लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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-लिमटी खरे

दीपावली पर लगा ओबामा का ग्रहण

अमावस्या के दिन होती है दीपावली। इस रात को घुप्प अंधेरे के बावजूद सारा हिन्दुस्तान कृत्रिम रोशनी से नहाया होता है। इस साल के त्योहारों पर मानो ग्रहण ही लग गया है। इस साल अधिकांश त्योहार वैसे भी रविवार के दिन ही पड़े, सो नौकरीपेशा लोगों की न जाने कितने दिनों की छुट्टी मारी गई। नवरात्र के समय राष्ट्रमण्डल खेलों ने दिल्लीवासियों का मजा फीका कर दिया था। वैसे भी दिल्ली में नवरात्र की खासी धूम रहा करती है। अब मुंबईवासियों पर दीपावली के मजे को किरकिरा करने की तैयारी की जा रही है। अवसर है दुनिया के चौधरी अमेरिका के महामहिम राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा का। महाराष्ट्र की कांग्रेसनीत सरकार ने तुगलकी फरमान जारी कर दिया है कि मुंबईवासी दीपावली के पर उंची आवाज के फटाके नहीं चलाने का। स्काटलेंड यार्ड की पुलिस के बाद अघोषित तौर पर दूसरे नंबर का दर्जा पाने वाली मुंबई पुलिस भी चाह रही है कि मुंबईवासी उंची आवाज के फटाकों का प्रयोग न करें। यद्यपि इसके पीछे दलील दी जा रही है कि फटाखों की आवाजों से कहीं अफवाहें न फैलें और अफरातफरी का आलम न हो जाए, फिर भी कहा जा रहा है कि भारत गणराज्य के वजीरे आजम क्या इतना साहस कर पाएंगे कि वे क्रिसमस के मौके पर अमेरिका की यात्रा पर जाएंगे, और इस तरह की अफवाहों से बचने के लिए अमेरिका फटाखे फोड़ने या जश्न मनाने पर पाबंदी लगा पाएगा?

गेम्स में भी दिखी पीएम की असफलता की छाप

भारत गणराज्य का दुर्भाग्य है कि देश के प्रधानमंत्री पद पर आसीन शख्स ने आज तक कोई चुनाव सीधे सीधे नहीं जीता है। हमेशा ही सरदार मनमोहन सिंह ने पिछले दरवाजे से ही दाखिला लिया है। जब से मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री का पद संभाला है तब से भारत में मंहगाई का ग्राफ है कि रूकने का नाम ही नहीं ले पा रहा है। कामन वेल्थ गेम्स में भी उनका यह प्रभाव देखने को मिल ही गया। खेलों के दौरान भारत ने हाकी में काफी उत्साहजनक प्रदर्शन किया। जिन भी खेलों को देखने कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी, कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी और सोनिया गांधी के दमाद राबर्ट वढेरा गए, उन मैचों या खिलाडियों ने जीत हासिल की। हाकी के उत्साहजनक प्रदर्शन के बाद जब फायनल मैच देखने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पहुंचे तो भारत आठ शून्य से हार गया। कहने वाले यह कहने से भी नहीं चूक रहे हैं कि ‘‘जहां जहां पैर पड़े सन्तन के तहां तहां . .।‘‘

पितृ पुरूष को ही भूली भाजपा

भारतीय जनता पार्टी का वर्तमान नेतृत्व कितना कृतध्न है कि वह अपने पितृ पुरूष पूर्व महामहिम राष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत को ही भूल गई। भैरो सिंह शेखावत ने भाजपा की जड़ों को जमाने के लिए न जाने क्या क्या जतन किए थे। उनकी पुण्य तिथि पर भारतीय जनता पार्टी द्वारा न तो केंद्रीय स्तर पर ही उनके गृह राज्य राजस्थान में ही कोई कार्यक्रम आयोजित करना ही मुनासिब समझा। भाजपा के उदय और उसके कार्यक्षेत्र के विस्तार में भैरो सिंह शेखावत के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। अपने अविस्मरणीय योगदान के लिए भैरो सिंह शेखावत सदा ही याद किए जाते रहेंगे, किन्तु लगता है भाजपा के नए निजाम नितिन गड़करी ने बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध लेय की कहावत पर अमल करना आरंभ कर दिया है, यही कारण है कि भाजपा के पितृ पुरूष समझे जाने वाले भैरो सिंह शेखावत की पुण्य तिथि पर उन्हें याद तक नहीं फरमाया गया।

स्तरहीन बयानबाजी पर उतरे राजनेता

कहते हैं प्रेम और जग में सब कुछ जायज है, किन्तु सब कुछ नैतिकता के साथ ही जायज माना गया है। बिहार में आसन्न विधानसभा चुनावों में एक दूसरे के दामन पर कीचड़ उछालने में राजनेता अपनी वर्जनाएं ही भूलते जा रहे हैं। मध्य प्रदेश से अपने राजनैतिक जीवन आरंभ करने वाले शरद यादव ने तो हद ही कर दी। एक चुनावी सभा में उन्होंने फरमाया कि जवाहर लाल, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी के बाद अब बबुआ राहुल गांधी राजकाज करने वालों में शामिल हो रहे हैं। उन्हें जो लिखकर दिया जाता है, वे पढ़ देते हैं उन्हें कुछ नहीं पता होता है। एसे नेता को गंगा में फेंक देना चाहिए। शरद यादव की उक्त बात से साफ हो जाता है कि वे राहुल गांधी के बढ़ते प्रभाव से कितने खौफजदा हैं। बेहतर होता शरद यादव राहुल गांधी को आमने सामने बहस की चुनौति देते। हो सकता है शरद यादव, राहुल पर भारी पड़ते, किन्तु स्तर हीन बयानबाजी राजनैतिक परिवेश में जहर ही घोलने का काम करती है।

चर्चा में प्रिंट मीडिया का एक विज्ञापन!

देश के बारह राज्यों में अपने आधा सैकड़ा से अधिक संस्करण निकालने वाले 64 साल पुराने एक अखबार में प्रकाशित होने वाला एक विज्ञापन इन दिनों चर्चाओं में है। इस विज्ञापन में एक व्यक्ति की शवयात्रा के दृश्य के साथ कुछ कोटेशन लिखे हुए हैं, जिसमें तंबाखू के उत्पाद के सेवन को न करने का मशविरा दिया गया है, वह भी चेतावनी के साथ। इस विज्ञापन की खासियत यह है कि इसमें जिस कोटेशन का उपयोग किया गया है, वही कोटेशन तम्बाखू सहित एवं रहित पान के विकल्प के तौर पर प्रचलित पाउच की निर्माता एक नामी गिरामी कंपनी द्वारा उपयोग में लाया जाता रहा है। अब लोगों में जिज्ञासा इस बात की है कि आखिर उक्त मीडिया में घराना पत्रकारिता के एक स्तंभ माने जाने वाले उक्त विशाल समूह को आखिर यह गूढ ज्ञान कहां से प्राप्त हो गया कि उसने तम्बाखू के सेवन से होने वाले नुकसान के बारे में लोगों को जागरूक करना आरंभ कर दिया है, वह भी पाठकों के लिए जनहित की पहल के तौर पर। कहीं यह सब इसलिए तो नहीं क्योंकि उक्त पाउच निर्माता कंपनी द्वारा इस समूह को अपना विज्ञापन नहीं दिया गया?

और यह रहा सीबीएसई का एक नायाब कारनामा

देश भर में स्कूल संचालकों का काम अब बच्चों को शिक्षित करने के साथ ही साथ इसको व्यवसाय बनाने का हो गया है। बहुत ही मुनाफे का व्यवसाय बन गया है आज की तारीख में स्कूल खोलकर उसे संचालित करना। केपीटेशन फीस के नाम पर लाखों करोड़ों रूपए अब तक स्कूल संचालकों द्वारा डकारे जा चुके हैं। शाला संचालक चाहते हैं कि उनकी शाला को केंद्रीय शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) से एफीलेशन मिल जाए। हाल ही में मध्य प्रदेश में निजी तौर पर संचालिए एक शिक्षण संस्था के साथ भी सीबीएसई ने जो किया वह निश्चित तौर पर अपने आप में अद्भुत ही माना जाएगा। शैक्षणिक सत्र 2010 – 2011 के लिए मान्यता आवेदन के निरीक्षण प्रतिवेदन में कमियां पाए जाने पर आवेदन निरस्त कर नया आवेदन करने के लिए आदेशित करने के बाद भी सीबीएसई बोर्ड ने इसी सत्र के लिए उसी आवेदन पर पुनः निरीक्षण कमेटी का गठन कर दिया। कहा जा रहा है कि अब सीबीएसई बोर्ड भी ‘‘लेन देन‘‘ के चक्कर से मुक्त नहीं है।

मंदी पड़ी भारती की रिंगटोन

भारत की बड़ी टेलीकाम कंपनियों की सिरमोर भारती एयरटेल की घंटी की आवाज इन दिनों मंदी पड़ती दिख रही है। जून की तिमाही में इसका मुनाफा 23 फीसदी नीचे आ गया है। अगर इसमें भारती की अफ्रीकी कंपनी जैन को शामिल किया जाए तो इस दौरान नुकसान बढ़कर 32 फीसदी हो जाता है। अप्रेल से जून की तिमाही में भारती का मुनाफा 1662 करोड़ रूपए था, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 2475 करोड़ रूपए का था। घरेलू बाजार में कड़ी चुनौति का सामना करने वाली भारती के सामने सबसे अधिक प्राथमिकता इस बात की है कि वह अफ्रीकी इकाई को लाभ में लाए। भारत में आज टेलीकाम से जुड़ने वालों की संख्या साठ फीसदी है। अगस्त माह के बाद टेलीकाम बाजार में आई कंपनियों और मोबाईल सेवा प्रदाताओं की गलाकाट स्पर्धा के कारण भारती को वैसे भी कड़ी टक्कर का सामना करना पड़ रहा है। अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में भारती टेलकाम ने अनेक राज्यों में अपनी आमद दी थी, किन्तु अब उसकी जड़ें उतनी मजबूत नहीं मानी जा सकती हैं।

सरल या निरीह हैं प्रधानमंत्री

पिछले दिनों राष्ट्रमण्डल खेलों के उद्घाटन के दौरान हुए एक वाक्ये के बाद यह बहस और तेज हो गई है कि भारत के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह बेहद ही सरल स्वभाव के हैं या निरीह हैं? कामन वेल्थ गेम्स का उद्घाटन हो रहा था, प्रधानमंत्री भी इस कार्यक्रम में शिरकत कर रहे थे। प्रधानमंत्री सिंह अपने लिए निर्धारित स्थान पर ही आसनी पर बैठे थे। इतने में राष्ट्रपति भवन के आला अधिकारी ने आकर पीएम से कहा कि वे अपने स्थान से थोड़ा सा हट जाएं, ताकि भारत गणराज्य की पहली महामहिम राष्ट्रपति के पति के लिए कुर्सी खाली हो सके। पीएम ने बिना ना नुकुर के आगा पीछा सोचे बिना ही देवी सिंह पाटिल के लिए स्थान दे दिया। देखा जाए तो यह प्रोटोकाल, सुरक्षा, और नैतिकता के लिहाज से उपयुक्त नहीं होने के साथ ही साथ अपमान जनक भी था। अब लोग कहने लगे हैं कि कहीं एसा न हो कि उन्हें किसी दिन कह दिया जाए कि आप 7, रेसकोर्स (प्रधानमंत्री के सरकारी आवास) से थोड़ा सा खिसक जाएं, इसे अब कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी का अशियाना बनाना है।

घर में नहीं हैं दाने, अम्मा चली भुनाने!

देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में पेयजल आज भी सबसे बड़ी समस्या बना हुआ है। नब्बे फीसदी घरों में या तो वाटर प्यूरीफायर लगा हुआ है, या फिर बोतल बंद पानी का उपभोग ही किया जाता है, पर इस किल्लत से दिल्ली सरकार को लेना देना नहीं है। उसे तो परवाह है लो फ्लोर बस की चमचमाहट से। कामन वेल्थ गेम्स में देश का चेहरा उजला दिखाने की गरज से सड़कों पर दौड़ने वाली लो फ्लोर एसी और नान एसी बसों की धुलाई से उनकी चमक फीकी पड़ रही थी, सो इन लो फ्लोर बसों के रखरखाव का जिम्मा संभालने वाली टाटा कंपनी ने दिल्ली सरकार से आरओ वाटर के लिए प्लांट लगाने की इजाजत मांगी थी, जो उसे मिल गई है। सरकार ने नौ बस डिपो में रिवर्स ओसमोसिस (आरओ) प्लांट लगाने की इजाजत दी थी। आपको यह जानकर घोर आश्चर्य होगा कि दिल्ली में टेक्स देने वाले नागरिकों को साफ शुद्ध पानी मयस्सर नहीं है पर दिल्ली की लाईफ लाईन बन चुकी मेट्रो रेल गाड़ी की धुलाई भी आरओ जैसे अतिशुद्ध विषाणू रहित पानी से की जाती है। अब इसे कांग्रेसनीत शीला सरकार का चमत्कार ही माना जाए कि कांग्रेसनीत केंद्र सरकार की नाक के नीचे सब कुछ हो रहा है पर कांग्रेस के आलंबरदार मौन साधे हुए हैं।

चूहों का पैसा ही ‘‘कुतर‘‘ गया विश्वविद्यालय!

राजस्थान में एक बड़े विश्वविद्यालय द्वारा चूहां का पैसा ही कुतरने का मामला प्रकाश में आया है। राजस्थान विश्वविद्यालय के प्राणी शास्त्र विभाग के एनीमल हाउस में रखे दुर्लभ प्रजाति के चूहों के संरक्षण के लिए स्वीकृत किए गए 11 लाख रूपए उपयोग के अभाव में लेप्स हो गए, जिसकी चर्चाएं मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय में चटखारे लेकर हो रही हैं। एनीमल हाउस में रखे अमेरिकन प्रजाति के सफेद चूहों की नस्ल अमेरिका के सुप्रसिद्ध वी स्टार इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने तैयार की थी। एचआरडी मिनिस्ट्री के सूत्रों का कहना है कि इसके लिए दिए गए 11 लाख रूपयों को एनीमल हाउस में रखे प्राणियों के लिए एयर कंडीशनर आदि लगाने के लिए प्रदाय किया गया था, चूंकि बड़ी तादाद में एसी लगवाने पर आने वाले बिजली के बिल को उठाने में विश्वविद्यालय ने असमर्थता जता दी थी अतः यह काम रोक दिया गया, और राशि लेप्स हो गई। वी स्टार के नाम से प्रसिद्ध ये चूहे प्रयोगशाला में प्रयोग के लिए सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं, पर विश्वविद्यालय प्रशासन की तुगलकशाही के चलते इनका संरक्षण का काम नहीं हो सका। आश्चर्य तो इस बात पर है कि इस मामले में प्राणियों पर होने वाले अत्याचार पर सदा ही बोलती रहने वाली मेनका गांधी भी खामोश ही हैं।

सुरक्षित हैं राजधानी वासी

राजधानी दिल्ली सदा से ही अपराधों के मामले में चर्चाओं में रही है। किन्तु राजधानी पुलिस के आंकड़ों के बाजीगरों ने इसे संतोषप्रद जताने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी है। नेशनल क्राईम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर अगर गौर फरमाया जाए तो आला 35 शहरों में अपराध के मामले में मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर पहली, राजनैतिक राजधानी भोपाल दूसरी तो जयपुर तीसरी पायदान पर है। दिल्ली का नंबर 12वें स्थान पर आता है। यद्यपि ब्यूरो के उक्त आंकड़े 2007 के हैं, फिर भी दिल्ली वासी यह सोचकर संतोष कर सकते हैं कि वे भोपाल इंदौर के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित हैं। इसमें से वाहन चोरी और सड़क दुर्घटनाओं को माईनस कर दिया जाए तो दिल्ली का नंबर 20वें स्थान पर आ जाता है। इंदौर का क्राईम रेट 792, भोपाल का 760, जयपुर का 606, जबलपुर 585, विजयवाड़ा 552, पटना 526, कोच्चि 487, आईटी सिटी बंग्लुरू 461, तो दिल्ली का यह रेट 398 है। 2009 में दिल्ली का क्राईम रेट घटकर 277 हो गया है।

कुमारतुंगे की गुपचुप यात्रा!

श्रीलंका की पूर्व महामहिम राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगे पिछले दिनों मध्य प्रदेश के कान्हा अभ्यारण में सुस्ताने के बाद वापस रवाना हो गईं। कुमारतुंगे की कान्हा नेशनल पार्क की यात्रा को सुरक्षा कारणों से गोपनीय रखा गया था। गौरतलब है कि श्रीलंका में एलटीटीई के आतंक के सफाए में कुमारतुंगे की भी महती भूमिका रही है। इधर आदिवासी बाहुल्य मण्डला जिले की सीमा में अवस्थित कान्हा नेशनल पार्क का क्षेत्र भी नक्सलवादियों की शरणस्थली और कार्यस्थली के रूप में सालों से बना हुआ है। जब इसकी खबर मीडिया को लगी तो उन्होंने वन विभाग से संपर्क किया तब वन विभाग ने इस बात को महज अफवाह ही करार दिया। उनके भ्रमण के पूरे होने के बाद वन विभाग ने बताया कि सुरक्षा कारणों के चलते उनका दौरा गुप्त रखा गया था। कुमारतुंगे अपने साथ क्या संस्मरण लेकर गईं हो यह बात तो वे ही जाने पर किसी देश के पूर्व शीर्ष राजनयिक की यात्रा को गुप्त रखने से भारत गणराज्य की आंतरिक सुरक्षा कितनी मजबूत है, यह बात अपने आप ही सिद्ध हो जाती है।

पुच्छल तारा

दीपावली आने को है, दीपावली पर लक्ष्मी पूजा का चलन भारत में जबर्दस्त है। लोग कर्म के बजाए भाग्य और भगवान पर ही विश्वास कर हाथ पर हाथ रखे बैठे रहते हैं। इस मामले को रेखांकित करने के लिए अहमदाबाद से सुरभी बैस ने एक बेहतरीन ईमले भेजा है। सुरभी लिखती हैं कि बिल गेट्स ने लक्ष्मी पूजा कभी नहीं की, पर बिल गेट्स सबसे अमीर व्यक्ति हैं। आईंस्टीन ने कभी सरस्वती को नहीं पूजा पर वे सबसे इंटेलीजेंट साबित हुए, तो कर्म पर विश्वास रखें, भाग्य पर नहीं। वैसे भी किसी ने कहा है कि भाग्य के भरोसे बैठे रहने वाले वही पा पाते हैं, जो तेज दौडने वाले राह में पड़ी चीजों को चुनकर बाकी बेकार की चीजें छोड़ जाते हैं।

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2 Comments on "ये है दिल्ली मेरी जान"

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श्रीराम तिवारी
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अगला आलेख इस सन्दर्भ में अपेक्षित है की बराक ओबामा के ज्यादा नजदीक कौन .?भारत या पकिस्तान …

sunil patel
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बिलकुल सही कह रहे है श्री खरे साहब. शुक्र है सरकार ने पटाखे चलाने को तो नहीं मना किया है.
दिया जलाने को भी मना कर सकती है, कह सकते है की आग लगने का खतरा है. आखिर अमेरिका का लाख करोडो का कचरा जो खरीद रहे है (पल्सर DTS के ज़माने में कार की कीमत में लम्ब्रेटा जो खरीद रहे है – परमाणु समझोता).

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