लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

Posted On by &filed under विविधा.


modiराकेश कुमार आर्य

इस समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ‘स्वच्छता अभियान’ पूरे जोरों पर है। इस देश की सरकारों की यह प्रवृत्ति भी रही है कि यहां सरकारी योजनाओं को या तो लागू ही नही किया जाता है या फिर लागू किया जाता है तो पूरे शोर-शराबे के साथ लागू किया जाता है। वैसे ‘स्वच्छता अभियान’ कोई बुरी बात नही है इसको लागू किया ही जाना चाहिए और पूरा देश ही ‘स्वच्छ व निर्मल’ बनाने का लक्ष्य भी प्राप्त किया जाना चाहिए।

पर ‘स्वच्छता अभियान’ को केवल गली मुहल्लों की सीमाओं तक सीमित न किया जाए, इसे मनुष्य की मानसिकता में सुधार लाने की सीमा तक ले जाया जाए, जिसमें जातिवाद, संप्रदायवाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद जैसे अनेकों ऐेसे कीटाणु भरे पड़े हैं जो उसे संकीर्ण और दूसरों के प्रति अनुदार व असहिष्णु बनाते हैं। यदि हम मानव को एक ईकाई मानकर रोग का उपचार आरंभ करें तो शीघ्र ही शुभ परिणाम देखने को मिलेंगे। इसे व्यक्ति के खानपान में अपेक्षित सुधार के साथ ही जोडक़र देखा जाए। मांसाहार को पूर्णत: प्रतिबंधित किया जाए। किसी भी बूचड़खाने को स्थापित करने का लाइसेंस जारी ना किया जाए। यह एक वैज्ञानिक सत्य है कि जिस दिन एक त्यौहार विशेष पर लाखों करोड़ों पशु मारे जाते हैं उस दिन सारी मानवता को कोसती हुई उनकी चीख-पुकार सारे वायुमंडल को करूणा से भर देती है। उनकी चीख-पुकार की वे तरंगें सारे वायुमंडल में घूमती हैं और मानवता के लिए नई-नई प्राकृतिक आपदाओं का कारण बनती हैं। जब तक भारत का मानवतावाद (जो कि हर प्राणी को जीने का नैसर्गिक मौलिक अधिकार प्रदान करता है) इस स्वच्छता अभियान के साथ लाकर स्थापित नहीं किया जाएगा तब ‘मोदी सरकार’ का स्वच्छता अभियान कोई अर्थ नहीं रखता।

जहां तक खुले में शौच जाने की प्रवृत्ति को रोकने की बात है तो यह भी अंशत: ही उचित है। ध्यान रहे कि खुले में शौच जाना व्यक्ति को किसी सीमा तक स्वस्थ भी रखता था। पर इस खुले में शौच जाने की अपनी सीमाएं थीं और अपनी मर्यादाएं भी थीं। गांवों में एक दिशा विशेष महिलाओं के लिए शौच जाने हेतु सुरक्षित रहती थी, जबकि पुरूष वर्ग दूर और एक अलग दिशा में शौच जाते थे। यह बिना पैसे का ‘स्वच्छता अभियान’ था जो हमारे भीतर एक संस्कार के रूप में समाहित रहता था। इससे व्यक्ति प्रात:कालीन भ्रमण कर लेता था और शुद्घ वायु का सेवन भी उसे हो जाता था। ये सारे कार्य प्रात:काल में 4 बजे से लेकर 6 बजे या साढ़े छ: बजे तक पूर्ण हो जाते थे। इसका दूसरा लाभ यह था कि ग्रामीण लोग शौचादि के बहाने अपने खेतों को सुबह-सुबह ही देख आते थे। इससे जहां खेत की पूरी जानकारी उन्हें रहती थी वहीं स्वयं भी स्वास्थ्य लाभ ले लेते थे।

लॉर्ड मैकाले की शिक्षा पद्घति आयी तो उसने भारत को अस्वच्छ बनाना आरंभ किया। वैसे अधिकतर लोग यह मानते हैं कि लॉर्ड मैकाले की शिक्षा ने तो स्वच्छता लानी आरंभ की। पर यदि हम ऐसा नही मान रहे हैं तो उसका भी कारण है। लॉर्ड मैकाले के मानस पुत्रों ने ‘सैफ्टिक टैंक’ शहरों में बनवाने आरंभ किये तो उन टैंकों ने भूगर्भीय जल को प्रदूषित करना आरंभ किया। इन टैंकों ने लगभग सारे देश के भूगर्भीय जल को प्रदूषित करने में अहम भूमिका निभाई है। जिससे देश में अनेक बीमारियां फेेलती जा रही हैं। देश में महानगरीय व्यवस्था को स्थापित करना भी लॉर्ड मैकाले के मानस पुत्रों की सोच का ही परिणाम है। घनी आबादी की यह बड़ी समस्या होती है कि वह दूर जंगल में जाकर शौचादि से निवृत्त नही हो सकती। प्रकृति का सान्निध्य उससे छिन जाता है। तब वहां के लोग खुली नालियों, पार्कों, या सडक़ के किनारे की खाली जमीन को शौच निवृत्ति के लिए प्रयोग करते हैं। इससे गंदगी फैलती है। बीमारियां फैलती हैं, प्रदूषण बढ़ता है। इनके लिए उचित होगा कि स्थान-स्थान पर चल शौचालय स्थापित किये जाएं। रेलवे स्टेशनों पर शहरों में रेलवे के इर्दगिर्द जो झुग्गी झोंपड़ी वाले होते हैं-उनके लिए इस प्रकार के शौचालय बनवाये जाएं? अच्छा तो यह होगा कि इन्हें वहां से हटाकर स्थायी रूप से कहीं और बसाया जाए। ये लोग बड़ी बेशर्मी से खुले में शौच करते रहते हैं और गाडिय़ां वहां से गुजरती रहती हैं।

पुराने समय में लोग खुले में शौच जाते थे तो अपने मल को खेत में मिट्टी से दबाकर आते थे इससे उत्तम ‘मल विनष्टीकरण’ का कोई अन्य ढंग नही हो सकता। इस क्रिया से मल की बदबू वातावरण में नही फैलती थी। पर मल मिट्टी के साथ मिलकर 24 घंटे में ही खाद बन जाता था, जिससे खेत की उत्पादन क्षमता बढ़ती थी। इसके अतिरिक्त आजकल शौचालय में जिन सीटों को हम बैठने के लिए प्रयोग करते हैं-उन्होंने हम सबको बीमार कर दिया है। घुटनों को मोडक़र बैठने से मलद्वार कहीं अधिक दबाव के साथ खुलता है-जिससे पेट साफ होने की संभावनाएं अधिक रहती हैं। जबकि जिन सीटों पर हम बैठकर आजकल मल त्याग करते हैं उन से मलद्वार पर अधिक दबाव न पडऩे से पेट ढंग से साफ नहीं होता। फलस्वरूप व्यक्ति पेट रोग और घुटनों के दर्द आदि का शिकार होता जा रहा है।
अंग्रेजों की नकल ने हमारी जीवन प्रणाली बदल दी है। प्रात:काल 4 बजे उठना लोगों ने बंद कर दिया है, लेटसेट उठे और लैट्रिन में घुस जाते हैं। उससे मानसिक विकार, पेट विकार, तनाव, चिड़चिड़ापन, ब्लड प्रैशर आदि बढ़ते हैं। जो लोग समझ रहे हैं-वे इस बीमार करने वाली जीवन प्रणाली से बच रहे हैं और वास्तविक ‘स्वच्छता अभियान’ पर जोर दे रहे हैं। अच्छा हो कि मोदी सरकार स्वच्छता के लिए अपेक्षित मनोभूमि तैयार करे, और लोगों को इस दिशा में जागरूक करे। ‘स्वच्छता अभियान’ सचमुच एक बड़ा कार्य है, पर इस पर अभी और भी ‘होमवर्क’ करने की आवश्यकता है। इसकी नब्ज पर अभी सरकार का हाथ गया नहीं है।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz