लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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विजय कुमार

छात्र जीवन से ही मेरी आदत अति प्रातः आठ बजे उठने की है; पर आज सुबह जब कुछ शोर-शराबे के बीच मेरी आंख खुली, तो घड़ी में सात बज रहे थे। आंख मलते हुए मैंने देखा कि मोहल्ले में बड़ी भीड़ थी। कुछ पुलिस वाले भी वहां दिखाई दे रहे थे।

मोहल्ले की इस समस्या में शामिल होना मेरा भी कर्तव्य था। अतः ‘‘रंज लीडर को बहुत है, मगर आराम के साथ..’’ की तर्ज पर जल्दी से दो कप चाय पीकर कुछ जरूरी काम निबटाये और फिर शिवराज पाटिल की तरह ठीक से प्रेस किये हुए, कलफदार कपड़े पहनकर मैं बाहर आ गया। अब तक भीड़ और बढ़ गयी थी। कुछ पत्रकार और उनके चित्रकार साथी भी आंख मलते हुए वहां आ गये थे।

मैंने पूछताछ की, तो पता लगा कि शर्मा जी के घर चोरी हो गयी है। इस बारे में लोग तरह-तरह के अनुमान, संदेह और शंकाएं व्यक्त कर रहे थे, जिन्हें सुन-सुनकर शर्मा जी बौखला रहे थे।

स्थानीय पुलिस चौकी का मुखिया मोहल्ले वालों से पूछताछ कर जांच के नाम पर खानापूरी कर रहा था। तभी सायरन बजाती हुई नीली बत्ती वाली जीप के साथ बड़े दरोगा जी प्रकट हुए। शर्मा जी के साथ ही मोहल्ले वालों को भी अब कुछ आशा बंधी। दरोगा जी ने भी इधर-उधर देखा, कुछ संूघने की सी कोशिश करते हुए उन्होंने शर्मा जी को एक ओर बुलाया। उनके कान में धीरे से फुसफुसाते हुए बोले – यह निश्चित रूप से किसी चोर का काम है।

शर्मा जी का मन हुआ कि दरोगा का मुंह नोच लें। जो बात सारे मोहल्ले को पता है, उसे दरोगा जी ऐसे बता रहे हैं, जैसे किसी गहरे कुएं से बड़ा भारी रहस्य खोज कर लाये हों।

कुछ-कुछ ऐसा ही पिछले दिनों मुंबई में हुए बम धमाकों के बाद हुआ। देश का बच्चा-बच्चा जानता है कि इनके पीछे उन्हीं पाकिस्तान प्रेरित इस्लामी आतंकवादियों का हाथ है, जो कई साल से भारत को अस्थिर करने के प्रयास में लगे हैं; पर देश के सत्ताधारी नेताओं के वक्तव्य देखें, तो ऐसा लगता है कि वे मूर्खों की काल्पनिक दुनिया में रह रहे हैं।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्नाण जी ने फरमाया – इन हमलों से सिद्ध हो गया है कि आतंकी समूह अभी भी सक्रिय हैं और अपनी इच्छा से कहीं भी हमला करने में सक्षम हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने राज्य में गृहमंत्री की कुर्सी गठबंधन में शामिल दूसरे दल के नेता को देने को भी अपनी भूल माना।

तीन वर्ष पूर्व मुंबई में हुए आतंकी आक्रमण के कारण तत्कालीन गृहमंत्री को कुर्सी छोड़नी पड़ी थी। अतः वर्तमान गृहमंत्री के लिए भी चोंच खोलना जरूरी था। वे दक्षिण मुंबई के सांसद और मंत्री बनने की खुशी मना रहे मिलिंद देवड़ा के साथ मुंबई पहुंचकर बोले – भारत के हर नगर को अब भी आतंकियों के समन्वित हमले से खतरा है। काश, कोई चिदम्बरम् का गला पकड़ कर पूछे कि फिर तुम और तुम्हारी सरकार किस मर्ज की दवा है ?

देश में चाहे कैसी भी दुर्घटना हो जाए, मैडम इटली चुप ही रहती हैं; पर राहुल बाबा की चुप्पी उनके भावी जीवन के लिए उचित नहीं है। अतः वे बोले कि हर हमले को रोकना संभव नहीं है। उनका संदेश साफ था कि देशवासियों को आगे भी ऐसे हमलों के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए।

राहुल बाबा के बाद इस खानदान के भोंपू दिग्विजय सिंह न भौंके, ऐसा कैसे संभव है ? उनकी इस फितरत को देखकर लोग उन्हें (डाग)विजय सिंह कहने लगे हैं। उन्होंने इन धमाकों का आरोप भी हिन्दू संस्थाओं पर लगा दिया। सुना है वे ‘बम संदेश यात्रा’ लेकर हिन्दू बस्तियों में जाने वाले हैं। वे लोगों को बताएंगे कि जब तक भारत में हिन्दू अल्पसंख्यक नहीं हो जाएगा, तब तक उसके वोट से बनी सरकार, उसकी जानमाल की क्षति के बावजूद, उसे ही आरोपी ठहराती रहेगी।

ऐसे शूरवीरों की भारत में कोई कमी नहीं है। कुछ लोग वक्तव्य देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं, तो कुछ लोग मोमबत्तियां जलाकर या मौन जुलूस निकालकर। सच बोलने में सबकी जबान लड़खड़ाती है कि जब तक मजहबी तुष्टीकरण की इस विषबेल को जड़ ने नहीं काटेंगे, जब तक कसाब और मोहम्मद अफजल जैसे आतंकवादियों को सार्वजानिक रूप से फांसी नहीं देंगे, तब तक ऐसे हमले होते ही रहेंगे।

काम पर जाते समय मैंने देखा कि शर्मा जी के घर के बाहर भीड़ छंट चुकी है। दरोगा जी भी एक सिपाही को वहां छोड़कर हफ्ता वसूली के अपने नियमित काम पर चले गये थे। हां, शर्मा जी अब भी सिर पर हाथ रखे अपने भाग्य को कोसते हुए वहां बैठे थे। कुछ दूरी पर हो रहे किसी कार्यक्रम में एक गाना जोर से बज रहा था –

ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का

इस देश का यारो क्या कहना..। 

यह गाना मैंने हजारों बार सुना है। आज भी इसमें इतना दम है कि बच्चों से लेकर बूढ़ों तक को सड़क पर, तथा अनशनरत नेताओं को राजघाट पर थिरकने को मजबूर कर देता है; पर मुझे लगा कि वर्तमान परिस्थिति में इसमें निम्न संशोधन कर देना चाहिए।

वक्तव्य वीर नेताओं का, नाकारा और बेहयाओं का

इस देश का यारों क्या कहना..।

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1 Comment on "व्यंग्य : इस देश का यारों क्या कहना.."

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kuldeep singh
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व्यंग्य : इस देश का यारों क्या कहना.. पड़ कर बहुत अशा लगा . भाई विजय कुमार
राष्ट्रवादी ग्रन्थालय सभा
कुलदीप सिंह चग्गर
प्रेसिडेंट हरियाणा स्टेट

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