लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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शैलेन्द्र चौहान
हमारे यहां स्वास्थ्य सेवाएं अत्यधिक महंगी हैं जो गरीबों की पहुँच से काफी दूर हो गयी हैं।  स्वास्थ्य, शिक्षा, भोजन, आवास जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं हैं। हमारे देश में गरीबों और अमीरों के बीच खाई बेहद चौड़ी हो चुकी है। इसे पाटने का किसी का अभिप्रेत  नहीं है। दरअसल आर्थिक व सामाजिक विषमताएं, स्वास्थ्य की असमान स्थितियों को जन्म देती हैं। कुपोषण तो एक बड़ी समस्या है ही। हमारे देश की 70 प्रतिशत संपत्ति व स्रोतों पर कुछ हजार से भी कम लोगों ने कब्जा जमा रखा है। आज हमारे देश की तकरीबन आधी आबादी 20 से 32 रुपये प्रतिदिन में गुजर-बसर करने को मजबूर है, लेकिन दूसरी ओर कुछ हजार लोग 5 से 6 करोड़ रुपये का पैकेज लेते हैं। असमानता की यह खाई दिनों दिन और चौड़ी होती जा रही है। संविधान में इस बात का प्रावधान होते हुए भी कि नागरिकों को स्वास्थ्य व शिक्षा प्रदान करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी, सरकार इसे पूरा करने से अक्सर मुकरती रही है। स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण जारी है जिससे आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। आम लोग आज जहां बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर हमारा देश मेडिकल टूरिज्म के नाम पर विदेशी अमीरों के स्वास्थ्य की सैरगाह बनता जा रहा है। स्वास्थ्य पर खर्च की तुलना जब हम अन्य देशों से करते हैं तो हमारे देश का स्थान नीचे से छठवां आता है। यानी हमारे देश से ऊपर मलेशिया, श्रीलंका, थाइलैंड व बांग्लादेश  हैं, चीन को तो छोड़ ही दिया जाए। समाप्त योजना आयोग के अनुसार भारत में छह लाख चिकित्सकों, 10 लाख नर्सो तथा 2 लाख दंत चिकित्सकों की कमी थी। इनके साथ-साथ पैरामेडिकल स्टॉफ की भी भारी कमी है। मध्य प्रदेश में 1155 प्राथमिक स्वास्थ्य केंदों में से 196 तो बिना चिकित्सकों के ही संचालित हैं। वर्तमान में देश में विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों के लगभग 11,25,000 चिकित्सक विभिन्न चिकित्सा परिषदों में पंजीकृत हैं जिनमें से मात्र 1,25,000 ही सरकारी अस्पतालों में काम कर रहे हैं।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2002 में कहा गया है कि सार्वजनिक स्रोतों का उपयोग समाज के सभी वर्गो के लिए नहीं, बल्कि कुछ विशेष पात्रता वाले वर्गो के लिए ही किया जाएगा। जो लोग सक्षम हैं, उनसे यह आशा की जाती है कि वे निजी क्षेत्रों से स्वास्थ्य सेवाओं को खरीदें। निजीतंत्र को स्थापित किए जाने हेतु सरकार ने आर्थिक खासकर विदेशी निवेश, बीमा पॉलिसी, कर छूट आदि कई ऐसे प्रावधान किए हैं जो कि स्वास्थ्य सेवाओं को बाजारीकृत करने में मददगार है। इसके अलावा मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा दिए जाने से से भी निजीकरण को मदद मिली है। इनके मद्देनजर तमाम राज्यों की सरकारों ने किस्म-किस्म के विशेष पैकेज बनाए हैं ताकि स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजी तंत्र के निवेश को उभारा जा सके। निजी चिकित्सा और नर्सिग महाविद्यालय, निजी अस्पताल, नर्सिग होम्स, डायग्नोस्टिक केंद्र इत्यादि खोलने वालों के हौसले बढ़ाने के लिए सरकार हरसंभव प्रयास करती है। इसके लिए उन्हें सस्ती जमीनें, स्टांप ड्यूटी में छूट, बिजली के बिलों में छूट आदि दिया जाता है। लगातार स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के पीछे सरकार द्वारा अपनाई जा रही वे नीतियां हैं जो आम लोगों से किए गए वायदों के खिलाफ जाती हैं। अब तो किसी भी सेवा का मूल उद्देश्य अधिक से अधिक मुनाफा कमाना हो गया है। विकास के दोषपूर्ण मॉडल के क्रियान्वयन से लोगों की जीवन शैली में कई नकारात्मक किस्म के बदलाव आने स्वाभाविक हैं। आज जीवन शैली से जुड़ी बीमारियां ज्यादा देखने को मिल रही हैं। वर्ष 2009 के अपने दस्तावेज में सरकार ने पीपीपी यानी निजी सरकारी सहभागिता को और बढ़ाने पर जोर दिया है। पीपीपी मॉडल को आम जन के हित में बताने के लिए इसे निजी निवेश से चलने वाली सार्वजनिक परियोजना का नाम दिया गया है। यह अलग बात है कि सार्वजनिक-निजी भागीदारी का सर्वाधिक खामियाजा आम लोगों को ही उठाना पड़ता है। स्वास्थ्य पर हमारे देश में जो स्थितियां हैं उससे यह भी निकलता है कि देश में जनस्वास्थ्य की स्थितियां कमोबेश बेहतर नहीं हैं। खासकर मध्यमवर्गीय और निम्नवर्गीय समाज में बेहतर स्वास्थ्य रखना और बिगड़े हुए स्वास्थ्य को दुरुस्त करना खासा मुश्किल हो रहा है। स्वास्थ्य के निजीकरण ने इस क्षेत्र को सेवा क्षेत्र से लाभ आधारित व्यवस्था का पर्याय बना दिया है। भारत जैसा गरीब और विकासशील देश जहां मातृ एवं शिशु मृत्यु दरों का प्रतिशत दुनिया के तमाम छोटे व विकासशील देशों से भी बदतर है, में अब तकरीबन 80 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर निजी क्षेत्र का कब्जा है। देश में स्‍मार्ट सिटी, बुलेट ट्रेन जैसे ढांचागत इंतजामों की बात तो हो रही है, पर 4 लाख डॉक्‍टरों, 7 लाख बिस्‍तरों और 40 लाख नर्सों की कमी को पूरा करने की तरफ किसी का ध्यान नहीं है। बात हो रही है स्‍वास्‍थ्‍य बीमा और ‘मैनेज्‍ड केयर’ की, जहां सरकार की भूमिका सेवा प्रदाता की नहीं, सेवाओं के खरीदार की होगी। बीमा कराने वाले सभी परिवारों को इन ‘मैनेज्‍ड केयर’ नेटवर्क से जोड़ा जाना है। सरकार स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के लगातार दैत्‍याकार होते बाजार को खत्‍म करने की बात नहीं कर रही, जिसका निशाना शहरी संपन्‍न तबके और विदेशी पर्यटक हैं। ये वे लोग हैं, जो 70 हजार रुपए में हो सकने वाली हार्ट सर्जरी के लिए 7-10 लाख रुपए चुकाने को तैयार हैं। अगर हम भारत में सालाना 14 फीसदी की तेज रफ्तार से बढ़ रहे दवा उद्योग पर नजर डालें तो समझ पाएंगे कि ब्रांडेड दवाओं के नाम पर 1 रुपए की मामूली गोली को 1000 रुपए तक में बेचने वाली दवा कंपनियों का कारोबार बीते दो दशक में किस तरह फला-फूला है। साथ ही यह भी कि क्यों  हर साल देश के शीर्ष 10 अमीरों में 3-4 नाम दवा उद्योग से होते हैं ? ध्यान देने की बात है कि ग्रामीण भारत में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन द्वारा बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया करने का  काम वर्ष 2005 में प्रारंभ किया गया था। इसके अंतर्गत यह तय किया गया था कि सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 3 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च किया जाएगा। मिशन ने अपने 7 वर्ष का पहला चरण पूरा कर लिया है पर प्रथम चरण की समाप्ति तक यह प्रतिशत 1.3 पर ही तक ही रहा।  मिशन के अंतर्गत ग्रामीण भारत के स्वास्थ्य के साथ एक भद्दा मजाक किया गया।  आंकड़े बताते हैं कि भारतीय ग्रामीणों को हमेशा कर्ज में डूबे रहने का सबसे बड़ा कारण स्वास्थ्य पर होने वाला आकस्मिक खर्च है। सार्वजनिक और निजी चिकित्सालयों में भर्ती होने वाले कुल मरीजों में से 40 प्रतिशत कहीं से भी कर्ज लेने या अपने घरों के जरूरी सामानों को बेचने को मजबूर होते हैं ताकि उन्हें उनके परिवार और बच्चों को सही इलाज मिल सके। तकरीबन 25 प्रतिशत लोग तो पैसा न होने के कारण इलाज कराने की हैसियत से ही बाहर रह जाते हैं। हमारे देश में स्वास्थ्य की स्थिति आय की तुलना में बेहद खराब है। यह शर्मनाक है कि वैश्विक स्तर पर भारत दुनिया में गर्भवती स्त्रियों की कुल मौत में से एक तिहाई और बच्चों की मौत में एक चौथाई के लिए जिम्मेदार है। बाल मृत्युदर में कमी आई है लेकिन शिशु मृत्युदर 56 प्रति हजार के स्तर पर है और यह बांग्लादेश जैसे निहायत गरीब मुल्क से भी खराब है। सरकार ने स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए तमाम योजनाओं की शुरुआत की लेकिन हकीकत यह है कि देश में अधिकांश स्वास्थ्य सुविधाएं निजी क्षेत्र के द्वारा वित्त पोषित हैं। कुलमिलाकर भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का 4.1 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है लेकिन एनआईपीएफपी के एक अध्ययन के मुताङ्क्षबक अगर जलापूर्ति और सफाई को भी शामिल कर लिया जाए तो स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकारी खर्च महज 1.5 फीसदी है। जबकि इन्हें निकाल देने पर यह खर्च 1.1 फीसदी और रक्षा तथा रेलवे जैसे विभागों के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को इससे अलग कर देने पर यह एक फीसदी से भी कम हो जाता है। इसे बदलकर कम से कम जीडीपी के 3 फीसदी के स्तर पर लाना होगा ताकि प्रभावी और सस्ती दरों पर सबको स्वास्थ्य बीमा आदि प्रदान किया जा सके। ऐसा कोई भी हस्तक्षेप गरीबी के स्तर पर व्यापक असर डाल सकता है। आमतौर पर घरों में खपत के स्तर पर होने वाले कुल खर्च का 10 फीसदी अथवा निर्वहन के लिए होने वाले खर्च का 40 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च हो जाता है। यह बात गरीबी रेखा के इर्दगिर्द रहने वाले लोगों पर बहुत बुरा असर डालती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा किए गए एक हालिया सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में लोग अपने कुल घरेलू खर्च का औसतन 10 फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च करते हैं। तकरीबन 24 फीसदी लोगों को स्वास्थ्य सुविधाओं पर अपनी क्षमता से आगे बढ़कर खर्च करना पड़ता है।
इसका असर उनकी अन्य जरूरतों पर पड़ता है। ऐसे तमाम खर्चों में यात्राओं पर किया जाने वाला वह खर्च शामिल नहीं है जो ग्रामीण लोग शहरी इलाकों में स्थित स्वास्थ्य सेवा केंद्रों की ओर जाने में करते हैं। इस दौरान उन्हें अपनी आजीविका के कामों से भी हाथ धोना पड़ता है। अगर खर्च के ब्योरे को बांटकर देखा जाए तो 60-70 फीसदी खर्च दवाओं पर होता है और बाकी का मरीजों को दी जाने वाली अन्य सुविधाओं पर।विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट को यदि माना जाये तो हमारे देश में 65 प्रतिशत लोगों को नियमित रूप से आवश्यक दवाएं उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। 11वीं पंचवर्षीय योजना तक स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो हासिल किया जाना था वह नहीं किया जा सका। 12वीं पंचवर्षीय योजना के बजट में वृद्धि करते हुए सरकार ने राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन प्रारंभ करने तथा पंचवर्षीय योजना के अंत तक सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च करने का वायदा किया गया। सम्भव है यह भी मात्र एक वायदा ही हो।आखिर क्‍या कारण है कि भारत में सरकारें इन तमाम चुनौतियों से आंख मूंदकर कभी जरूरी दवाओं के दाम बाजार आधारित कर देती है तो कभी ‘सबको स्‍वास्‍थ्‍य’ के अंतर्राष्‍ट्रीय वायदों से मुंह मोड़कर मुफ्त दवाओं और जांच सुविधाओं का भार राज्‍यों को सौंपकर किनारा कर लेती है। आखिर स्‍वास्‍थ्‍य की राजनीतिक अर्थव्‍यवस्‍था क्‍या कहती है और देश को किस तरफ ले जाने वाली है? आम जनता के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य की देखरेख को सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहली जिम्मेदारी है। इसके लिए जरूरी है कि सरकारें अपने एजेंडे को न भूलें और आम जनता से किए गए वायदों को पूरा करें। hospitals

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1 Comment on "स्वास्थ्य सेवाएं, गरीबों की पहुँच से दूर"

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Himwant
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उपचार एवं रोगों के रोकथाम के लिए वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति को आजादी के बाद की सरकारो ने नकार दिया। एलोपैथी में तगड़ी फ़ीस और डोनेशन ले कर डाक्टर तैयार हो रहे है जिनका एक मात्र उद्देश्य ढेर सारा पैसा कमाना रह गया है। दुसरी ओर 1 रुपए की लागत की टेबलेट 10 रुपए में बेच कर मुनाफे का बन्दर बाँट करना दवा उत्पादकों का एक मात्र धर्म रह गया है। ऐसे में सारा सिस्टम जर्जर हो गया है। ठीक करना आसान नही। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे प्रान्तों में सरकारी सुविधाए सिर्फ और सिर्फ कागज पर मौजूद है।

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