लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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jayतमिलनाडू राज्य सरकार सस्ती दर पर प्रदेश की जनता को बोतल बंद शुद्ध पानी पिलाएगी। मुख्यमंत्री जयललिता को यह कदम इसलिए उठाना पड़ा,क्योंकि जब सरकार ने अवैध तौर से चल रही 92 कंपनीयों पर कानूनी शिकंजा कसा तो प्रदेश की सभी 200 मिनरल वाटर कंपनियों ने हाड़ताल कर दी। चोरी और सीना जोरी की इस मनमानी के चलते लोगों को ब्लेक में पानी खरीदना पड़ा। कंपनियों की इस खुदगर्जी से तंग आकर जयललिता ने किफायती दाम में शुद्ध पानी मुहैया कराने की दृष्टि से राज्य में ‘अम्मा मिनरल वाटर’ की नौ इकाइंया लगाने की ठान ली है। इन इकाइयों में पूंजी निवेश और जल वितरण का काम राज्य परिवहन निगम करेगा। जयललिता का कदम इसलिए उल्लेखनीय है,क्योंकि अब तक सरकारें गरीब और स्थानीय समुदायों से जल संसाधन छीनकर देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले करती रही हैं। देश में आर्थिक उदारवादी नीतियां लागू होने के बाद शायद यह पहला अवसर है, जब कोई राज्य सरकार जनता की पानी जैसी बुनियादी जरूरत की पूर्ति के लिए कंपनियों से प्रतिस्पर्धा के लिए सामने आई है।

जया सरकार की यह पहल चेन्नई के निवासियों के लिए खासतौर से लाभदायक होगी, जिन्हें हाल ही में बोतलबंद पानी बेचने वाली फर्मों की हड़ताल के कारण परेषान होना पड़ा। तमिलनाडू प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने गैर कानूनी तरीके से संचालित 92 इकाइयों को बंद कर दिया था, जिसके विरोध में वैधानिक रूप से पानी का उत्पादन कर रहीं प्रदेश की 200 कंपनियां भी हड़ताल में शामिल हो र्गइं। कानूनी ढंग से काम कर रही कंपनियों के इस कदम से इस अशंका को बल मिला है कि ये कंपनियां गैर कानूनी कंपनियों से बोतलें खरीदकर,उन पर अपने ब्रांड का ठप्पा लगाकर पेयजन की आपूर्ति के अवैध करोबर से जुड़ी थीं। वरना बिना लायसेंस के पानी बेच रही कंपनियों पर अंकुश लगाने से तो लाइसेंसधारी कंपनियों को ही लाभ होता ? राज्य के सरकारी तंत्र को इस विरोधाभासी पहलू की तह में जाने की जरूरत है ? हो सकता है कि इन गैर लायसेंसी कंपनियों को बेनानी रूप से लायसेंसधारी कंपनियां ही चला रही हों ? जिससे आय और विक्रय कर के झमेलों से बचा जाए। गर्मियों में जल की कमी के दौरान अपने ब्रांड का लेबिल लगाकर मंहगे दामों पर पानी बेचकर बेहिसाब मुनाफा भी कमा लिया जाए।

जयललिता ने दावा किया है कि अन्नाद्रमुक के दिंवगत नेता और राज्य के पूर्व मुखयमंत्री सीएन अन्नादुरई की जयंती 15 सिंतबर को गुम्मीपुंडी में पहली इकाई की अधिकारिक शुरूआत कर दी जाएगी। बाद में 9 इकाइयां और स्थापित की जाएंगी। जयललिता ने केंद्र की गलत आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाते  हुए कहा है कि यह कितनी दुर्भाग्य व विषंगति पूर्ण स्थिति है कि भारतीय रेल जहां यही पानी की बोतल 15 रूपये में बेचती है, वहीं कंपनियां 20 रूपये में बेचती हैं। अब अन्ना मिनरल वाटर की बोतल महज 10 रूपये में मिलेगी। गौरतलब है कि हड़ताल के दौरान चेन्नई निवासियों को बड़ी संख्या में प्यासा रहना पड़ा था, क्योंकि यहां के ज्यादातर लोग चेन्नई निगम की और से उपलब्ध कराए जाने वाले पानी के आलावा पानी की बंद केनों पर निर्भर रहते हैं। 20 लीटर पानी की एक केन की कीमत सामान्यतया 25 से 30 रूपये के बीच की रहती है। हड़ताल के दिनों में यह कीमत बढ़कर 80 रूपये तक पहुंच गई थी। इस स्थिति से निपटने के लिए जयललिता ने कंपनी मालिकों के सामने निहोरे करने की बजाए, उनसे होड़ लेने का जो संकल्प लिया है, वह उनकी न केवल मजबूत इच्छाशक्ति का परिचायक है,बल्कि अवाम को सस्ता पानी उपलब्ध कराने की दृष्टि से भी लिया गया अहम फैसला है। समावेशी विकास की अवधारणा ऐसी ही योजनाओं को अमल में लाने से होगी, न कि कंपनियों को लूट की खुली छुट देने के फैसलों से ?

वैसे भी भोजन पानी और आवास के हक देष के प्रत्येक नागरिक के संवैधानिक अधिकारों में शामिल हैं और पानी राज्यों की सूची का विषय है। लेकिन भूमण्डलीय आर्थिक उदारवाद और निजीकरण की नीतियों को बढ़ावा देने के ऐवज में ऐसी कोशिशें तेज हुईं, जिससे हरेक नागरिक की इस बुनियादी व अपिवार्य जरूरत को मुनाफे के कारोबार में बदला जा सके। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुख्य पैरोकर और योजना आयोग के अध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलुवालिया ने पानी के निजिकरण की दृश्टि से एक जल राष्ट्रीय नीति बनाने की पहल की थी। उनका कहना था,पानी की बार्बादी रोकने की नई कानूनी व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि हर एक बूंद का सदुपयोग हो सके। लिहाजा देश के नीति निर्माता इस दिशा में आगे बढ़ें। इसी नजरीये को कानूनी रूप देने के लिए वाई के अलग समीति वजूद में लाई गई। इसका मकसद एक राष्ट्रीय कानून बनाकर पानी के न्यायपूर्ण वितरण को सुनिश्चित करना था। इसकी सिफारिशों में कहा गया है कि सरकार गरीब व वंचितो को भूख से छुटकारे के लिए जिस तरह से खाद्य सुरक्षा विधेयक लाने के लिए प्रतिबद्ध है,उसी तर्ज पर उसे सभी नागरिकों के लिए जल सुरक्षा तय करने की दृष्टि से कानूनी उपाय करना जरूरी है। इसके अंतर्गत प्रति व्यक्ति 25 लीटर पानी की उपलब्धता निर्धारित की जानी चाहिए। गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन कर रहे लोगों को इतना ही पानी मुफ्त मुहैया करना चाहिए। अन्य सामाजिक वर्गों के लोगों का आमदनी के आधार पर वर्गीकरण करके एक सारणी बनाई जाए। और उसी आधार पर उन्हें शुल्क तय करके पानी दिया जाए। समीति की सिफारिशों में यह सुझाव भी दर्ज है कि जिस तरह से खाद्य सामग्री सार्वजनिक वितरण प्रणाली के मार्फत उपभोक्ता तक पहुंचाई जाती है, इसी तर्ज पर पानी का वितरण हो? चूंकि पीडीएस का संचालन राज्य सरकारें करती है, इसलिए संघीय ढ़ाचे का भी उल्लघंन नहीं होगा और पानी राज्य की सूची से जुड़ा विशय भी बना रहेगा। मसलन इन सिफारिशों पर अमल होता है तो अब तक तो केवल खाद्य सामग्री के लिए ही मारी-मारी और कालाबजारी होती है,अब पानी भी इसमें शामिल हो जाएगा। जाहिर है पानी के हर स्त्रोत पर पहरा बिठा दिया जाएगा और पानी के समय पर वितरण न होने की स्थिति में गांव-गांव पानी के लिए जंग के रास्ते खोल दिए जाएंगे। हमारी अनैतिक राजनीतिक और भ्रष्ट प्रशासनिक व्यवस्था में जल जैसे जीवनदायी तत्व का न्यायपूर्ण वितरण आज के माहौल में मुमकिन ही नहीं है।

दरअसल पानी पर कंपनी के एकाधिकार की मुहिम को संयुक्त राष्ट्र भी आगे बढ़ रहा है, जिससे यूरोपीय देशों की कंपनियां विकासशील देशों में घुसपैठ बनाकर जल-दोहन के आसान कारोबार में लग जाएं। इसी नजरिए से संयुक्त राष्ट्र ने पानी और स्वच्छता को मानवाधिकार घोषित किया,जबकि हमारे संविधान में यह आधिकार पहले से ही सुरक्षित है। संयुक्त राष्ट्र की महासचिव बान की मून ने कहा था कि पानी और स्वच्छता के बुनियादी अधिकारी मिल जाने का यह मतलब कतई नहीं है कि सबको पानी मुफ्त में हासिल हो,बल्कि इसका  मतलब है कि जल की जरूरतें सस्ती दरों पर पूरी हों, क्या इस बयान से इस बात की पुष्टि नहीं होती कि पश्चिमी देशों और उनके हितों की पैरोकार संस्था संयुक्त राष्ट्र पानी जैसी प्राकृतिक संपदा को लाभ के धंधे में बदलने का नीतिगत विश्वव्यापी दबाव बनाने में लगी है, जिससे पानी बाजारवाद का हिस्सा बन जाए ? ऐसे मे जयललिता की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की होड़ सुखद पहल है। अन्य राज्यों को भी इस निर्णय से प्रेरित होने की जरुरत है।

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