लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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imagesकल सुबह ही मैं हाथ से मिली दाल को हाथी के दूध से बने घी का तड़का लगाने की तैयारी कर ही रहा था कि दरवाजे पर जोर-जोर की ठक-ठक हुई। साला तड़के का तड़के ही सारा मजा किरकिरा कर दिया। इससे पहले कि अनमने से आने वाले को कोसता उठता कि दरवाजे पर पहले से भी ज्यादा जोर की ठक-ठक हुई। लगा, जो भी हो बंदा दरवाजा तोड़कर ही जैसे दम लेगा। कड़छी वैसे ही पतीले में छोड़ मैं इस डर से रसोई से उठ कर बाहर आ गया कि अगली बार बंदा दरवाजा न खोलने पर सच्ची को दरवाजा ही न तोड़ दे। कमरा किराए का होता तो किस मुए को स्यापा था। मैंने दरवाजा खोलते कहा, ‘दरवाजा खोलता हूं भैया, खोलता हूं। इतने उतावले क्यों हुए जा रहे हो! कभी तड़के वाली दाल नहीं देखी है क्या! यार, दरवाजा मेरा है, मेरे मकान मालिक का नहीं। अब मैंने यह कमरा खरीद लिया है। मकान मालिक का होता तो तेरे साथ मैं भी दरवाजे पर दो लात जमाता। मकान मालिक को तो कभी जमा नहीं सका।’

दरवाजा खोला तो सामने होनहार नेता की डे्रस पहने सड़े दांतों के नीचे बेदर्दी से पान दबाए अपने मुहल्ले के श्री चार सौ तीस! इसी तरह तरक्की करते रहे तो चार सौ चालीस होते हफ्ता न लगे। मैंने उन्हें देखते ही सारा गुस्सा अपनी जेब में थूकते पूछा,’ और भैया जी कैसे हो?”ठीक हूं। एक काम था। कर दो जिंदगी भर तुम्हारा अहसान न भूलूं।’ कह उन्होंने दोनों हाथ जोड़े।

‘न भैया जी, न, बिन हाथ जोड़े कहो! एक नहीं सौ काम कहो। आपकी आज्ञा हो तो चूल्हा बंद कर आता हूं।’

‘छोड़ो यार चूल्हा वूल्हा!क्या पका वका रहे हो?’

‘ईमानदार लोग इस देश में पका क्या सकते हैं भैया जी?’

‘पर खुशबू तो पूरे मुहल्ले में छाई है यार तुम्हारी रसोई की।’

‘चुनाव के दिन हैं सो बस जरा यों ही..’

‘अमा यार! मेरा थोड़ा सा काम कर दो बस! जीतने के बाद सालों साल ऐसी ही खूशबू से दिन रात तुम्हारी रसोई भरे रखूंगा।’ कह भैया जी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा तो कंधा टूटते टूटते बचा।

‘मतलब भैया जी!!!!’

‘पार्टी हाइकमानों को टिकट के लिए मुझे अपना बायोडाटा भेजना है।’

‘तो मैं क्या कर सकता हूं भैया जी आपके लिए?’ कहना तो चाहता था कि चोर उच्चकों का बायोडाटा बना मैं अपनी लेखनी को कलंकित नहीं करना चाहता। पर चुप रहा। आ बैल मुझे मार कम से कम मैं नहीं कहने वाला।

‘यार तेरी कलम में वो जादू है कि….बस, मेरा धांसू सा बायोडाटा बना दे। ऐसा कि किसी भी पार्टी की हाईकमान उस बायोडाटे को देख वाह! वाह!! कर उठे। सबमें मुझे टिकट देने के लिए होड़ लग जाए। बस!!’

‘आपका बायोडाटा बिन लिखे भी तो सब जानते हैं, ऐसे में बायोडाटा लिख कर देने की जरूरत क्या भैया जी! आपकी आज्ञा हो तो गैस ऑफ कर आता हूं। पतीला जल न जाए।’ मैं रसोई की ओर मुड़ने को हुआ तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ते कहा,’ छोड़ यार पतीला-वतीला। एक घिसे पतीले का क्या! मेरा बायोडाटा यहां से वहां तक कौन नहीं जानता पर साले ये पार्टी वाले हैं कि इनको लिखे पर ही विश्वास होता है। इनको बायोडाटा कागज पर उतरा देख ही उम्मीदवार की उम्मीदवारी पर यकीन होता है। अगर अबके मुझे टिकट मिल गया न तो तेरा घर पतीलों से भर दूंगा। टाइम बिलकुल थोड़ा बचा है। जितनी जल्दी हो सके मेरा बायोडाटा बना दे प्लीज!’ कह उन्होंने मेरे पांव पकड़ लिए।

‘तो क्या नीला पीला लिखना है आपका बायोडाटा भैया जी!’ मैंने पूछा तो भैया जी ने अपनी सदरी के कॉलर खड़े किए और मूछों पर ताव देता कहने लगे, ‘हां, लिखना कि मेरे पास गैर लाइसेंसी हथियार इतने हैं कि अपने चुनाव क्षेत्र तो अपने, अपनी पार्टी के हर चुनाव क्षेत्र के उम्मीदवारों के चुनाव क्षेत्र में हथियारों की कमी न आने दूं।
मेरे खानदान का तबसे ही इस चुनाव क्षेत्र में खौफ रहा है जबसे ये चुनाव क्षेत्र बना है।

हमारे खानदान ने तबसे ही भ्रष्टाचार के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जब भ्रष्टाचार का कोई नाम भी नहीं जानता था।

झूठ, मक्कारी, फरेब मुझे विरासत में मिले हैं।

मैं उस जाति से बीलांग करता हूं जिस जाति के इस चुनाव क्षेत्र में सबसे अधिक वोट हैं। जातीय समीकरण का प्रामाणिक ब्योरा विश्वास न हो तो बायोडाटे के साथ नत्थी कर रहा हूं।

मैं इस इलाके के जितने भी टिकट के लिए हाथ पांव मार रहे हैं उन सबमें सबसे अधिक बार जेल के शोभा बढ़ा चुका हूं। सच कहूं तो अपनी रात जेल में कटती है और दिन ठेके पर।

मेरे खिलाफ इस चुनाव क्षेत्र की पंचायत से लेकर हाई कोर्ट तक सैंकड़ों मुकद्दमे दर्ज हैं, पर गर्व की बात कि एक भी केस में मुझे सजा सुनाने की हिम्मत किसी भी कोर्ट को नहीं हुई।

‘मैंने अपने चुनाव क्षेत्र के सैंकड़ों प्रदर्शनों की अगुवाई की है। इस चुनाव क्षेत्र के हर चौराहे पर जाम लगाया है। हर मुहल्ले में धरने के लिए मैंने दरी बिछाई है।

मेरे पास इतनी काली संपत्ति है कि मैं पार्टी से टिकट के अतिरिक्त और कुछ न लूंगा। मेरे पास इतने लठैत हैं कि पार्टी को मैं हजारों लठैत सप्लाई कर सकता हूं, बिना किसी शुल्क के, बिना कसी देर के।

हमारे खानदान का पूरे इलाके में इतना दबदबा है कि मैं जहां कहूं मेरे चुनाव क्षेत्र के मतदाता वहीं वोट डालेंगे। कहीं और डालें तो हाथ न तोड़ दूं। हाथ किसको प्यारे नहीं होते भैया! क्या तुम्हें प्यारे नहीं?’

‘हैं! एक कम्बख्त ले दे कर हाथ ही तो हैं मेरे पास!’

‘आगे बायोडाटे में लिखना कि अगर मुझे पार्टी टिकट देती है तो मैं पार्टी की हर तरह से सेवा करने को तैयार हूं। अपने बड़े बड़े माफियाओं से सीधे संपर्क हैं।’ कह उन्होंने मेरी ओर मुस्कुराते कुछ देर देख पूछा,’ तो कब जैसे आऊं बायोडाटा लेने? आध घंटे बाद आया। दो बजे दिल्ली कूच करना है हर हाल में।’वे ऐसे मेरे यहां से उठे कि जैसे अपने घर नहीं, संसद जा रहे हों।

क्या आपको कभी कभी ऐसा नहीं लगता कि ये पढ़ा लिखा होना भी सच्ची को भाई साहब एक पंगा है।

-अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड
नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र.

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1 Comment on "व्यंग्य/सशक्त उम्मीदवार का बायोडाटा"

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परमजीत बाली
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बात तो सही है।विचारणीय है।अच्छी पोस्ट लिखी है।

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