देता है और देता आ रहा है । घोडे जिनकी कीमत नही होती थी, उसकी कद काठी और चाल को देख कर ही मांगा गया मुल्य चुका दिया जाता था। अब ऐसा नहीं है। आज घोडो से लोग कतराने लगे है । कि उसकी कद, काठी, चाल एक अलग ही पहचान को दिखाती है । उसपर कुछ भी लादा नही जा सकता, उसे घोडे के अलावा कुछ भी कहा नही जा सकता। घोडा नाम आदमजात में भी फिट नही बैठता जबकि गघा नाम आम है उसे कहीं भी उपयोग में लिया जा सकता है उससे कुछ भी काम लिया जा सकता है । आज के समय में जितनी उपयोगिता गधे की है उतनी धोडे की श्रेणी में माने जाने वाले दो पाये या चौ पाये की नहीं है । आज कल बडे लोगों का आशीर्वाद भी उसे ही मिलता है जिसमें गघे होने के तमाम गुण हो और वह गधेपन की तमाम हरकतें पूर्ण कर सकता हो ।

चचा कुछ रूके , बेगम द्वारा परोसा गया पानी का गिलास हल्क में उतारा और फिर दार्षनिक की तरह बोले हरिया तुम गधे की श्रेणी में नही आ सकते, क्योंकि तुम अपनी एक अलग ही पहचान रखते हो । यह जमाना पहचान बनाये रखने वालों का नहीं है, पहचान को बदलते रहने वालों का है । देखा नही तुमने जो नेता अपनी पहचान को समय के अनुसार बदलते रहते है उनकी हमेषा पौबारह रहती है।

चचा उठे और यह कहते हुए दरवाजा लांध गये कि हरिया जिन्दगी में कुछ करना है तो बडे लोगों की शिक्षा पर चलों। मैं विचार करने लगा कि कौन से बडे लोगों की शिक्षा पर चलूं उन लोगों की शिक्षा पर जो आज नही है पर उन्होने देश व समाज के लिये सत्य निष्ठा को सामने रख कर आगे बढने की शिक्षा दी थी। या इन बडे लोगों की शिक्षा पर जो आज मौजूद हैं जिनकी शिक्षा ही अवसरवादिता बन कर रह गर्इ है ।

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