लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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-निर्मल रानी

नितिन गडकरी को जब राजनाथ सिंह के स्थान पर भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष चुना गया था उसी समय दो बातें बिल्कुल स्पष्ट हो गई थीं। एक तो यह कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी ऐसे नेता को भाजपा प्रमुख के पद पर आसीन करना चाहता था जोकि संघ की पृष्ठभूमि का हो तथा संघ व उसकी नीतियों के प्रति वफादार रहे। लिहाजा संघ के रणनीतिकारों की नार नितिन गडकरी पर जा टिकी। भाजपा अध्यक्ष बनने से पूर्व गडकरी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान रखने वाले नेता हरगिज नहीं थे। और दूसरी बात यह कि लाल कृष्ण अडवाणी, मुरली मनोहर जोशी तथा राजनाथ सिंह के बाद गडकरी जैसे प्रदेश स्तर के नेता को भाजपा की राष्ट्रीय कमान सौंपने के बाद यह भी साफ हो गया था कि पार्टी अब राष्ट्रीय पहचान रखने वाले नेताओं के अकाल से ग्रस्त है। बहरहाल संघ के ‘निर्देशानुसार’ गडकरी को भाजपा की कमान सौंप दी गई। यहीं पर यह गौर करना जरूरी है कि ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का सबसे अधिक ढिंढोरा पीटने वाले यदि देश में कोई संगठन हैं तो वह आरएसएस तथा भाजपा ही हैं।

अब ग़ौर कीजिए ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के ध्वजावाहक गडकरी का गत् दिनों चंडीगढ़ की एक सार्वजनिक सभा में दिया गया वह भाषण जिसने एक बार फिर यह एहसास करा दिया कि भाजपा वास्तव में ‘पार्टी विद ए डिफरेंस’ है। गडकरी साहब ने फरमाया कि ‘लालू यादव तथा मुलायम सिह यादव शेर की तरह गुर्राते हैं परंतु कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के घर जाकर कुत्ते की तरह उनके पैरों के तलवे चाटते हैं’। गडकरी के भाषण के इस बेहूदे अंश को लेकर जैसे ही मीडिया ने उन्हें आईना दिखाना शुरु किया तथा देश को यह बताने की कोशिश की कि भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष भारत के कौन से ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की बात करता है, देश यह देख ले। मीडिया के इस प्रसारण के कुछ ही देर बाद गडकरी को संभवत: अपनी शैली का एहसास हो गया तथा इससे पूर्व कि अन्य सभी टी वी चैनल भी गडकरी की शान में ‘क़सीदे’ पढ़ने में मशंगूल हो जाते उन्होंने समझदारी का परिचय देते हुए झटपट माफी मांगकर अपनी और फजीहत होने से स्वयं को बचा लिया। परंतु उनके मांफी मांगने के बावजूद देश को यह पता लग गया कि गडकरी के नेतृत्व में भाजपा आने वाले समय में और किस स्तर तक जा सकती है तथा इस पार्टी में पहले से ही पाए जाने वाले फायर ब्रांड नेता आगे चलकर और कैसी भाषाओं का प्रयोग कर सकते हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी, भैरों सिंह शेखावत, लाल कृष्ण अडवाणी, मुरली मनोहर जोशी आदि भाजपा के वे नेता हैं जिनके चलते पार्टी स्वयं को अनुशासित तथा ‘पार्टी विद ए डिंफरेंस’ कहने का दावा करती थी। परंतु जैसे-जैसे उपरोक्त नेताओं के हाथों से निकल कर पार्टी का नेतृत्व दूसरी पीढ़ी के हाथों में जाने लगा वैसे-वैसे भाजपा का ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का दावा खोखला पड़ता नार आने लगा। कभी भाजपा के एक और राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके बंगारू लक्ष्मण रिश्वत में मिलने वाले नोटों के बंडल गिनते हुए खुफिया कैमरे के समक्ष रंगे हाथों पकड़े गए तो कभी वाजपेयी मत्रिमंडल में रहे केंद्रीय मंत्री दिलीप सिंह जूदेव रुपयों की तुलना खुदा से करते पाए गए। पार्टी के और भी कई ऐसे नेता हैं जिनपर संसद में प्रश्न पूछने के बदले में पैसे लेने का आरोप लग चुका है तथा उनपर कार्रवाई भी हो चुकी है। अर्थात् इनका ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ पहले भी कई बार बेनंकाब हो चुका है।

ऐसा नहीं है कि केवल भाजपा ही देश की अकेली ऐसी पार्टी है जिसमें भ्रष्ट, बेईमान या बदजुबान नेता पाए जाते हों। संभव है इससे भी अधिक भ्रष्ट व बदजुबान नेता अन्य पार्टियों में भी हों। परंतु फिलहाल यह बात तो बिल्कुल सत्य है कि भाजपा के सिवा कोई अन्य राजनैतिक दल ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का ऐसा ढोल नहीं पीटता जैसा कि भाजपा के नेताओं द्वारा पीटा जाता है। एक सत्य यह भी है कि गडकरी जैसी बदजुबानी तथा बंगारू लक्ष्मण जैसे रिश्वतखोरी के जीते जागते प्रमाण फिलहाल अभी तक किसी भी राष्ट्रीय स्तर की राजनैतिक पार्टी के अध्यक्षों के विरुद्ध नहीं देखे गए हैं। बात जब भाजपा नेताओ द्वारा सार्वजनिक रूप से प्रयोग की जाने वाली भाषा शैली की चल पड़ी है तो पाठकों को एक बार फिर याद दिला दें कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जोकि स्वयं को कभी सरदार पटेल का वारिस बताने की कोशिश करते हैं तो कभी अपने आप में देश के प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं तलाश करने लगते हैं, द्वारा भी कभी-कभी ऐसी भाषा शैली का प्रयोग सार्वजनिक रूप से किया जाता है कि पार्टी का ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का दावा महा एक ढोंग दिखाई देने लगता है।

याद कीजिए जब नरेंद्र मोदी ने सोनिया गांधी के विषय में यह कहा था कि उन्हें रहने के लिए कोई अपना मकान भी किराए पर नहीं देगा। स्वयं को राम राय का रहबर तथा सोनिया गांधी को ‘रोमराय’ का प्रतीक तो मोदी जी प्राय: कहते ही रहते हैं। मोदी ने ही एक बार राहुल गांधी के विषय में यह टिप्पणी भी की थी कि राहुल को तो कोई अपनी कार का ड्राईवर भी नहीं रखेगा। गौर फरमाईए भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदारों के यह राजनैतिक आंकलन। यहां यह बताने की जरूरत नहीं कि मोदी की इन टिप्पणियों के बावजूद तथा नरेंद्र मोदी जैसे ‘विशेष प्रयासों’ के बावजूद जोकि वे अपना पूरा जोर लगाकर गुजरात में कर रहे हैं, आज सोनिया गांधी तथा राहुल गांधी पर जनता द्वारा कितना विश्वास व्यक्त किया जा रहा है,जबकि ‘राम राय’ के मोदी सरीखे ध्वजावाहक को अभी कुछ दिन पूर्व ही गुजरात की एस आई टी द्वारा दो दिनों तक लगातार गुजरात दंगों के सिलसिले में पूछताछ हेतु अपने कार्यालय में बुलाया जा चुका है। वैसे भी मोदी जी स्वयं को कितना ही बड़ा क्रांतिकारी,राष्ट्रभक्त,हिंदुत्व का अलमबरदार तथा भाजपा के ‘सांस्कूतिक राष्ट्रवाद’ का पहरेदार क्यों न बताते फिरें परंतु वास्तविकता यही है कि इस समय वे देश के सबसे विवादित मुख्यमंत्री हैं। इस बात की पुष्टि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नरेंद्र मोदी के विषय में की गई उस टिप्पणी से हो जाती है जिसमें गुजरात दंगों के सिलसिले में मोदी को गुजरात का ‘नीरों’ बताया गया था।

दरअसल भाजपा में नेतृत्व का अकाल तो उसी समय महसूस होने लगा था जबकि वैंकेया नायडू तथा उसके पश्चात राजनाथ सिंह जैसे दूसरी श्रेणी के पार्टी नेताओं के हाथों में पार्टी की बागडोर सौंपे जाने का दौर शुरु हुआ था। वैंके या नायडू ने अपनी वाक पटुता तथा हिंदी बोलने के अपने ‘लोकप्रिय’ अंदाज से देश की जनता को जबरदस्ती इंडिया शाईनिंग को हाम कराए जाने का प्रयास किया था। उसके पश्चात जिस प्रकार राजनाथ सिंह व अरुण जेटली के मध्य रस्साकशी चली तथा बाद में वसुंधरा राजे सिंधिया ने राजनाथ सिंह को उनकी राजनैतिक हैसियत की पहचान करवाई उससे भी यह अंदाजा लगने लगा था कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। रही-सही कसर भैरोसिंह शेखावत के बयान ने पूरी कर दी थी जिसमें उन्होंने राजनाथ सिंह के विषय में यह कहा था कि राजनाथ सिंह तो उस समय पैदा भी नहीं हुए थे जब से मैं राजनीति कर रहा हू ।

गत् लोकसभा चुनावों के दौरान वरुण गांधी द्वारा जिस प्रकार सांप्रदायिकतापूर्ण जहरीला भाषण दिया गया तथा तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह द्वारा वरुण गांधी को जिस तरह समर्थन दिया गया, इतना ही नहीं बल्कि राजनाथ सिंह द्वारा एटा की जेल में जाकर वरुण गांधी से मुलाकात कर कुछ विशेष संदेश देने की भी कोशिश की गई इन्हीं कदमों से स्पष्ट होने लगा था कि भाजपा अब अपने ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के कथित सिद्धान्तों से कहीं दूर होती जा रही है तथा ‘पार्टी विद ए डिंफरेंस’ का दिया जाने वाला नारा बेमानी साबित होता जा रहा है। लिहाजा नितिन गडकरी द्वारा चंडीगढ़ में सार्वजनिक रूप से कहे जाने वाले अपशब्दों को गंभीरता से लेने के बजाए यह मान लेना चाहिए कि न केवल भाजपा बल्कि इसे पिछले दरवाजो से निर्देश जारी करने वाला राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा उनके नितिन गडकरी जैसे वरिष्ठ स्वयंसेवकों का वास्तविक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है क्या। कहा जा सकता है कि भाजपा नेता अब अपनी उपलब्धियां तथा अपने गुण जनता को बताने के बजाए दूसरों को अपमानित करने तथा दूसरे नेताओं के विरोध में ही अपनी बढ़त तलाश कर रहे हैं।

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4 Comments on "फिर बेनकाब हुआ भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का ढोंग"

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Ravikant R Upadhyay
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यदि माननीय अध्यक्ष महोदय ने कुत्तों की तरह तलवे चाटने की बात कही, परन्तु हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए की उन्होंने उन लोगों की आवाज़ की तुलना शेर की आवाज़ से भी की थी.

शैलेन्‍द्र कुमार
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विस्फोट का शीर्षक कुछ और था उसका जवाब मैं वहां दे चुका हू I यहाँ का जवाब भी देखे “फिर बेनकाब हुआ भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का ढोंग” के बदले में १. “फिर बेनकाब हुआ कांग्रेस का आम आदमी की सरकार का ढोंग”, २. “दिल्ली और पंजाब में सिक्खों और कश्मीर के हिन्दुओ और भागलपुर के मुसलमानों के नरसंहार के बाद भी को सजा होना तो दूर गिरफ़्तारी तक न होने से फिर बेनकाब हुआ कांग्रेस का धर्मनिरपेक्ष पार्टी होने का ढोंग”, ३. “राज ठाकरे के गुंडों द्वारा up, bihar के लोगो की पिटाई और हत्या के बावजूद राज ठाकरे… Read more »
sunil patel
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आरोप प्रत्यारूप का दौर नया नहीं है. एक के नज़रिया से गलत है तो दूसरे के से सही. जितनी जल्दी दूध भी नहीं फटता है उससे जल्दी बड़े नेता पाले बदल लेते है.

पंकज झा
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वास्तव में भाजपाध्यक्ष ने कुत्तों का अपमान किया है.

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