लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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सिद्धार्थ शंकर गौतम 

उत्तरप्रदेश में छठे चरण के मतदान के बाद भी वहां की सियासी तस्वीर भले ही धुंधली हो, पर तमाम कयासों के बीच केंद्र सरकार पर पड़ने वाले आगामी परिणामों पर चर्चाओं का बाजार गर्म है। जिस तरह के संकेत मतदान से मिल रहे हैं, उनसे इतना तो साफ है कि प्रदेश में त्रिशंकु विधानसभा की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। बसपा और सपा क्रमश: पहले और दूसरे स्थान के लिए लड़ रहे हैं, तो तीसरे और चौथे स्थान के लिए मुकाबला भाजपा और कांग्रेस में है।

ऐसे में जो भी दल मतों की गिनती के बाद सबसे बड़े दल के रूप में उभरेगा, उसे सरकार बनाने के लिए किसी न किसी से तो गठबंधन करना ही होगा। पूर्व के सियासी अनुभवों को देखें, तो राज्य में सपा-कांग्रेस तथा बसपा-भाजपा में गठबंधन होता रहा है। फिर, राजनीति संशय का क्षेत्र है और प्रदेश में सत्ता की कुर्सी खाली पड़ी है। इस लिहाज से राजनीतिक दोस्ती-दुश्मनी तथा वैचारिक प्रतिबद्धताएं ताक पर रखी जा सकती हैं और कई चौंकाने वाले परिणाम सामने आ सकते हैं। अब कुछ लोग सोच रहे होंगे कि उत्तरप्रदेश के चुनाव परिणाम देश की राजनीति को बदलने की कूवत कैसे रखते हैं?

उनके इस सवाल का जवाब है कि प्रदेश में होने वाले सियासी गठबंधनों पर ही काफी हद तक केंद्र सरकार का भविष्य भी टिका हुआ है। केंद्र में मध्यावधि चुनाव की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल केंद्र में संप्रग के 260 सांसद हैं, तो बसपा-सपा के 44 सांसद उसे बाहर से समर्थन दे रहे हैं। मान लीजिए, अब यदि उत्तरप्रदेश में सपा-कांग्रेस का गठबंधन होता है, तो बसपा के 21 सांसद बिना देर किए केंद्र से समर्थन वापस ले लेंगे और यदि कांग्रेस-बसपा का गठबंधन होता है, तो सपा के 23 सांसदों का समर्थन केंद्र को मिलना बंद हो जाएगा। वहीं, राज्य में राष्ट्रपति शासन की अटकलों के बीच केंद्र को सपा-बसपा के 44 सांसदों के समर्थन से भी हाथ धोना पड़ेगा।

माया-मुलायम यह अच्छी तरह जानते हैं कि उत्तरप्रदेश की सत्ता के अलावा उनका कहीं ठौर नहीं है। इसीलिए दोनों की सर्वोच्च प्राथमिकता उत्तरप्रदेश है, न कि केंद्र सरकार को बचाना। ऐसे में कांग्रेस अजीब से सियासी दोराहे पर खड़ी हो गई है, जहां उसके लिए एक तरफ खाई, तो दूसरी ओर कुआं है। संप्रग की सहयोगी ममता बनर्जी तो कांग्रेस को जब-तक आईना दिखाती ही रहती हैं, शरद पवार ने भी कांग्रेस और राहुल को घेरना शुरू कर दिया है। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि उत्तरप्रदेश चुनाव में कांग्रेस की विफलता सीधे तौर पर राहुल गांधी की राजनीतिक विफलता होगी। उनके इस तीखे बयान पर कांग्रेस के दिग्गज भी बगलें झांकते नजर आए। जो कांग्रेसी सोनिया और राहुल के बारे में एक भी अपमानजनक टिप्पणी बर्दाश्त नहीं कर पाते, पवार के इस बयान पर वे चुप्पी क्यों साध गए?

कारण साफ है कि यदि कांग्रेस ने फिलहाल अपने किसी भी सहयोगी को आंख दिखाई, तो संप्रग सरकार का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। द्रमुक मुखिया करुणानिधि भी काफी दिनों से कांग्रेस से अलग अपनी ढपली, अपना राग अलाप रहे हैं। यानी, सहयोगियों के सितम से मार खाती संप्रग सरकार को बाहर से समर्थन दे रही सपा-बसपा का सहारा भी बहुत था, लेकिन उत्तरप्रदेश चुनाव ने उसके सारे समीकरण बिगाड़ दिए हैं। कांग्रेस की एक गलती अब देश को मध्यावधि चुनाव की ओर धकेल सकती है, जो न तो कांग्रेस चाहती है, न ही देश।

वैसे केंद्र में मध्यावधि चुनाव की आहट ने राजनीतिक दलों को सचेत कर दिया है। दबे-छिपे कई राजनीतिक समीकरण बनने लगे हैं। तीसरे मोर्चे ने पुन: स्वयं को मजबूत करना शुरू कर दिया है, तो वाम दल भी पुरानी जड़ों को मजबूत करने में लग गए हैं। दरअसल, केंद्र की इस हालत के पीछे उसके खुद के सिपहसालार ही हैं। दिग्विजय सिंह, कपिल सिब्बल, बेनी प्रसाद वर्मा, सलमान खुर्शीद जैसे नेताओं ने उल-जलूल बयानों से अपने सहयोगियों को तो नाराज किया ही, उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की वापसी की संभावनाओं को भी समाप्त कर दिया। रालोद से गठबंधन और अजित सिंह को उड्डयन मंत्री बनाना भी कई सहयोगियों को खल रहा है।

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