लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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shahrukh-khanप्रसिद्ध फिल्मी सितारे शाहरुख खान को अमेरिकी हवाई अड्डे पर रोक लिया गया। उनके साथ यह तीसरी बार हुआ है। शिवसेना की पत्रिका ‘सामना’ ने लिखा है कि शाहरुख को लौट आना चाहिए था। ‘सामना’ ने व्यंग्य का जो तीर छोड़ा है, उसे वह छोड़ना ही था। शाहरुख को क्यों रोका गया? पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को भी क्यों रोका गया था? सिर्फ उनके नाम के कारण! अमेरिकी सरकार ने अपने कंप्यूटर में ऐसी तरकीब कर रखी है कि कोई अरबी या फारसी का नाम दिखे कि वह पकड़ा जाए। जाहिर है कि जिन देशों की ये भाषाएं हैं, वे मुसलमानों के देश हैं। लेकिन उन देशों के लोग भी पकड़े जाते हैं, जिन देशों की भाषा अरबी-फारसी नहीं है। क्यों पकड़े जाते हैं?

क्योंकि वहां के मुसलमान अपने नाम अरब-फारसी में रख लेते हैं लेकिन इंडोनेशिया के किसी औसत मुसलमान को क्या अमेरिकी कंप्यूटर पकड़ सकता है? बहुत मुश्किल है। क्यों? क्योंकि उनके नाम अपनी भाषा में होते हैं। इंडोनेशिया के जगत्प्रसिद्ध राष्ट्रपति का नाम सुकर्ण था। हमारे महाभारत में सिर्फ कर्ण है। लेकिन वे सुकर्ण थे। उनके ससुर का नाम अलीशास्त्रविद जोजो था याने शास्त्रों का पंडित! सुकर्ण की बेटी का नाम मेघावती है। एक और राष्ट्रपति हुए है, जिनका नाम सुहृत था, जिन्हें अंग्रेजी में भ्रष्ट करके ‘सुहारटो’ बोला जाता है। हमारे फिल्मी सितारें दिलीपकुमार, मधुबाला और मीनाकुमारी ने यदि अपने नाम हिंदी में रख लिये तो क्या वे मुसलमान नहीं रहे?

मेरा निवेदन यह है कि यदि ईसाई और मुसलमान-धर्म विदेशों में पैदा हुए हैं तो हुए हैं लेकिन कोई जरुरी नहीं है कि उनके मानने वाले लोग अपने नाम विदेशी भाषाओं में ही रखें। स्वदेशी भाषाओं में यदि वे अपने नाम रखें तो क्या उनकी ईसाइयत या मुसलमानियत घट जाएगी? नहीं, बिल्कुल नहीं। ईरान, मध्य एशिया के पांचों इस्लामी गणतंत्र, इंडोनेशिया, चीन, जापान और मलेशिया के करोड़ों मुसलमानों ने अपने नाम अपनी देसी भाषाओं में रखे हुए हैं। क्या वे घटिया मुसलमान हैं? अच्छा और आदर्श मुसलमान वही है, जो इस्लाम की बुनियादी बातों को अपने जीवन में ईमानदारी से लागू करने की कोशिश करता है लेकिन मुसलमान होने का मतलब अरबों की अंधी नकल करना नहीं है।

अरबी नाम रखने में भी कोई बुराई नहीं है। लेकिन प्रत्येक देश का मुसलमान अपने देश की सभ्यता और संस्कृति की सब मुफीद बातें मानता रहे और इस्लाम का दृढ़ता से पालन करता रहे तो वह एक बेहतर मुसलमान सिद्ध होगा। मैं तो अरब देशों के शेखों और आलिम-फाजिल विद्वानों से भी अर्ज करता रहता हूं कि आप हमारे मुसलमानों को ऊपर बताए गए रास्ते पर चलने दें तो वे दुनिया के बेहतरीन मुसलमान सिद्ध होंगे, क्योंकि तब हजारों बरस पुरानी भारतीय संस्कृति व सभ्यता के हीरों-जवाहरात से वे वंचित नहीं होंगे।

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2 Comments on "शाहरुख: नाम ने फंसाया"

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डॉ. मधुसूदन
Guest
डॉ. मधुसूदन
मौलिक प्रश्न। क्या सचमुचमें केवल शाहरुख के नाम ने फँसाया है? सारे मुस्लिम बंधुओं को जान लेना चाहिए, कि, नाम ने नहीं, पर आतकवादियों के कामने फँसाया है। दुनिया के पास और कोई उपाय नहीं है;आतंक के नियंत्रण के लिए। आप बताइए; आतंक पर अंकुश कैसे लगाया जाए? क्या आप हर साँप से दूर नहीं रहते? तो क्या हरेक साँपने आपको काटा है? इस्लाम के ग्रंथों में सुधार करनेका उचित समय निकला जा रहा है। जो एडोप्ट और एडॅप्ट नहीं करता वो नष्ट होता है— हिस्ट्री ऑफ नेचर में पढिए। बडे बडे डायनासोर भी बदल्ले नहीं तो कालकवलित हो गए।… Read more »
sahani
Guest

PROBLEM IS OUR nation where we have no leaders to teach poor and fools who convert to islam. Our congress who was anti hindu is cause of our education system. Foolish local convert thought they can marry arabs if they have arab names. but arab hate all converts .
Nation with no identity ( like Pakistan , Bangladesh ) people with no roots will always be hated by own race and by adopted race.

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