लेखक परिचय

जयप्रकाश सिंह

जयप्रकाश सिंह

लेखक युवा पत्रकार और लोक-संस्कृति, लोक-ज्ञान तथा पर्यावरणीय विषयों के अध्येता हैं। अस्मिता -संकट के वर्तमान में दौर में 'भारतीय परिप्रेक्ष्य' के संधान में लगे हुए हैं। लेखक का मानना है कि भारतीय विशेषताओं की परख पश्चिमी कसौटियों पर किए जाने से ही भारतीयों में हीन-भावना और अंधानुकरण की प्रवृत्ति पनपी है। भारतीय विशेषताओं का भारतीय परिप्रेक्ष्य और कसौटियों पर मूल्यांकन करके विकास की सही दिशा और उर्जा प्राप्त की जा सकती है।

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– जयप्रकाश सिंह

”ऐसे प्रश्न मत पूछिए। वह सहेगी क्योंकि वह भ्रष्टाचारियों को चुनती है। जिस दिन उसने चुनना बंद कर दिया, उस दिन किसी गांधी और जेपी को व्यथित होने की जरुरत नहीं पडेगी। हम भ्रष्टाचारियों को सूली पर चढाने की बात क्यों करते हैं, जनता को क्यों नहीं चढाते? असल गुनाहगार तो वही है। ”

भारतीय आमआदमी के बारे में यह विचार आईबीएन-7 के प्रबंध संपादक और इलेक्ट्रानिक मीडिया के क्षेत्र में एक बहुपरिचित चेहरे आशुतोष के हैं। उन्होंने दैनिक भास्‍कर के 6 दिसम्बर के राष्ट्रीय संस्करण में ‘ इस जनता को सूली पर चढाओ ‘ नामक एक आलेख में यह विचार व्यक्त किए हैं। आशुतोष आम आदमी के बारे में जिस लहजे का प्रयोग कर रहे हैं और जिस दृष्टिकोण की वकालत कर रहे हैं, वह अभारतीय होते हुए भी नया नहीं हैं। आम आदमी के प्रति यह दृष्टिकोण औपनिवेशिक शासनकाल की देन है। भारतीयों को हेय समझने और अपने निर्णय लेने में अक्षम मानने की मानसिकता मूलत : ब्रिटिश शासकों की मानसिकता थी। लार्ड कर्जन की भारतीयों के प्रति 1905 में की गयी अपमानजन टिप्पडी इस मानसिकता पहली बडी अभिव्यक्ति मानी जा सकती है। लार्ड कर्जन ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बोलते हुए कहा था कि सत्य आम भारतीय का आदर्श कभी भी नहीं रहा है। विन्सटन चर्चिल ने भी भारतीयों के बारे में ऐसी ही राय व्यक्त की थी। उनका मानना था कि लोकतंत्र के लिए भारतीय उपयुक्त नहीं है। विन्सटन चर्चिल ने कहा कि भारतीय मीठी जुबान और तंगदिल वाले आदमी हैं। वे सभी सत्ता के लिए लडेंगे और इस तकरार में भारत अपना राजनीतिक अस्तित्व नहीं बचा पाएगा।

भारतीयों को हेय और अक्षम मानने की मानसिकता का रिसाव रायसाहबों और रायबहादुरों से होते हुए अब सत्ता की मलाई खाने के लिए लार टपकाने वाले बुद्विजीवियों तक हो गया है। वास्तव में आशुतोष जैसे बुद्धिजीवी कर्जन और चर्चिल के विचारों से अभी तक संक्रमित हैं। आम भारतीय को हेय और अक्षम माननेवाले आशुतोष के इस विचार को एक व्यक्तिगत विचार के बजाय समाज के एक वर्ग के विचार के रुप में देखा जा सकता है, देखा जाना चाहिए। कुछ अपवादों को छोडकर यह भारतीय अभिजन वर्ग का दृष्टिकोण है और नए उदारवादी -बाजारवादी मीडिया का भी।

आशुतोष ने यह विचार हाल मे देश में बडे पैमाने पर सामने आए भ्रष्टाचार के मामलों और इसमें पत्रकारों की भूमिका के संदर्भ में व्यक्त किए है। वह इस आलेख के जरिए भ्रष्टाचार और लोकतंत्र में फैली सभी कमियों का ठीकरा आम आदमी के सिर पर फोडकर मीडिया और मार्केट को बेदाग साबित करने की कोशिश कर रहे है। लेकिन जनता को कटघरे में खडा करने के चक्कर में उन्होंने भारतीय लोकतंत्र से जुडे कुछ मूलभूत तथ्यों और महत्वपूर्ण पर घटनाओं की अनदेखी कर दी है। आशुतोष भूल जाते है कि लोकतंत्र की लडाई सबसे ज्यादा इसी आम आदमी ने लडी है और अब भी लड रहा है। आपातकाल के दौरान जब अभिजनवादी मीडिया राजसत्ता के सामने दंडवत हो रही थी, कई बुद्धिजीवी आपातकाल को जायज ठहराने वाले रक्तपत्र प्रधानमंत्री कार्यालय को भेज रहे थे ;आपातकाल के दौरान देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के कई प्रोफेसरों और कानूनविदों ने अपने खून से प्रधानमंत्री को खत लिखकर आपातकाल को जायह ठहराया थाध्द, तब इसी आम आदमी ने लोकतंत्र की सफल लडाई लडी। सत्ता परिवर्तन कर यह साबित किया कि उसमें लोकतंत्र की वास्तविक समझ है। आपातकाल के बाद हुए चुनावों में जनता ने पहली बार भारतीय लोकतंत्र को अपनी बपौती मानने वाले दलों और व्यक्तियों को सबक सिखलाया।

आशुतोष इस तथ्य की अनदेखी कर रहे हैं कि लोकतंत्र के महापर्व कहे जाने वाले आमचुनावों में इस आम आदमी की सहभागिता बुद्धिजीवियों और शिक्षित लोगों से ज्यादा होती है। आज भी चुनावों के दौरान नोयडा,गुडगांव, दिल्ली मुम्बई की पढे-लिखे,संपन्न लोगों के ‘पॉश कालोनियों’ का मतप्रतिशत 20 फीसदी से अधिक नहीं होता। ऐसे दौर में आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से सबसे पिछडे माने जाने वाले बीमारु राज्यों में आमआदमी औसतन 60 फीसदी मतदान करता है।

आशुतोष को आमजनता को फांसी पर चढाए जाने का फरमान जारी करते समय पडोसी देशों में लोकतंत्र की स्थिति का आकलन कर लेना चाहिए था। भारत के साथ स्वतंत्र हुए अधिकांश देशों में लोकतंत्र ने या तो दम तोड दिया है या लहूलुहान है लेकिन तमाम विकृतियों की बावजूद भी भारत में लोकतंत्र की जडें गहरी हुई हैं। लोकतंत्र की इस सफलता का श्रेय आम आदमी को ही जाता है। लोकतंत्र की जडों को सींचने में सबसे बडी भूमिका इस ‘ सूली पर चढने वाले ‘ आम भारतीय की है।

इस बयान के जरिए बाजारवाद से नियंत्रित, सत्ता की मलाई खाने को लालायित, अभिजन बुद्धिजीवियों के विचारों और दृष्टिकोणों में निहित अंतर्विरोध,खोखलापन और दिखावटी सामाजिक प्रतिबध्दता भी हमारे सामने आती है। आशुतोष अपने आलेख में गांधी और जेपी का नाम लेकर भ्रष्टाचार का ठीकरा जनता के सिर फोडना चाहते हैं। आशुतोष का गांधी अथवा जेपी के विचारों से कुछ भी लेना देना नहीं है। कांस्टीटयूशन क्लब में प्रसिध्द पत्रकार उदयन शर्मा की स्मृति में आयोजित एक कार्यक्रम में आशुतोष ने खुले मंच से कहा था कि वर्तमान भारत में गांधी के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए, गांधी अब प्रासंगिक नहीं रह गए है। उनके इस बयान के बाद उस पत्रकार गोष्ठी में हंगामा मच गया। कुछ वरिष्ठ पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को यह बात इतनी नागवार गुजरी कि उन्होंने आशुतोष के आगे बोलने पर आपत्ति जतायी।

वही आशुतोष यहां पर गांधी और जेपी की दुहाई दे रहे हैं। आशुतोष यह भूल जाते है कि गांधी और जेपी के आंदोलन आम आदमी की आराधना से अधिक कुछ भी नहीं थे। गांधी जी भारत में सार्वर्जनिक जीवन में सक्रिय होने से पहले 1914 से लेकर 1918 तक भारत -भ्रमण करते रहे और उन्होंने कहा कि इस यात्रा के दौरान मैंने आम भारतीय से बहुत सीखा । उन्होंने कहा कि भारतीयता की धडकन आम आदमी में ही महसूस की जा सकती है।जेपी का आमजनता के विवके पर पूर्ण विश्वास था इसीलिए उन्होंने ‘लोकसम्प्रभुता’ के सशक्तीकरण पर सर्वाधिक जोर दिया। आशुतोष इस तथ्य की भी अनदेखी कर रहे हैं कि गांधी और जेपी के दौर की जनता आज के दौर की जनता आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछडी थी फिर भी उसने बढचकर आंदोलनों में भाग लिया और देश की दिशा और दशा को बदलने में अहम भूमिका निभायी।

आशुतोष के यह विचार इलेक्टा्रनिक मीडिया की तार्किक अवसरवादिता के तरफ भी संकेत करते हैं । ‘येस बास ‘से लेकर ‘राखी का स्वयंवर ‘या ‘भूत प्रेत के समाचारों को दिखाने के लिए इसी मीडिया के लोग यह तर्क देते हैं कि जनता जो देखती है वही हम दिखाते है। जनता विवकेशील है उसे पता है कि क्या देखना है और क्या नहीं। लेकिन भ्रष्टाचार के मुद्दे पर इसी मीडिया के लोग आमजनता को फांसी पर चढाने का फरमान जारी कर रहे हैं।

आशुतोष के तर्को पर बाजार इस कदर हावी है कि वह पश्चिमी लोकतंत्र की संरचना को गढने वाले सर्वाधिक लाकप्रिय नारे का संदेश भी भूल जाते है। पश्चिम में लोकतंत्र की लडाई ‘ वाक्स पापुली, वाक्स डाय अर्थात जनता की आवाज ईश्वर की आवाज है, के नारे के आधार पर लडी गयी थी। आशुतोष उसी जनता को फांसी पर चढाने की वकालत करते हैं।

आशुतोष भ्रष्टाचार के लिए आमजनता को दोषी ठहरा रहे हैं क्योंकि वह भ्रष्टाचारी जनप्रतिनिधियों को चुनती है। वह भूल जाते हैं कि गंगा के प्रदूषित होने का मतलब गंगोत्री का प्रदूषित होना नहीं है। और गंगा की सफायी के लिए गंगोत्री के अस्तित्व को नष्ट करना जरुरी नहीं है। उसके लिए कानपुर से लेकर कोलकाता तक जो गंदगी गंगा में डाली जाती है, उसको रोकने की जरुरत है। इसी तरह भ्रष्टाचार को रोकने के लिए जनता को फांसी पर चढाने की जरुरत नहीं है। भ्रष्टाचार को सर्वाधिक बढावा सत्ता के गलियारों में सक्रिय दलाली बौद्धिकता देती है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में जनता ने कई बार भ्रष्टाचारियों को सिंहासन से नीचे पटका है। बोफोर्स के बाद राजीव गांधी का सत्ता से बाहर जाना और लालू के बाद नीतीश को मिली शानदार चुनावी सफलता इस बात का संकेत है कि जनता भ्रष्टाचारियों को नहीं चुनती। लेकिन वह जिनको ईमानदार मानकर चुनती है उनको सत्ता के गलियारे में सक्रिय लोग ही भ्रष्ट बना देते हैं। यह दलाली बौद्धिकता ईमानदार को वैसे ही भ्रष्ट बनाते हैं जैसे गंदे नाले गंगोत्री से प्रवाहित शुध्द गंगाजल को प्रदूषित कर देते हैं।

आज भी तमाम अटकलों का धत्ता बताते हुए आमजनता अपना निर्णय जिस तरह से सुना रही है वह राजनीतिक भविष्यवक्ताओं के लिए एक रहस्य से कम नहीं है। हर हेकडी का जवाब जनता बहुत चुपचाप ढंग से दे देती है। भ्रष्टाचार का उत्तर भी उसने कई बार मतपत्रों के जरिए दिया है। लेकिन दलाली बौद्धिकता हर बार जनता के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को सफल नहीं होने देती। वह नए ईमानदार लोगों को अपने फंदों में फंसाकर, प्रलोभन देकर भ्रष्टाचारी बनने का अवसर मुहैया कराती है। लगता है कि इस दलाली बौद्धिकता का शिकार अब मीडिया का एक वर्ग भी हो गया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लडाई अब न्यायपालिक, कार्यपालिका और व्यवस्थापिका तक सीमित नहीं रही गयी है, अब इस घुन ने मीडिया को भी खोखला करना शुरु कर दिया है। जनता को लोकतंत्र के अन्य खम्भों के सामान इस स्वयंभू चौथे खम्भे में सक्रिय दलालों के खिलाफ भी कमर कसने का समय आ गया है।

भ्रष्टाचार का समाधान जनता को सूली पर चढाने से नहीं होगा। भ्रष्टाचार से मुक्ति तो तभी मिल सकती है जब जनता को फांसी पर चढाने की वकालत करने वाली दलाली बौद्धिकता और उसके पैरोकारों को सरेराह फांसी पर लटकाया जाय। सच मानिए ! यदि जनता ने ऐसा करना शुरु कर दिया तो देश को घुन की तरह चाटकर खोखला करने वाले भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी महाअभियान की सफलता सुनिश्चित हो जाएगी।

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4 Comments on "इन दलालों को सूली पर चढाओ"

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anil tyagi
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vistrat soch aur sateek pramanoo se sajjit aapkaa aalekh . aasutosh ho ya koi ur sab sab ke sab suvida ki patrkarita main lipat hai ‘ mitravr log mool se bhatkate hain ‘ asal main loktantra main janta sirf apne pratinidhi chunti hai sarkaar ko nahin sarkaar banane ke liye to aur prabhavi factor hote hain jisme janta ka dkhal nahin hota janta to agle chunaav mai us satta ko apni raay deti hai abhi kuch din aur ya phir raj badlo. janta nahin srkaar ke mukhiya chunne ya naamit karne waalo ka dosh hai . prbhavpurn lekh ke liye… Read more »
आर. सिंह
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जय प्रकाशजी लेख तो आपने अच्छा लिखा. आपके तर्क भी सही हैं.पर कभी कभी लगता है की आशुतोष जैसे लोग गलत होते हुए भी एमदम गलत नहीं हैं.आपत्काल के विरुद्ध अपनी सामर्थ्य अनुसार मैंने भी कार्य किया था,पर आपत्काल के शुरू के दिनों में जो अनुशासन आया था वह सचमुच सराहनीय था. जो लोग भारतीय अनुशासन हीनता से त्रसित हैं,उनको सचमुच आपत्काल के प्रारम्भिक दिन सुहाने लगे थे,पर जब उसका परत दर परत खुलना शुरू हुआ और आपात कल में जब शासकीय शक्ति का दुरुपयोग होने लगा और जब आपात कल के नाम पर रिश्वत की दरे दस गुणा हो… Read more »
DR. arun
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apka lekh pasand aya.Bhrastachariyon ko fansi me latka dena chahiye.

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'/Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'
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“जनता भ्रष्टाचारियों को नहीं चुनती। लेकिन वह जिनको ईमानदार मानकर चुनती है उनको सत्ता के गलियारे में सक्रिय लोग ही भ्रष्ट बना देते हैं। यह दलाली बौद्धिकता ईमानदार को वैसे ही भ्रष्ट बनाते हैं जैसे गंदे नाले गंगोत्री से प्रवाहित शुध्द गंगाजल को प्रदूषित कर देते हैं।”

“जनता को लोकतंत्र के अन्य खम्भों के सामान इस स्वयंभू चौथे खम्भे में सक्रिय दलालों के खिलाफ भी कमर कसने का समय आ गया है।”

सार्थक और सही निशाने पर चोट करने वाला सामयिक आलेख!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशिक हिन्दी पाक्षिक) एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
०१४१-२२२२२२५ ०९८२८५-०२६६६

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