लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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-शैलेन्द्र चौहान-
father depressed

आज एक थोड़ा चौंकानेवाला समाचार आया। बिहार के भागलपुर जिले में एक पिता ने बेटी का दहेज जुटाने के लिए बैंक में डाका डाला। पुलिस ने इस मामले में चार लोगों की गिरफ़्तारी की और उनके पास से छह लाख रुपये बरामद किए हैं। पुलिस के अनुसार छोटी लड़की के पिता कन्हैया ने अपनी सबसे छोटी बेटी के दहेज के लिए डाका डाला और इसमें उसके दामाद और अन्य रिश्तेदार भी शामिल थे। कुछ लोगों ने 26 मई को भागलपुर के घंटाघर में बिहार ग्रामीण बैंक को लूट लिया। गिरफ़्तार लोगों ने पूछताछ के दौरान बताया कि उन्होंने दहेज की रकम जुटाने के लिए डकैती की थी। डाके के बाद कन्हैया ने दहेज की रकम पहुंचाने के लिए लड़के वालों से संपर्क भी किया लेकिन पुलिस के दबाव के कारण ऐसा नहीं हो पाया। यूं पुलिस के हिसाब से इस लूट का मुख्य अभियुक्त कन्हैया यादव बैंक डकैती समेत कई मामलों में पहले से ही नामज़द है। यानि कि बड़ी लड़की का विवाह भी कन्हैया ने कुछ इसी तरह पैसे का इंतजाम करके किया था। इस समाचार के दो पहलू हैं। पहला तो यह कि दहेज़ लेना और देना एक अनिवार्य प्रथा है चाहे उसके लिए कुछ भी क्यों न करना पड़े। इसे समाज की पूर्ण स्वीकृति प्राप्त है तभी कन्हैया के सभी रिश्तेदार उसके साथ इस वारदात में शामिल थे। दूसरा यह कि आरोपी अपराध के कई अन्य छोटे-मोटे मामलों में भी नामदर्ज़ है। अर्थात आजीविका के लिए भी छोटे मोटे अपराध समाज में स्वाभाविक हैं जो महज बिहार के दूरदराज के एक गांव तक सीमित न होकर भारत के किसी भी हिस्से में होते रहते हैं। बड़ी चोरियों डकैतियों की बात छोड़ दें जिन्हें एक संभ्रांत या प्रभावशाली तबके का हासिल होता है। लेकिन यहां उल्लेखनीय यह है कि आज भी दहेज़ प्रथा भारतीय समाज में बहुत हद तक कायम है। भले ही वर्तमान समय में ऐसी अनेक अमानवीय रूढ़ियां अपना अस्तित्व खो चुकी हैं, लेकिन इन्हीं कुप्रथाओं में से एक दहेज प्रथा आज भी विवाह संबंधी रीति-रिवाजों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस कुप्रथा ने समाज को स्त्रीविरोधी और पाखंड का प्रतीक बना रखा है। और इसने आधे भारतीय समाज को अशक्त कर दिया है। यह एक ऐसे दैत्य का स्वरूप ग्रहण कर चुका है, जो पारिवारिक जीवन को देखते ही देखते विषाक्त कर डालता है। इसका विकृत रूप समाज को भीतर से खोखला कर रहा है। मध्य वर्ग इसका बहुत बड़ा वाहक है।  करोड़ों स्त्रियां इसकी बलिवेदी पर अपने प्राण दे चुकी हैं। इसने लाखों नारियों को पति का घर छोड़ने पर विवश किया है। समाज सुधारकों के प्रयत्नों के बावजूद दहेज़ प्रथा ने अत्यंत विकट रूप धारण किया हुआ है। यह कुप्रथा समाज तथा कन्या के माता पिता के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है। हमारा समाज पुरुष प्रधान है। हर कदम पर केवल पुरुषों को बढ़ावा दिया जाता है। बचपन से ही लड़कियों के मन में ये बातें डाली जाती हैं कि बेटे ही सब कुछ होते हैं और बेटियां तो पराया धन होती हैं। उन्हें दूसरे के घर जाना होता है, इसलिए माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा बेटा होता है न कि बेटियां। समाज में सबकी नहीं पर ज्यादातर लोगों की सोच यही होती है कि लड़कियों की पढ़ाई में खर्चा करना बेकार है। उन्हें पढ़ा-लिखाकर कुछ बनाना बेकार है, आखिरकार उन्हें दूसरों के घर जाना है। पर यदि बेटा कुछ बनेगा कमाएगा तो माता-पिता का सहारा बनेगा। यद्दपि न तो आज बेटे, मां बाप के साथ रह पाते हैं न ही वे उनका बहुत ख्याल ही रखते हैं।

एक और तथ्य यह भी कि लड़कों के ऊपर खर्च किए हुए पैसे उनकी शादी के बाद दहेज में वापस मिल जाता है। यही कारण है कि माता-पिता बेटों को कुछ बनाने के लिए कर्ज तक लेने को तैयार हो जाते हैं। पर पारम्परिक रूढ़िवादी समाज में लड़कियों की हालात दयनीय ही रहती है, उनकी शिक्षा से ज्यादा घर के कामों को महत्व दिया जाता है। ज्‍यादातर माता-पिता लड़कियों की शिक्षा के विरोध में रहते हैं। वे यही मानते हैं कि लड़कियां पढ़कर क्या करेगी। उन्हें तो घर ही संभालना है। परंतु माता-पिता को समझना चाहिए कि पढऩा-लिखना कितना जरूरी है वो परिवार का केंद्रबिंदु होती हैं । उसके आधार पर पूरे परिवार की नींव होती है। उसकी हर भूमिका चाहे वो बेटी की हो, बहन का हो, पत्नी की हो बहू का हो या फिर सास की, पुरुषों के जीवन को वही सही मायने में अर्थ देती है। लड़की के विवाह के लिए सामान्यत: निम्न मध्यमवर्गीय व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य से अधिक रूपये खर्च करने पड़ते हैं| इसलिए विवश होकर उसे या तो ऋण की शरण लेनी पड़ती है या अनुचित साधनों से वह धन की व्यवस्था करता है। ऋण लेकर विवाह करने पर कभी-कभी उसका समस्त जीवन ऋण चुकाने में ही निकल जाता है। यह सब कुछ सातवें दशक की किसी फिल्मी कहानी सा लगता है। लगता है कि आज भी बहुल समाज उन्नीसवीं सदी में जी रहा है। दहेज़ की समस्या के कारण और अपने माता पिता की दयनीय दशा देखकर कभी-कभी कन्याएँ इतनी निराश और दुखी हो जाती हैं कि आत्महत्या कर लेती हैं। वे सोचती हैं कि अपने माता पिता की दयनीय दशा का कारण वे ही हैं इसलिए “न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी ” लोकोक्ति चरितार्थ करती हुई वे अपना जीवन ही समाप्त कर लेती हैं। दहेज लोभी व्यक्ति केवल विवाह के अवसर पर मिले दहेज को पा कर ही संतुष्ट नहीं होते बल्कि विवाह के बाद भी कन्या पक्ष से उनकी माँगें बराबर बनी रहती हैं और अपनी इन अनुचित माँगों की पूर्ति का माध्यम वे इन विवाहित कन्याओं (वधुओं) को ही बनाते हैं। इन माँगों के पूरा न होने की स्थिति में वे नव वधुओं को शारीरिक एवं मानसिक यातनाएं देते हैं। जैसे भूखा रखना, बात-बात पर कटूक्तियां कहना, मारना पीटना, अंग भंग कर देना आदि तरीकों से वे नवविवाहिता को अपने माता पिता से दहेज लाने के लिए विवश करते हैं। यदि इतने पर भी वे और दहेज नहीं ला पाती हैं, तो उन्हें जिंदा जला दिया जाता है या हमेशा के लिए त्याग दिया जाता है। एक बड़ी कठिनाई इस मामले में यह पेश आती है कि लड़की के माँ बाप हमेशा इस बात से भयभीत रहते हैं कि अगर लडके वालों कि बात नहीं मानी गई,उन्हें मन मुताबिक दहेज़ न दिया गया तो वे लड़की को परेशान करेंगे इसलिए वे दहेज़ की अनुचित मांग भी स्वीकार लेते हैं। इस मामले में पढ़े-लिखे और कम पढ़े दोनों तरह के लोगों का एक ही तरह का सोच होता है। आश्चर्य तो यह कि वे मांए जो स्वयं इस कुरीति से प्रभावित हुई हैं वे भी इस काम को ठीक मान लेती हैं। कन्या के पढ़े-लिखे और अच्छी नौकरी करने के बावजूद वे दहेज़ देने की वकालत करने लगती हैं। जबकि सामने वाला उनकी इस कमजोरी का फायदा उठता है। यदि वे माँ बाप थोड़ी मजबूती दिखाएँ तो वरपक्ष को यह भी समझ आता है कि इनसे पंगा लेना ठीक नहीं। तब वह भी अपनी सीमा में रहने को बाध्य होता है। हमें यह समझना चाहिए कि ऐसी ही कमजोरी के कारण हम अपनी बेटी को दोयम श्रेणी के नागरिक के रूप में स्वीकार लेते हैं। यूँ ऊपरी तौर पर इस कुप्रथा का कोई भी पक्षधर नहीं दिखना चाहता परन्तु अवसर मिलने पर लोग दहेज लेने से नहीं चूकते| ज्वलंत प्रशन यह है कि इस सामाजिक कोढ़ को कैसे समाप्त किया जाये ? दहेज के सन्दर्भ में नवविवाहिताओं की म्रत्यु सम्बन्धी मामलों में न्यायधीशों ने नववधुओं के पिता, सास-ससुर आदि को म्रत्यु दंड देकर इस कुप्रथा को समाप्त करने की दिशा में प्रयास किया है, परन्तु यह कुप्रथा सुरसा के मुख की भांति बढ़ती जा रही है।  इसको दूर करने के लिए सरकार ने दहेज विरोधी क़ानून बनाया है। दहेज को अवैध घोषित कर दिया है, परन्तु क़ानून बन जाने से कुछ नहीं हो पा रहा है। इस कानून का दुरुपयोग भी होने लगा था अतः गत वर्ष इसमें संशोधन भी किया गया है।  फिर भी दहेज़ हत्याएं और प्रताङना एक वास्तविकता है। इसके विरोध में व्यापक जनचेतना की जरूरत है। व्यापक प्रयास करने की आवश्यकता है। इसे रोकने के लिए जागरूक नागरिकों को आगे आना होगा तथा दहेज़ देने और लेने वाले लोगों को इस बारे में प्रेरित करना होगा कि वे विवाह में किए जाने वाले फिजूल खर्च को बंद कर सादगी से ऐसे सामाजिक एवं पारिवारिक कार्यक्रम करें। सरकार के साथ-साथ समाज सेवी संस्थाएं तथा समाजसेवा में रुचि रखने वाले लोग इस प्रथा के विरुद्ध जागृति उत्पन्न करने तथा रोकने के कड़े उपाय करें, तो इससे छुटकारा पाया जा सकता है। इस तरह उन्हें कुछ अनुचित करने की आवश्यकता भी नहीं होगी और न  परेशानियों का सामना ही करना पड़ेगा।

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