लेखक परिचय

रवि श्रीवास्तव

रवि श्रीवास्तव

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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-रवि श्रीवास्तव-

uttarakhnad

देश के राज्यों में एक उत्तराखण्ड़ जिसे देवभूमि कहा जाता है।  2013 में आई इस देवभूमि में प्राकृतिक आपदा ने पूरे संसार के लोगों की रूह को कपां दिया था। इस आपदा में करीब 4 से 5 हजार लोगों ने अपनी जानें गवाई थी। इस आपदा को करीब-करीब दो साल होने को हैं। जिसमें इंसानियत का एक और घिनौना सच दुनिया के सामने आया है। आपदा कार्यों में घोटाले का। आरटीआई के जरिए जो ये सच सामने आया है काफी दुर्भाग्य पूर्ण है। राहत कार्य में लगे अधिकारियों ने जिस तरह से गुलछर्रे उठाए हैं इससे तो यही लगता है वो किसी बचाव कार्य में नही अपनी पिकनिक मनाने गए। लोग मर रहे थे, दर्र से कराह रहे थे, भूखे थे, प्यासे थे, शिविर कैम्प में थे। और ये लोग होटल में 7 हजार प्रति दिन का कमरा, साथ खाने में मटन, चिकन, गुलाब जामुन को बड़े चाव से चम्पत कर रहे थे। वाह क्या इंसानियत है? दूसरों के दुख में आखिर ये क्यों दुखी हो। इनके परिवार का तो कोई था ही नहीं। अगर होता तो शायद दर्द का एहसास होता है। कहते हैं जिनके पैरों में बेवाई नही फटती वो क्या जाने दूसरों का जख्म। ऐसा ही हाल था वहां पर। देश में घोटाले को लेकर चर्चाए फिर शुरू होने लगी है। एक तरफ लोग जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे तो दूसरी तरफ ये अधिकारी पैसा बनाने में जुटे हुए थे। अरे कहा ले जाओगे, दीन-दुखियों को दर्द देकर ये पैसे इन सबका हिसाब यही देना होगा। उस आपदा में बचकर आए लोगों से पूछों उनके दिलों पर क्या गुजरी है। कितनी रातें खुले आसमान के नीचे बिताई होगी। कितने दिन और रात पेट में अन्न का एक दाना न गया होगा। प्यास से गला सूख गया होगा पानी की बूंदों के लिए तरसते रहे होगें। आप सब बचाव कार्य में गए थे। तो इतने नखरे थे होटल में रहना है साथ ही मटन चिकन ही खाना है। घर पर चाहे दाल खाकर ही काम चला रहे हो पर फ्री का मिला तो लूट लो दूसरों की गाढ़ी कमाई। एक बार दिल से सोच लिया होता कि हम जो कर रहे हैं, क्या ये उचित है। मुसीबत में फसें लोगों को बचाने में अगर काम करते तो आज देश को नाज होता आप पर। वो तो अच्छा हो कि हमारी सेना ने बखूबी अपनी जिम्मेंदारी निभाई। इनके भरोसे तो राहत का काम होता तो राहत सामाग्री को भी बेंच खाते। वहां फंसे लोगों को भूखे प्यासे मार देते। हो भी क्यों न ऐसे घोटाले। कहते है जब परिवार में बड़ा कोई गलत कार्य करता है तो उसका असर छोटों पर भी पड़ता है। वही हुआ, जब देश के कर्ताधर्ता जिन्हें जनता चुनकर संसद तक भेजती है वो नही चूकते तो ऐ तो अधिकारी वर्ग के लोग हैं। कुछ तो असर पड़ेगा ही। बड़ा न सही चलो छोटा घोटाला कर लेते हैं। लेकिन चोरी तो चोरी होती है। इस पूरे वाक्ये में सीबीआई को जांच के आदेश दे दिए गए हैं। लेकिन क्या ये जांच कब पूरी हो पाएगी। सबूत के तौर पर आरटीआई में निकला सच काफी नही है। ऐसा काम सिर्फ हमारे देश में हो सकता है। ऐसी आपदा में पहले अपना पेट भर लो फिर जो लोग फंसे है, उन्हें खिलाओ और बचावो। देश के सामने एक और घोटाले का जिन्न सामने आ चुका है। साथ ही पता भी चल चुका है कि आखिर ये कैसी इंसानियत है।

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