लेखक परिचय

अशोक “प्रवृद्ध”

अशोक “प्रवृद्ध”

बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

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अशोक “प्रवृद्ध”

झाँसी की रानी के नाम से लोकख्यात भारतीय स्वाधीनता संग्राम की प्रथम वनिता रानी लक्ष्मीबाई का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के भदैनी नगर के असीघाट में 19 नवंबर, 1835 को हुआ था,जिन्होंने मात्र 23 वर्ष की उम्र में ब्रिटिश साम्राज्य की सेना से संग्राम करते हुए न केवल रणक्षेत्र में वीरगति प्राप्त की थी, बल्कि अपने जीते जी अंग्रेजों को अपनी झाँसी पर कब्जा करने नहीं दिया। भारत को विदेशीय दासता से मुक्त करने के लिए सन् 1857 में हुए वृहत प्रयास, जिसे इतिहास में भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम अथवा सिपाही स्वतंत्रता संग्राम के नाम से जाना जाता है, में अंग्रेज़ों के विरुद्ध रणयज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने वाले योद्धाओं में वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का नाम सर्वोपरि माना जाता है। 1857 में उन्होंने भारत के स्वाधीनता संग्राम का सूत्रपात किया था। मराठा शासित झाँसी राज्य की रानी और 1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की वीरांगना लक्ष्मीबाई ने अपने शौर्य से अंग्रेज़ों के दाँत खट्टे कर दिए थे। अंग्रेज़ों की शक्ति का सामना करने के लिए उन्होंने नये सिरे से सेना का संगठन किया और सुदृढ़ मोर्चाबंदी करके अपने सैन्य कौशल का अप्रतिम परिचय दिया था।

काशी के पुण्य व पवित्र क्षेत्र असीघाट, वाराणसी निवासी लक्ष्मीबाई के पिता का नाम मोरोपंत तांबे और माता का नाम भागीरथी बाई था। इनका बचपन में नाम मणिकर्णिका रखा गया था, परन्तु प्यार से मणिकर्णिका को मनु कहकर पुकारा जाता था। मणिकर्णिका अर्थात मनु की बचपन की स्थिति अत्यन्त हृदयविदारक व विपत्तिजनक थी। मनु की अवस्था अभी चार-पाँच वर्ष की ही थी कि उसकी माँ भागीरथी बाई का देहान्त हो गया। मनु के पिता मोरोपंत तांबे एक साधारण ब्राह्मण और अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के सेवक थे। माता भागीरथी बाई सुशील, चतुर और रूपवती महिला थीं, परन्तु अपनी माँ की मृत्यु हो जाने पर मनु पिता के साथ बिठूर आ गई । यहीं पर उन्होंने मल्लविद्या, घुड़सवारी और शस्त्रविद्याओं की शिक्षा प्राप्त की । चूँकि घर में मनु की देखभाल के लिए कोई नहीं था इसलिए उनके पिता मोरोपंत मनु को अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले जाते थे जहाँ चंचल एवं सुन्दर मनु ने सबका मन मोह लिया था। बाजीराव मनु को प्यार से छबीली कहकर बुलाते थे।पेशवा बाजीराव के बच्चों को पढ़ाने के लिए जो शिक्षक आते थे, मनु भी उन्हीं शिक्षकों से बच्चों के साथ पढ़ने लगी। सात वर्ष की उम्र में ही मनु शास्त्रों के साथ घुड़सवारी, तलवार संचालन , धनुर्विद्या आदि शस्त्र विद्या में निष्णात हो गई और उसने रणकौशल में बालकों से भी अधिक सामर्थ्य दिखलाया। बचपन से ही अपने पिता से सुनी हुई पौराणिक वीरगाथाओं से लक्ष्मीबाई ने वीरों के लक्षणों व उदात्त गुणों को अपने हृदय में संजो लिया था और तदनुसार युद्ध विद्या में सिद्धहस्तता प्राप्त करने के लिए हर संभव प्रयत्न करने में तल्लीन रहती थी । इस प्रकार मनु अल्पवय में ही अस्त्र-शस्त्र चलाने में पारंगत हो गई। अस्त्र-शस्त्र संचालन एवं घुड़सवारी करना मनु के प्रिय खेल थे।मनु के विवाह योग्य हो जाने पर उसका विवाह सन् 1842 में झाँसी के राजा गंगाधर राव निम्बालकर के साथ बड़े ही धूम-धाम से सम्पन्न हुआ। विवाहोपरान्त इनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। इस प्रकार काशी की कन्या मनु झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बन गई। रानी बनकर लक्ष्मीबाई को पर्दे में रहना पड़ता था, लेकिन स्वच्छन्द विचारों वाली रानी को यह रास नहीं आया। उसने किले के अन्दर ही एक व्यायामशाला बनवाई और शस्त्रादि चलाने तथा घुड़सवारी हेतु आवश्यक प्रबन्ध किए। उन्होंने स्त्रियों की एक सेना भी तैयार की। राजा गंगाधर राव अपनी पत्नी की योग्यता से अत्यधिक प्रसन्न थे।रानी की सेना में उसकी एक हमशक्ल थी। ऐयारी और जासूसी के कार्य निभाने वाली उस हमशक्ल का नाम झलकारी था ।

1851 में राव दम्पति को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। रानी लक्ष्मीबाई के पुत्रोत्पति के समाचार से सम्पूर्ण झाँसी झूम उठा, आनन्दित हो उठा तथा पूरे झाँसी में उत्सव मनाया गया किन्तु यह आनन्द अल्पकालिक ही था। कुछ ही महीने बाद बालक गम्भीर रूप से बीमार हुआ और चार महीने की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी। झाँसी शोक के सागर में डूब गई। सन् 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ने पर दरबारियों ने उन्हें पुत्र गोद लेने की सलाह दी। अपने ही परिवार के पाँच वर्ष के एक बालक को उन्होंने गोद लिया और उसे अपना दत्तक पुत्र बनाया। इस बालक का नाम दामोदर राव रखा गया। पुत्र गोद लेने के बाद दूसरे ही दिन 21 नवंबर 1853 को राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गयी।इस पर रानी ने दत्तक पुत्र दामोदर राव के माध्यम से राजकाज देखने का निश्चय किया, किन्तु कम्पनी शासन में यह कार्य आसान नहीं था। फिर भी रानी अपने शासन काल में अत्यधिक सूझबूझ के साथ प्रजा के लिए कल्याण कार्य करती रही। इसलिए वे शीघ्र ही अपनी प्रजा की स्नेहभाजन बन गईं थीं। रानी अत्यन्त दयालु भी थीं। उसने निर्धनों को दान-दक्षिणा देने व उनके राजकीय कार्यों के त्वरित निष्पादन के लिए एक निश्चित दिन नियत कर नगर व राज्य में घोषणा करने की व्यवस्था कायम कर दी ।

उस समय भारत के बड़े भू-भाग पर अंग्रेज़ों का शासन था। वे झाँसी को अपने अधीन करना चाहते थे। दतक पुत्र के द्वारा शासन कर रही रानी को देख उन्हें राज्य को हथियाने के लिए यह एक उपयुक्त अवसर लगा। उन्होने सोचा कि एक रानी अर्थात एक स्त्री हमारा क्या प्रतिरोध करेगी? डलहौजी की राज्य हड़प नीति के अन्तर्गत ब्रिटिश राज ने रानी के दत्तक-पुत्र बालक दामोदर राव को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और रानी को पत्र लिख भेजा कि चूँकि राजा का कोई पुत्र नहीं है, इसीलिए झाँसी पर अब अंग्रेज़ों का अधिकार होगा। रानी यह सुनकर क्रोध से भर उठीं और घोषणा की कि मर जाऊंगी पर मैं अपनी झाँसी कदापि नहीं दूँगी। परिणामस्वरूप तिलमिलाये अंग्रेज़ों ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने भी युद्ध की पूरी तैयारी कर रखी थीं । किले की प्राचीर पर तोपें रखी गईं थीं । रानी ने अपने महल के सोने एवं चाँदी के सामान तोप के गोले बनाने के लिए दे दिया था ।रानी के किले की प्राचीर पर जो तोपें लगी थीं, उनमें कड़क बिजली, भवानी शंकर, घनगर्जन एवं नालदार तोपें प्रमुख थीं। और कुशल एवं विश्वसनीय तोपची गौस खाँ तथा ख़ुदा बक्श थे । रानी ने किले की मज़बूत किलाबन्दी की। रानी के रणकौशल को देखकर अंग्रेज़ सेनापति सर ह्यूरोज भी चकित रह गया। अंग्रेज़ों ने किले को घेर कर चारों ओर से आक्रमण किया। अंग्रेज़ आठ दिनों तक किले पर गोले बरसाते रहे परन्तु किला को न जीत सके। रानी एवं उनकी प्रजा ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि अन्तिम सांस तक किले की रक्षा करते हुए जान दे देंगे। किलेवासियों की लगन व हिम्मत देख अंग्रेज़ सेनापति ह्यूराज ने अनुभव किया कि सैन्य-बल से किला को जीतना सम्भव नहीं है। अत: उसने कूटनीति का प्रयोग किया और झाँसी के ही एक विश्वासघाती सरदार दूल्हा सिंह को मिला लिया जिसने किले का दक्षिणी द्वार laxmibaiखोल दिया। फिरंगी सेना किले में घुस गई और लूटपाट तथा हिंसा का पैशाचिक दृश्य उपस्थित कर दिया। घोड़े पर सवार, दाहिने हाथ में नंगी तलवार लिए, पीठ पर पुत्र को बाँधे हुए रानी ने रणचण्डी का रूप धारण कर लिया और शत्रु दल का संहार करने लगीं। झाँसी के वीर सैनिक भी शत्रुओं पर टूट पड़े। जय भवानी और हर-हर महादेव के उद्घोष से रणभूमि गूँज उठी। किन्तु झाँसी की सेना अंग्रेज़ों की तुलना में छोटी थी। रानी अंग्रेज़ों से घिर गयीं। कुछ विश्वासपात्रों की सलाह पर रानी कालपी की ओर बढ़ चलीं। दुर्भाग्य से एक गोली रानी के पैर में लगने से उनकी गति कुछ धीमी हुई। जिससे अंग्रेज़ सैनिक उनके समीप आ गए। रानी को असहनीय वेदना हो रही थी परन्तु मुखमण्डल दिव्य कान्त से चमक रहा था। उन्होंने एक बार अपने पुत्र को देखा और फिर वे तेजस्वी नेत्र सदा के लिए बन्द हो गए। वह 17 जून, 1858 का मनहूस दिन था, जब स्वाधीनता संग्राम की यह ज्योति अमर हो गयी।

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1 Comment on "भारतीय स्वाधीनता संग्राम की प्रथम वनिता लक्ष्मीबाई"

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Anil Gupta
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क्या ग्वालियर राजघराने के वर्तमान उत्तराधिकारी रानी लक्ष्मीबाई के लिए अपनी सहायता से इंकार करने के ऐतिहासिक अपराध के लिए देश से माफ़ी मांगेगे?

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