लेखक परिचय

सरिता अरगरे

सरिता अरगरे

१९८८ से अनवरत पत्रकारिता । इप्टा और प्रयोग के साथ जुडकर अभिनय का तजुर्बा । आकाशवाणी के युववाणी में कम्पियरिंग। नईदुनिया में उप संपादक के तौर पर प्रांतीय डेस्क का प्रभार संम्हाला। सांध्य दैनिक मध्य भारत में कलम घिसी, ये सफ़र भी ज़्यादा लंबा नहीं रहा। फ़िलहाल वर्ष २००० से दूरदर्शन भोपाल में केज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टर और एडिटर के तौर पर काम जारी है। भोपाल से प्रकाशित नेशनल स्पोर्टस टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता अपनी कलम की धार को पैना करने की जुगत अब भी जारी है ।

Posted On by &filed under मीडिया.


सरिता अरगरे

पत्रकारिता हमेशा से जोखिम भरा काम रहा है, लेकिन इस खतरे में वैश्विक तौर पर लगातार इजाफा हो रहा है। जनहित और सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर निर्भीकता से कलम चलाने वाले इन खतरों से बखूबी वाकिफ़ हैं। पूँजीवाद के दौर में कलम के सिपाहियों को माफ़ियाओं के साथ ही सत्ता के नशे में चूर राजनीतिज्ञों का कोपभाजन भी बनना पड़ता है । आज खबर लेना और खबर देना दोनों खतरे में हैं। पत्रकारों पर बढ़ रहे ऐसे हमलों से प्रेस की स्वतंत्रता खतरे में पड़ती जा रही है। इस समय पत्रकारों को सरकार और गैर कानूनी काम करने वालों के हमलों का सामना करना पड़ रहा है। पत्रकारों के खिलाफ हिंसक गतिविधियाँ लगातार बढ़ रही हैं। मुंबई में अँग्रेजी अखबार “मिड डे” के क्राइम रिपोर्टर ज्योतिर्मय डे की हत्या और बिजनेस स्टैंडर्ड, दिल्ली के कपिल शर्मा का मामला ताजातरीन मिसाल है।

अभी पाकिस्तानी पत्रकार सलीम शाहजाद की हत्या का पखवाड़ा भी नहीं बीता था कि मुम्बई में क्राइम रिपोर्टर ज्योतिर्मय डे की हत्या कर दी गई। शहजाद जिस तरह आईएसआई और कट्टरपंथी तबकों की बखिया उधेड़ रहे थे। उसी तरह ज्योतिर्मय डे भी मुंबई की माफिया जमात पर अपनी खोजी रिपोर्टिंग से लगातार खतरे खड़े कर रहे थे। अपने साथियों के बीच “जेडे” के नाम से मशहूर क्राइम रिपोर्टर,बीते कुछ महीनों से डीजल माफिया के खिलाफ धारावाहिक खोज रिपोर्टों के जरिए अभियान चला रहे थे।मुम्बई में अंडरवर्ल्ड पर कई रिपोर्ट लिखने वाले जेडे की मोटरसाइकिल सवार चार लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। इससे पहले बीते साल 20 दिसम्बर को छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में दैनिक भास्कर के पत्रकार सुशील पाठक की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जब वह घर लौट रहे थे। इस साल 23 जनवरी को नईदुनिया के पत्रकार उमेश राजपूत की मोटरसाइकिल सवार नकाबपोशों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी।

दूसरी तरफ़ हकीकत सामने लाने का साहस दिखाने वाले नामानिगारों को सबक सिखाने के लिये सरकारों के पास तमाम हथकंडे हैं। 11 और 12 जून 2011 की दरम्यिनी रात बिजनेस स्टैंडर्ड के पत्रकार कपिल शर्मा को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लेकर प्रताड़ित करने का मामला भी सामने आया। इसी तरह 26/11 हमले में जब्त हथियार खुले में रखे होने के मामले को सामने लाने वाले मुम्बई के पत्रकार ताराकांत द्विवेदी को सरकारी गोपनीयता कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया । अभिव्यक्ति और भाषण की स्वतंत्रता उल्लंघन के मामलों पर निगरानी रखने वाले ‘द फ्री स्पीच ट्रैकर’ के अनुसार,देश में पत्रकारों पर हमले की वारदात तेज़ी से बढ़ रही हैं। सम्पादकों और लेखकों को लगातार धमकियाँ मिल रही हैं। संगठन ने पत्रकारों पर हुए 14 हमलों का हवाला देते हुए कहा है कि भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी खतरे में है ।

माफिया से टकराने की कीमत जेडे को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। उनकी हत्या पेट्रोलियम माफिया ने की या किसी अंडरवर्ल्ड गिरोह ने या फिर उसके पीछे किसी नौकरशाह अथवा नेता का हाथ है। इस पर फ़िलहाल कयास ही लगाये जा सकते हैं। लेकिन मामले की जाँच में सामने आये तथ्य जेडे के खुलासों से माफिया जगत में मची खलबली की पुष्टि करते हैं। उन्हें मिल रही धमकियाँ भी इसी ओर इशारा करती हैं। डीजल माफिया की शासन-प्रशासन से साँठ-गाँठ अब जगज़ाहिर है। कुछ लोग तो सप्रमाण कहते हैं कि छुटभैये नेता डीजल माफिया के पेरोल पर होते हैं । अपने कारोबार में आड़े आने वाले सरकारी मुलाज़िमों को रास्ते से हटाने में भी इन्हें कोई गुरेज़ नहीं होता।

जेडे तीसरे भारतीय पत्रकार थे, जिनकी पिछले छह माह में हत्या की गई। इन सभी मामलों में जाँच जारी है, लेकिन कोई पुख्ता सबूत हाथ नहीं आये हैं। पत्रकारों की हत्या के मामले तो सुर्खियों में रहते हैं, लेकिन गुत्थियाँ अनसुलझी ही रह जाती हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्था की ओर से बनाए गए ‘माफी सूचकांक 2011’ के अनुसार पत्रकारों की हत्या की गुत्थी न सुलझा सकने वाले देशों में भारत 13वें स्थान पर है। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान 10वें और बांगलादेश 11वें स्थान पर है। ‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट’ (सीपीजे) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सात अनसुलझे मामलों के साथ 13वें स्थान पर है। एक साल में पूरी दुनिया में होने वाले कार्य संबंधी हत्याओं में 70 प्रतिशत मामले पत्रकारों के हैं। सूचकांक में पत्रकारों की हत्या की अनसुलझी गुत्थियों का प्रतिशत जनसंख्या के अनुपात में निकाला गया है। यहाँ ऐसे मामलों को अनसुलझा माना गया है, जिसमें अभी तक कोई आरोपी पकड़ा नहीं गया है। फ़ेहरिस्त में इराक पहले स्थान पर है। वहां चल रहे विरोध प्रदर्शनों और खतरनाक अभियानों के दौरान बहुत ज्यादा संख्या में पत्रकारों की हत्या हुई है। इराक में 92 मामले अभी तक अनसुलझे हैं, जबकि फिलीपींस में इनकी संख्या 56 है। इसके बाद श्रीलंका और कोलंबिया का स्थान आता है।

दरअसल, विश्व भर में पत्रकारों की हत्याओं का सिलसिला किसी भी साल थमा नहीं है। भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ अभिव्यक्ति के सिद्धांत पर अमल करते हुए पूरी दुनिया में हर साल सैकड़ों पत्रकार जान देते हैं।जेडे और शाहजाद इस मुहिम में अकेले नहीं रहे। संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) की रिपोर्ट के मुताबिक 2006 से 2009 तक दुनिया में सच को आवाज़ देने की मुहिम को आगे बढ़ाते हुए 247 पत्रकार कुर्बान हो गये। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मुहिम को कलम के माध्यम से आगे बढ़ाते हुए इस दौरान भारत में छह पत्रकार बलिदान हुए। यूनेस्को की रिपोर्ट में कहा गया है कि इन वर्षों में पत्रकारों की हत्या के मामलों से स्पष्ट है कि मीडिया से जुड़े लोगों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए हैं ।

ऐसा नहीं कि सिर्फ यूनेस्को ही ऐसी रिपोर्ट पेश कर रहा है। “विदाउट बॉर्डर्स” की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 2010 में काम के दौरान 57 पत्रकार मारे गए। यह संख्या 2009 के 77 पत्रकारों की तुलना में कम है लेकिन इसका एक दूसरा पहलू यह है कि 2010 में 51 पत्रकारों को बंधक बनाया गया जो पिछले दो सालों की संख्या से कहीं ज्यादा है। “विदाउट बॉर्डर्स” के महासचिव जाँ फ्रांसोआ जूलियर्ड ने कहा भी कि पत्रकारों का बढ़ता अपहरण साबित करता है कि उनकी निष्पक्षता और काम का आदर अब नहीं किया जाता। उन्हें भी सत्ता का एक अंग समझा जाता है और अकसर उनका अपहरण सत्ता से कोई माँग पूरी करने के एवज में किया जाता है। पत्रकारों की हत्याओं ने इस सच्चाई से हमें रूबरू करा दिया है कि आर्थिक तरक्की और देश में एक लोकतांत्रिक सरकार के होते हुए भी पत्रकारों के लिए सुरक्षित जगह सिकुड़ती जा रही है। विदाउट बॉर्डर्स की रिपोर्ट में भले ही अफगानिस्तान और नाइजीरिया को पत्रकारों के लिए सबसे असुरक्षित माना गया हो लेकिन भारत में भी हालात बेहतर नहीं हैं। फरवरी 2010 में जारी इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट ने तो पत्रकारों के लिए दुनिया में सबसे खतरनाक जगह के रूप में भारत का स्थान मेक्सिको और फिलीपींस के साथ तीसरे नंबर पर रखा है।

जेडे हत्याकांड ने समाज में चलने वाली साजिशों, भ्रष्टाचार और गैरकानूनी धंधों को उजागर करने वाले पत्रकारों के लिए बढ़ते खतरे को एक बार फिर उजागर किया है। ये घटनाएँ यह बताती हैं कि किसी भी ताकतवर संस्था, व्यक्ति या गिरोह के कारनामों को जनता के सामने लाना कितना जोखिम भरा होता जा रहा है। सरकार एक तरफ “व्हिसल ब्लोअर बिल” लाकर गड़बड़ियों को सामने लाने वाले लोगों को संरक्षण देने की बात कर रही है और दूसरी तरफ पेशेवर जिम्मेदारी निभा रहे पत्रकारों को संरक्षण देने में नाकाम रही है। हत्यारों का मनोबल इसलिए बढ़ता है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में अपराधी पकड़े नहीं जाते हैं। अगर इनकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए तो पत्रकार ऐसे भ्रष्ट तत्वों का ‘आसान निशाना’ बने रहेंगे। सत्ता पक्ष मीडिया का इस्तेमाल अपने पक्ष में करना चाहता है, इसलिए वह हमें भ्रष्ट भी कर रहा है।

चैनलों और समाचारपत्रों में ठेके की नौकरियों का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है। मीडिया हाउसों में श्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं, पर सरकार खामोशी से तमाशा देख रही है। दरअसल सरकारी तंत्र अपने काले कारनामों को छिपाने के लिये पत्रकारों को खरीदने या डराने का उपक्रम करता रहता है । सरकार खुद भी चाहती है कि पत्रकार असुरक्षित रहें, ताकि वे सत्ता के खिलाफ अपनी कलम नहीं चला सकें। वे नौकरी जाने की आशंका में अपना साहस और आत्मविश्वास खो दें। रोज़ी-रोटी के सवाल पर वे भीरू हो जाएं और अपना पैनापन खो बैठें। आर्थिक संकटों से जूझते खबरनवीसों का सत्ता पक्ष आज अपने लिए बेतरह इस्तेमाल कर रहा है।

सवाल उठता है कि आखिर क्या कदम शासन उठाए कि कार्यरत पत्रकारों को अपेक्षित सुरक्षा उपलब्ध हो। पहला तो यही कि भारतीय दण्ड संहिता के प्रावधानों में संशोधन किया जाये। पत्रकारों पर हमले को संज्ञेय और गैरजमानती अपराध करार दिया जाए। इससे कुछ तो बचाव होगा। कुछ लोग मुद्दा उठा सकते हैं कि ऐसी सहायता हर भारतीय नागरिक को मिले, केवल कार्यरत पत्रकारों को ही क्यों? यहाँ यह समझना होगा कि सीमा पर तैनात सैनिक की तरह ही पत्रकारों का काम भी खतरे भरा है, जहां हमले की आशंका निरन्तर है। आखिर पत्रकार जनसेवा में कार्यशील हैं। राष्ट्रहित और समाज को जागरुक करने में पत्रकार का योगदान किसी भी नज़रिये से सुरक्षा बलों या जननायकों से कमतर नहीं है।

भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ क्रांति की मशाल जलाने वाले पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर कानून बनाने का मामला पिछले कई सालों से लंबित पड़ा है। अधिवेशनों में पत्रकार कानून बनाने की माँग उठाते रहे हैं। पत्रकार संगठनों द्वारा धरना-प्रदर्शन किया जाता है। सरकारें जल्द से जल्द कानून बनाने का आश्वासन देती हैं। नेता पत्रकारों पर होनेवाले हमले पर कानून बनाने की बात करते हैं। इस घटना में भी सब कुछ ऐसा ही हुआ है। जेडे के मारे जाने के बाद महाराष्ट्र सरकार ने उनके परिवार को पुलिस सुरक्षा देने की बात कही है। असली सवाल फिर भी रह जाता है। क्या यह हकीकत नहीं है कि पत्रकारों पर होने वाले हमले को लेकर सरकार खुद ही कानून नहीं बनाना चाहती है ?

Leave a Reply

1 Comment on "कलम के सिपाही गोली के शिकार"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
सुनील अमर
Guest
सरिता जी, आपका लेख पढ़ा, अच्छा लगा। आप चूँकि स्वयं एक पत्रकार हैं और जागरुक नागरिक भी, इसलिए आपका ऐसे मामलों पर चिन्तित होना स्वाभाविक ही है। आप के सुझाव भी समस्या के अनुकूल ही हैं। आप तो जानती ही हैं कि देश में कानूनों की कमी नहीं है। कई बार तो यह जानकर ताज्जुब होता है कि एक ही अपराध के लिए कई प्रकार के कानून मौजूद रहते हैं, फिर भी अपराधी अपने उन वकीलों की मदद से साफ बच निकलते हैं जिन्हें इन कानूनों को ठीक से दुहना आता है। पत्रकारिता, इसे ठीक से समझ लेना चाहिए, एक… Read more »
wpDiscuz