लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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पहली बार हिमालय के हिमपात के मौसम और अपनी गुफा को अकेला छोड़ गौतम और भारद्वाज मुनि दिल्ली सरकार के राज्य अतिथि होकर राजभवन में हफ्ते भर से जमे हुए थे। पर ठंड थी कि उन्हें हिमालय से भी अधिक लग रही थी।

सुबह के दस बजे होंगे कि भारद्वाज मुनि अपने वीवीआईपी कमरे से सजधज कर बाहर निकले। उस वक्त गौतम अपनी धोती को निचोड़कर सामने लगी तार पर सूखने के लिए फैला रहे थे, ‘और मुनिवर! आज की रात कैसी कटी? टीवी पर कौन सी फिल्म देखी?’ कह भारद्वाज मुनि ने शैम्पू से धुली अपनी लटों को हाथों से पीछे किया।

‘क्या बताऊं बंधु, यहां तो सबकुछ अजीब से लग रहा है। अब तो बस मौसम विभाग की उस भविष्‍यवाणी का इंतजार है कि कब जैसे वह कहे कि हिमालय पर अब मौसम सुहाना हो जाएगा तो अपने ठांव चलें। हफ्ता हो गया हमें यहां रहते हुए पर दिल्ली में दिल लग ही नहीं रहा। लगता है ये दुनियादारी अपने बस की नहीं। अपना हिमालय ही ठीक है। ये नई पीढ़ी के मुनि पता नहीं दिल्ली को ही क्यों परेफर करते हैं। यहां से उठने का नाम ही नहीं लेते। सूर्य नमस्कार कर लिया क्या?’ धोती को तार पर पूरी तरह फैलाने के बाद पास ही वेटर द्वारा रखी काफी का घुट लेते हुए उन्होंने पूछा।

‘हां तो, वह तो उठते ही कर लिया था, क्यों?? जाहिर है हम पुरानी पीढ़ी के संतों का दिन सूर्य नमस्कार से ही षुरु होता है और इस पीढ़ी के संतों का दिन नेताओं की चौखट पर नमस्कार से।’ कह वे रात को देखी फिल्म के सीनों को याद करते हुए मुसकुराते रहे।

‘कहां हैं सूर्य देव! मैं तो पिछले एक हफ्ते से उन्हें ही इस दिल्ली में ढूंढ रहा हूं। सच कहूं, जबसे दिल्ली में आया हूं सूर्य के दर्शन ही नहीं हुए हैं। अब तो कमरे की बत्ती जला उसे ही सूर्य का प्रतीक मान सूर्य नमस्कार करना पड़ेगा।’ कह वे काफी का घूंट लेने के बाद भी बहुत परेशान लगे।

‘मैं तो हफ्ते भर से यही कर रहा हूं। अब समझा दिनभर तुम्हारे बाहर न निकलने का कारण। बंधु! ये दिल्ली है ! यहां हर चीज के दर्शन हो सकते हैं पर प्रकृति के नहीं।’

‘तो ???’

‘तो क्या!! अब तो नकली का जमाना है। अचार भी नकली, विचार भी नकली। जीने के लिए ओढ़े जाओ, सबके साथ दौड़े जाओ। दिल्ली में सूर्य की जरूरत है भी कहां! एक से एक धुरंधर तो यहां सूर्य से भी तेज लिए चमक रहे हैं। उन्हें नमस्कार करो और आगे बढ़ो। यही यहां की रीत है।’

‘तो ठीक है,’ कह गौतम मुनि ने गहरी सांस ली, ‘पर तुम जा कहां जा रहे हो यों सज-धज कर?’

‘अरे भूल गए?? शाम को फोन नहीं आया था एड्स सोसाइटी वालों का कि हमें वे आयोजन का अध्यक्ष बना रहे हैं। वहीं के कार्यक्रम के लिए ही तो तैयार होकर आया हूं। सोचा था तुम भी तैयार हो गए होंगे पर तुम तो….’

‘देखा न! फिर भूल गया। इस दिल्ली की चकाचौंध ने तो रामकसम सबकुछ भुला कर रख दिया है। पर हम वहां करेंगे क्या! हम ठहरे संयमी… एड्स के बारे में हमें पता ही क्या है?’

‘अब न कैसें करें? कहेंगे मुनि बड़े चौड़े हो रहे हैं। चलो कमरे में जले रहे बल्ब को सूर्य का प्रतीक मान नमस्कार करो और कार्यक्रम के लिए पांच मिनट में तैयार हो जाओ। उनकी गाड़ी हमें लेने बीस मिनट बाद आएगी।’ पालिका बाजार से विदेशी खरीदी घड़ी में टाइम देखते भारद्वाज मुनि ने ठहाका लगाया तो आस पास के कमरों में ठहरे राज्य अतिथि जाग पड़े।

‘पर तुम ही जा आओ! मेरा मन नहीं कर रहा। अभी प्रभु स्मरण भी नहीं किया। शौच निवृत्त भी नहीं हुआ। सच कहूं! बहुत भारी खिलाती है सरकार! ये अफसर पता नहीं कैसे पचाते होंगे।’

और गौतम मुनि को लाख मनाने की कोशिश के बाद भी भारद्वाज मुनि को अकेले ही एड्स सोसाइटी के कार्यक्रम की अध्यक्षता के लिए जाना पड़ा। डरे हुए तो वे भी थे। पर क्या करते! हां हो गई तो हो गई!

शाम को कार्यक्रम से लौट कर आए तो गौतम मुनि ने डरते डरते उनसे पूछा, ‘और कैसा रहा कार्यक्रम?’

‘मजा आ गया!! तुमने एक बहुत अच्छे कार्यक्रम की अध्यक्षता का गोल्डन चांस खो दिया। हिमालय में गुफा से बाहर नहीं निकलते और यहां अपने कमरे से। आज साधु संतों को भी एक्सपोजर चाहिए यार!’

‘तो तुमने क्या कहा अध्यक्षीय भाषण में?’

‘मजे की बात!वह तो हुआ ही नहीं। बस कुर्सी पर बैठ सामने रखे काजू बादाम खाता रहा। कार्यक्रम तयशुदा टाइम से तीन घंटे बाद षुरू हुआ। मंत्री महोदय लेट थे। वे आए तो समोसे चले। फिर काफी। फिर काफी…..सब कार्यक्रम को भूल उनकी सेवा में लगे रहे। दो घंटे उनका भाशण हुआ। उन्होंने अपनी सरकार की उपलब्धियां टेप की तरह गिनाईं, फिर विपक्ष को गालियों का दौर शुरू हुआ। वे थे कि रूकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। आयोजकों को उनको रोकने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ी। उन्हें गुस्सा आ गया तो आयोजकों ने इस गुस्ताखी के लिए क्षमा मांगी, अपने दोनों कान पकड़ बोले, ‘विपक्ष को गालियां देने के लिए आपका एक और कार्यक्रम रख देंगे, ‘तो वे अपने भाषण को समाप्त करते बोले, ‘समाज से कुरीतियों को जड़ से समाप्त करने के लिए ऐसे कार्यक्रम नितांत आवश्‍यक हैं। मैं तो कहता हूं ऐसे कार्यक्रम रोज होने चाहिएं।’ कार्यक्रम को बहुत सफल बताते हुए आयोजकों को कार्यक्रम की सफलता की बधाई दे मंच छोड़ने को तैयार हुए कि पूरा हाल तालियों से गूंज उठा।

‘फिर??’

‘फिर खाना तैयार था। वाह ! क्या संसारी पकवान थे। मजा आ गया। ऐसा खा खा कर सरकार में दुराचार नहीं फैलेगा तो क्या होगा?

‘पर ये एड्स है क्या??’

‘यही तो मैं भी अभी तक सोच रहा हूं कि ये होगी क्या! पर कार्यक्रम बड़ा सफल था। सभी एक दूसरे से यही कह रहे थे।’

-अशोक गौतम

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