लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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(आर. सिंह जी को पढ़ने-लिखने का शौक है। यही कारण है कि अभियंता की नौकरी से अवका‍श प्राप्ति के बाद भी वे रचनाकर्म में जुटे रहते हैं। तमाम समस्‍याओं पर उनकी लेखनी से उनकी बेचैनी महसूस की जा सकती है। पिछले दिनों जब उन्‍होंने टाइम्स आफ इंडिया में श्री अरविंद केजरीवाल का लेख पढ़ा तो वे इससे काफी प्रभावित हुए और सोचा यह विचार अधिकांश लोगों तक पहुंचना चाहिए। श्री केजरीवाल के लेख पर आधारित आर सिंह जी का यह लेख प्रवक्‍ता के पाठकों के लिए यहां प्रस्‍तुत है। सं. )

ग्रामीण सरकारी पाठशालाओं के शिक्षक शायद ही कभी पाठशाला में उपस्थित होते हों,पर उनका वेतन नियमित रूप से मिलता रहता है,क्योंकि उनकी अनुपस्थिति कभी दर्ज नहीं होती.वेतन का कुछ हिस्सा उन्हें अवश्य बेसिक शिक्षा अधिकारी के हवाले करना पडता है,अन्यथा वे हमेशा अनुपस्थित पाये जाते.सरकारी अस्पतालों को जाने वाली दवाइयाँ रास्ते से हीं काला बाजार में पहुँच जाती हैं.गरीब जब अस्पताल जाते हैं तो उन्हें बहुधा भगा दिया जाता है.विभिन्न पंचायतों द्वारा किये जाने वाले कार्यों में अंतहीन भ्रष्टाचार है.अत्यंत दीन हीनों को सरकारी दूकानों से दिये जाने वाले खIद्य सामग्री को काले बाजार का रास्ता दिखाया जानI तो अब एक आम बात हो गयी है.

यह एक आम आदमी के जीवन की कडवी सच्चाई है.फिर भी इसमे से कोई भ्रष्टाचार लोकपाल बिल के सरकारी प्रारूप में शामिल नहीं है.अगर बिल आम आदमियों के लिये उपयोगी नहीं है,तो इन सब भ्रष्ट आचरणों के विरुद्ध शिकायत करने के लिये वह कहाँ जायेगा?अगर इस बिल के आने के बाद भी वह इसी भ्रष्टाचार से जुझता रहे तो फिर ऐसे लोकपाल बिल से क्या लाभ?यह बात सिविल सोसायटी के सदस्यों द्वारा बार बार दुहराई गयी,पर सरकारी मान्यता है कि वर्तमान पद्धति जारी रहना चाहिये(जनता चाहे पिसती रहे.)जब सरकार के सदस्यों को बताया गया कि वर्तमान पद्धति असफल हो रही है तो उन्होनें चुप्पी साध ली.

सरकार यह दावा करती है कि उसके द्वारा प्रारुपित बिल उच्च स़्तरीय भ्रष्टाचार को रोकने के लिये है.जब यह पता चलता है कि आज के आदर्श सोसायटी, राष्ट्रमंडल खेल और रेड्डी भाइयों द्वारा किये गये बडे बडे घोटाले इसके दायरे में आ ही नहीं सकते, तो सरकार का यह दावा भी खोखला साबित हो जाता है. 2जी संबंधित घोटाला भी इस लोकपाल बिल से केवल आंशिक रूप से आवृत होता है,क्योंकि इस बिल द्वारा बनाये हुये लोकपाल को प्रधान मंत्री के दफ्तर से किसी तरह की फाइल को मंगाना मुमकिन नहीं होगा,क्योंकि प्रधान मंत्री का दफ्तर उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर होगा.इससे भी बेतुकी बात कोई हो सकती हैक्या?

आखिर सरकार निम्न स्तरीय पदाधिकारियों को लोकपाल के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखने के लिये इतना जोर क्यों लगा रही है?एक बात तो समझ मे आती है कि उच्च अधिकारियों द्वारा अर्जित कालाधन अधिकतर उनकी निजी सम्पति हो जाती है. नीचे वालों की कमाई का अधिकांश हिस्सा उपर वालों को और ज्यादातर राजनैतिक दलों को उपलब्ध कराया जाता है.ऐसे भी भ्रष्टाचार के नियमित स्रोत तो नीचले पदाधिकारी हीं हैं,जिनको जनता से नित्य साबका होता है.जन वितरण प्रणाली के (पी.डी.एस.)40,000 करोड रूपये के अनुदान का 80 प्रतिशत से ज्यादा जब बेइमानी से बाहर निकलता है,तो यह सब या तो राशन की दूकनों के जरिये या खाद्य पदाधिकारियों द्वारा ही होता है.यही वह धनराशि है जो राजनैतिक राजनैतिक दलों और उनके कार्यकर्ताओं के लिये प्रयुक्त होता है. उत्तर प्रदेश का 35,000 करोड रूपये का खाद्य सामग्री घोटाला जो कि अनेक वर्षों से चल रहा था और जिसकी आज सी.बी.आइ.द्वारा जाँच की जा रही है,वह नौकरशाही के नीचले तबके द्वारा ही संचालित था.इस घोटाले में सैकडों सरकारी कर्मचारी शामिल हैं.ऐसे ही घोटालों द्वारा अर्जित रकम राजनैतिक दलों के जड को मजबूत करने में सहायक होते हैं.इसी लिये यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि सरकार लोकपाल बिल में इस निम्न स्तरीय भ्रष्टाचार को शामिल नहीं करना चाहती.

सरकार का कहना है कि चालीस लाख सरकारी कार्यकर्मियों और बीस लाख सार्वजनिक संस्थाओं के कार्यकर्मियों की जाँच के लिये बहुत बडे संगठन की आवश्यकता होगी.क्या यह इन कर्मचारियों को जाँच की सीमा से बाहर रखने और उनको भ्रष्ट बनने का अवसर प्रदान करने का उचित कारण हो सकता है?कानून के अनुसार भ्रष्टाचार उतना ही बडा जुर्म है,जितना हत्या या बलात्कार.क्या सरकार यह कह सकती है कि अब यह इतना फैल गया है कि इसको नियंत्रित करने के लिये सरकार साधन उपलब्ध कराने में असमर्थ है.सबसे पहले,किसी भी शासक या सरकार का कर्तव्य होता है कि वह किसी भी किमत पर जनता को किसी भी जुर्म के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करे.उसमें आनाकनी करने वाला शासन करने के योग्य ही नहीं है.

सरकारी प्रारूप में एक अन्य कमी यह है कि सरकार सी.बी.आई.पर अपने अधिकार में कोई बदलाव नहीं चाहती है.उचित तो यह होता कि सी.बी.आई के भ्रष्टाचार विरोधी अंग को सरकारी अधिकार क्षेत्र से बाहर निकाल कर लोकपाल में विलय कर दिया जाता.यहाँ तक कि उच्चतम न्यायालय ने भी विनित नारायण केस में कहा था कि सी.बी.आई. को पूर्ण स्वायतता दे देनी चाहिये.मजे की बIत यह है कि भ्रष्टाचार के जितने मामलों का जिक्र पहले आया है,वे सब या तो सी.बी.आई. द्वारा जाँच किये जा रहे हैं या उनको सी.बी.आई.के सुपुर्द करने की तैयारी है.सरकारी प्रारूप के अनुसार यह सब लोकपाल के अधिकार क्षेत्र से बाहर होगा.इसका मतलब यह होगा कि सरकारी प्रारूप लोकपाल को सी.बी.आई. के अधिकार क्षेत्र के एक छोटे हिस्से तक सीमित रखेगा.

दुःख की बात यह है कि पिछले अनेक वर्षों के इतिहास को देखे तो नहीं लगता कि कोई भी सरकार सी.बी.आई.पर अपना नियंत्रण खत्म करने को राजी होगी.प्रधान मंत्रियों ने हमेशा अपने विश्वासपात्रों को सी.बी.आई. निदेशक नियुक्त किया है.यही कारण है कि निदेशकों का कार्यकाल साधारणतया प्रधान मंत्री के कार्यकाल के साथ ही आरंभ और समाप्त होता रहा है. इसमे कोई आश्चर्य नहीं कि कोई भी प्रधान मंत्री राजीव गाँधी के 1988 के असंगत आदेश के उपर नहीं उठ सका.1988 में बोफोर के तहकीकात में फँसे हुए राजीव गाँधी ने सी.बी.आई. को अपने सीधे अधिकार में कर लिया था.उस समय से अगर प्रधान मंत्री को भ्रष्टाचार का दोषी पाया जाता है तो वही एजेंसी इसकी तहकीकात कर सकती है जो सीधे उसी के अधीन है और जिसे उसी को इतला देनी है.यह पद्धति किसी तरह के तहकीकात का केवल मजाक मात्र है.ऐसे तो ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न नहीं होनी चाहिये जिसमे प्रधान मंत्री के विरुद्ध तहकीकात की आवश्यक्ता हो,पर अगर ऐसा होता है तो यही उचित लगता है कि उसकी तहकीकात किसी स्वतंत्र एजेंसी द्वारा हो.लोकपाल इसी स्वतंत्र एजेंसी के रूप में कार्य करेगा. प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के स्वीकृति के बावजूद कांग्रेस पार्टी इसका सख्त विरोधी है.कांग्रेस पार्टी शायद सिंह के उतराधिकारियों के लिये चिंतित है.

अंत में,सरकार चाहती है कि न्यायाधीशों को जुडिसीयरी एकाउंटिंग कमीटी के प्रति उतरदाई होना चाहिये. इस बिल के अंतर्गत अगर कोई न्यायाधीश भ्रष्टाचार का दोषी पाया जाता है तो उसके विरुद्ध एफ.आई.आर. दायर करने के लिये उस जुर्म को ऐसे तीन न्यायाधिशों द्वारा छानबीन किया जायेगा,जो उसी उच्च न्यायालय से संबंधित होंगे जहाँ दोषी न्यायाधीश है.यह सोचा भी नहीं जा सकता कि उसी कोर्ट के तीन न्यायाधीश अपने ही सहकर्मी के विरुद्ध मुकदमा दायर करने की अनुमति देंगे,जिसके साथ उनका दिन रात का संबंध है.

भ्रष्टाचार रोकने के लिये सरकार का प्रस्ताव निहायत घटिया और कपटी लगता है.यह भ्रष्टाचार दूर करने की दिशा मे प्रभावशाली हो ही नहीं सकता.नारा है कि कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ,पर तुर्रा यह है कि इसमे आम आदमी को ही भुला दिया गया है.

संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि लोकपाल बिल का सरकारी प्रारूप न तो निचले स्तर के पदाधिकारियों को लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में लाता है,न प्रधान मंत्री और न न्यायपालिका को.यहाँ तक कि आज के बडे बडे घोटाले भी उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते,क्योंकि इस लोकपाल बिल के बाद भी पूरा अधिकार सी.बी.आई. के हाथों में रहेगा और सी.बी.आई. सीधे सरकारी नियंत्रण में.अगर यह मजाक नहीं तो और क्या है?

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