लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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विपिन किशोर सिन्हा

बचपन में गुरुजी ने बताया था कि दुनिया गोल है। इसके प्रमाण में उन्होंने कहा था कि आप एक दिशा विशेष में एक नियत स्थान से अगर चलना प्रारंभ करेंगे, तो चलते-चलते पुनः उसी स्थान पर पहुंच जाएंगे, जहां से आपने यात्रा आरंभ की थी। भारत की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी, कांग्रेस की १२५ वर्षों से भी अधिक की यात्रा देखकर यह विश्वास अटल हो जाता है कि दुनिया वास्तव में गोल है। कांग्रेस ने अपनी यात्रा २८ दिसंबर, १९८५ में आरंभ की थी, एक अवकाश प्राप्त अंग्रेज उच्चाधिकारी लार्ड एलेन आक्टेवियन ह्यूम (Lord Allan Octavian Hume) के नेतृत्व में। सन्‌ १८५७ की क्रान्ति को अंग्रेजों ने साम, दाम, दण्ड, भेद का सहारा लेते हुए कुचल जरुर दिया था, लेकिन उनके अमानवीय अत्याचारों को जनता भूली नहीं थी। देसी रियासतों के राजाओं और सरकारी कृपा से सुख भोग रहे अंग्रेजी जाननेवाले कुछ अवसरवादी हिन्दुस्तानियों को छोड़, संपूर्ण भारतीय जनमानस में अंग्रेजों के प्रति घृणा और भयंकर आक्रोश व्याप्त था। लार्ड लिटन के दमनकारी शासन की समाप्ति पर भारत क्रान्ति के बहुत करीब पहुंच चुका था। भारतीय जनता की दयनीय दरिद्रता और शिक्षित नवयुवकों का घोर असन्तोष क्रान्ति का रूप ग्रहण करने वाला था। अंग्रेजों द्वारा अपनाई गई दमनकारी नीतियां आग में घी का काम कर रही थीं। लार्ड ह्यूम को विश्वसनीय गुप्त सूचनाओं से यह भलीभांति ज्ञात हो गया था कि पूरे देश में राजनीतिक अशान्ति अन्दर ही अन्दर बढ़ रही थी। मंगल पाण्डेय, महारानी लक्ष्मी बाई, वीर कुंवर सिंह, तात्या टोपे, बहादुर शाह ज़फ़र और नाना साहब ने १८५७ में क्रान्ति की जो मशाल प्रज्ज्वलित की थी, वह उस समय तो लगा जैसे बुझ गई, लेकिन वास्तव में ऐसा हुआ नहीं। बंगाल में उग्र क्रान्तिकारियों ने संगठित होना आरंभ कर दिया था। वे अंग्रेजी सरकार के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन गए थे। दक्षिणी क्षेत्र, जिसे अंग्रेज सबसे सुरक्षित मानते थे, वह भी सुलग रहा था। वहां के किसानों ने सरकार को चुनौती देते हुए ऐतिहासिक विद्रोह किया था। लार्ड ह्यूम भारत की जनता के जन आन्दोलन की इस क्रान्तिकारी भावना से अत्यन्त चिन्तित थे। उन्होंने अपनी चिन्ता नए वायसराय लार्ड डफरिन से साझा की। उन्होंने सरकार के वफ़ादार कुछ भारतीयों को लेकर एक संगठन बनाने का प्रस्ताव किया जिसके माध्यम से सशस्त्र क्रान्तिकारियों को हतोत्साहित किया जा सके। लार्ड ह्यूम की योजना एक ऐसे संगठन का निर्माण करने की थी, जो प्रमुख रूप से सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में अंग्रेजों के हित की रक्षा करते हुए काम करे। उपर से यह संगठन तटस्थ दीखे। कुछ पढ़े लिखे अंग्रेजी के विद्वान हिन्दुस्तानियों को इसका सदस्य बनाया जाय। अधिवेशन में उनकी बात सुनी जाय और सरकार सुविधानुसार उनकी कुछ बातों को स्वीकार कर उचित कार्यवाही करे। फिर सरकार द्वारा जनहित में किए गए कार्यों का प्रचार भी वह संगठन अपने हिन्दुस्तानी नेताओं के माध्यम से जनता में करे। तात्कालीन वायसराय को लार्ड ह्यूम की यह योजना पसंद आई। उन्होंने ह्यूम को इंगलैण्ड जाकर भारत में उच्च पदों पर रहे अंग्रेजों से विचार-विमर्श करने की सलाह दी। वायसराय के निर्देशों के अनुसार ह्यूम इंगलैण्ड पहुंचे। वहां भारत-विषयों के जानकार प्रमुख व्यक्तियों – लार्ड रिपन, डलहौज़ी, जान ब्राइट और स्लेग आदि से विचार-विनिमय किया। सबने सर्वसम्मत से भारत में एक अखिल भारतीय मंच ( कांग्रेस) की स्थापना करने के लिए लार्ड ह्यूम को अधिकृत किया। कांग्रेस का असली उद्देश्य था –

१. जनमानस में व्याप्त व्यापक असंतोष और आक्रोश के लिए एक सेफ़्टी वाल्व (Safety Valve) प्रदान करना।

२. ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा करना।

३. उग्र क्रान्तिकारियों को हतोत्साहित करना।

लेकिन प्रत्यक्ष में लार्ड ह्यूम ने यह घोषणा करते हुए कांग्रेस की स्थापना की कि उसका उद्देश्य देशहित में कार्य करने वाले व्यक्तियों के बीच घनिष्टता स्थापित करना, राष्ट्रीय ऐक्य की भावनाओं का पोषण और परिवर्धन करना, महत्त्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करके सरकार को जन भावनाओं से अवगत कराना आदि है। इस तरह लार्ड ह्यूम ने सरकारी तंत्र के सहयोग से बंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कालेज के भवन में २८ दिसंबर १८८५ को कांग्रेस का पहला अधिवेशन आयोजित करने में सफलता प्राप्त की। इस अधिवेशन में कूपलैंड और विलियम वैडरबर्न सहित कई अंग्रेज अधिकारियों के साथ अंग्रेजों के कृपापात्र कुछ हिन्दुस्तानियों ने भी भाग लिया। सारा आयोजन सरकारी आशीर्वाद से किया गया। अधिवेशन के बाद कूपलैण्ड ने लिखा – भारतीय राष्ट्रीयता ब्रिटिश राज्य की शिशु है और ब्रिटिश अधिकारियों ने उसे पालने का आशीर्वाद दिया।

लार्ड ह्यूम की जीवनी के लेखक सर विलियम वैडरबर्न ने अपनी पुस्तक में ह्यूम के कथन को संदर्भित करते हुए लिखा है – ” भारत में असंतोष की बढ़ती हुई शक्तियों से बचने के लिए एक सेफ़्टी वाल्व की आवश्यकता है और कांग्रेस आन्दोलन से बढ़कर सेफ़्टी वाल्व जैसी दूसरी कोई चीज नहीं हो सकती।”

लाला लाजपत राय ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Young India में उपर्युक्त तथ्य की पुष्टि करते हुए लिखा है –

“भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का मुख्य उद्देश्य यह था कि इस संस्था के संस्थापक ब्रिटिश साम्राज्य की संकटों से रक्षा करना और उसको छिन्न-भिन्न होने से बचाना चाहते थे।”

प्रसिद्ध इतिहासकार डा. नन्दलाल चटर्जी ने भी अपने लेख में यही विचार व्यक्त किया है। इस संबंध में रजनी पामदत्त ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Indian Today में लिखा है –

“कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश सरकार की एक पूर्व निश्चित गुप्त योजना के अनुसार की गई थी।”

कांग्रेस में पंडित मदन मोहन मालवीय, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, सरदार पटेल, डा. राजेन्द्र प्रसाद और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के आगमन के पूर्व इसका स्वरूप अंग्रेज हुकुमत के चाटुकार के रूप में ही था। महात्मा गांधी द्वारा कांग्रेस पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने के बाद इसकी कार्य प्रणाली, चिन्तन और व्यवहार में भारतीय राष्ट्रवाद की छाप स्पष्ट दिखाई देने लगी। फिर भी इसने अहिंसा के नाम पर क्रान्तिकारियों का मुखर विरोध जारी रखा। कांग्रेस ने तिलक के “स्वाधीनता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, हम इसे लेकर ही रहेंगे” और नेताजी का “तुम हमें खून दो, हम तुम्हें आज़ादी देंगे,” का कभी हृदय से अनुमोदन नहीं किया। महात्मा गांधी ने अगर सरदार भगत सिंह की फांसी की सज़ा के खिलाफ़ अपने अमोघ अस्त्र – आमरण अनशन – के प्रयोग की धमकी दी होती, तो वह युवा क्रान्तिकारी बचाया जा सकता था।

आरंभ में कांग्रेस किसी भी हिन्दू को अपना अध्यक्ष बनाने से कतराती थी। हिन्दुओं पर अंग्रेजों का विश्वास नहीं था। कांग्रेस के संस्थापक ईसाई लार्ड ह्यूम थे, दूसरे अध्यक्ष दादा भाई नौरोज़ी पारसी थे, तीसरे बदरुद्दीन तैयब मुसलमान थे, चौथे जार्ज यूल तथा पांचवे विलियम वैडरबर्न अंग्रेज ईसाई थे।

बेशक महात्मा गांधी और कांग्रेस के नेतृत्व में भारत ने देश के बंटवारे की कीमत पर आज़ादी हासिल की, लेकिन लार्ड ह्यूम की आत्मा कांग्रेस पर हमेशा हावी रही। पंडित मदन मोहन मालवीय को कांग्रेस छोड़नी पड़ी, डा. केशव बलिराम हेडगवार को अलग होकर दूसरा राष्ट्रवादी संगठन (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) बनाना पड़ा, नेताजी सुभाषचन्द्र को कांग्रेस में घुटन महसूस हुई, उन्होंने आज़ाद हिन्द फ़ौज के माध्यम से आज़ादी की लड़ाई लड़ी, विनोबा भावे और जय प्रकाश नारायण को सर्वोदय की शरण लेनी पड़ी तथा श्यामा प्रसाद मुखर्जी, राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेन्द्र देव, जेपी कृपलानी आदि देशभक्त और ईमानदार नेताओं को अलग दल बनाने के लिए वाध्य होना पड़ा। महात्मा गांधी ने आज़ादी के मिलने के पश्चात १९४७ में ही कांग्रेस का रंग-ढंग देख लिया था। उन्होंने इसे भंग करने की स्पष्ट सलाह दी थी जिसे उनके ही शिष्यों ने उनके जीवन काल में ही नकार दिया।

महात्मा गांधी के भौतिक शरीर की हत्या नाथूराम गोड्‌से ने की थी लेकिन गांधी की कांग्रेस और गांधीवाद की हत्या उनके उत्तराधिकारियों ने बड़ी सफाई से की है। यूरोपियन अंग्रेज लार्ड ह्यूम कांग्रेस के पहले अध्यक्ष थे, आज युरोप (इटली) की ही सोनिया गांधी उसकी वर्तमान अध्यक्षा हैं। तब भी एक लंबे अरसे तक कांग्रेस को कोई राष्ट्र्वादी अध्यक्ष नहीं मिला था, आज भी नहीं मिल रहा है। तब कांग्रेस ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा करती थी, आज ब्रिटिश साम्राज्य के नए अवतार अमेरिका के हितों की रक्षा के लिए कटिबद्ध है। गांधी की कांग्रेस अहिंसा में विश्वास करती थी, आज की कांग्रेस गांधीवादियों पर ही हिंसा में विश्वास करती है। बाबा रामदेव अर्द्धरात्रि में गिरफ़्तार किए जाते हैं, निहत्थे भक्तों पर बर्बर लाठी-चार्ज किया जाता है, अन्ना हजारे को बिना किसी अपराध के तिहाड़ जेल में बंद किया जाता है। दूसरी ओर क्वात्रोची को क्लीन चिट दी जाती है, काले धान की वापसी की मांग करने वालों को फ़र्ज़ी मुकदमों में फंसाया जता है और मृत्यु की सज़ा पाए देश के दुश्मन खूंखार आतंकवादियों को राजकीय अतिथि की तरह स्वागत में बिरयानी परोसा जाता है। कांग्रेस ने जहां से यात्रा आरंभ की थी, वही पहुंच गई है। वास्तव में दुनिया गोल है।

 

 

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