लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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-प्रमोद भार्गव-   railway

दाक्षिण भारत से जुड़े रेल मंत्री मल्लिकार्जुन खड़गे ने दाक्षिण भारतीय सांसदों द्वारा किए हंगामे के बीच अंतरिम रेल बजट पेश किया। तेलंगाना को लेकर हंगामा मचा रहे सांसदों में कांग्रेस के सांसद भी थे। इस कारण मल्किार्जुन बजट-भाषण पूरा नहीं पढ़ सके। रेल बजट के दौरान यह शर्मनाक स्थिति शायद पहली बार उत्पन्न हुई है। इस बजट में जिस तरह से यात्री किराया और माल भाड़ा नहीं बढ़ाने के साथ, कुल 68 नई रेलगाडि़यां चलाई जाने की बात कही गई है, उस कारण इस बजट को चुनावी एक्प्रेस बजट भी कहा जा रहा है। लेकिन हकीकत में यह लोकलुभावन स्थिति लालू प्रसाद यादव और ममता बनर्जी द्वारा पेश किए रेल बजटों की ही परंपरा को निर्वाह है। इस रेल बजट की खास बातें दो हैं, एक रेल प्राधिकरण के गठन की और दूसरे, रेलवे में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश के संकेत देने की। बजट में 17 प्रीमियम रेलें चलाने की घोषणा करके रेलवे ने जाहिर कर दिया है कि आखिरकार संप्रग सरकार अच्छी रेल सुविधाएं कुलीन वर्ग को ही देने पर आमदा है।
इस अंतरिम रेल बजट में भी आखिरकार रेलवे को सस्ती लोकप्रियता से उबारने की कोई कोशिश नहीं हुई। इस लिहाज से इस बजट को राजनीतिक कल्याण ट्र्रस्ट का बजट भी कह सकते हैं। हालांकि यात्री व माल भाड़ा नहीं बढ़ाने के पीछे तर्क दिया जा सकता है कि रेल प्राधिकरण इस बावत फैसले लगा। इस प्राधिकरण को केंद्रीय मंत्रीमंडल पहले ही मंजूरी दे चुका है। इसके पहले किराया और माल भाड़े की दरें तय करने का अधिकार रेलवे बोर्ड को था। लेकिन बोर्ड के फैसलों में राजनीतिक दखल बढ़-चढ़कर रहता था। लिहाजा रेलवे के तात्कालिक एवं दीर्घकालिक हित राजनीति की बलि चढ़ जाते थे। इससे रेलवे को जहां राजस्व हानि उठानी पड़ती थी, वहीं रेलवे परियोजनाएं अटक जाती थीं। नतीजतन रेलवे में सुरक्षा संबंधी तकनीकि उपकरण नहीं लगाए जा सकें। रेलों को टक्कर रोधी भी नहीं बनाया जा सका। पुराने पुलों की मरम्मत और रेल के पार-पथों पर न तो चौकीदार तैनात किए जा सके और न ही बैरियर लगाने का काम पूरा हुआ।जाहिर है, लोक लुभावन रेल बजट रेल के आधुनीकिकरण में बढ़ी बाधा बनकर उभरे हैं। इस लिहाज से प्रधिकरण अंकुश लगाने का काम करेगा? प्राधिकरण का गठन इसलिए भी जरूरी था, क्योंकि वर्तमान में रेल किराया न बढ़ाए जाने के कारण रेलवे को केंद्र सरकार के द्वारा प्रति वर्ष 25 हजार करोड़ की सबसिडी दी जा रही है। हालांकि इस प्राधिकरण की वैधता तभी साबित होगी, जब रेलवे अधिनियम 1989 में संशोधन प्रस्ताव लाकर संसद इसे मंजूरी देगी। यह काम अब लोकसभा चुनाव के बाद नई सरकार को करना होगा।
रेल देश की एकता का प्रतीक है। पिछले बजट में पहली बार पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर और अरूणाचल प्रदेश को रेल से जोड़ने की बात कही गई थी। अब रेल का विस्तार मेघालय में भी होगा। दिल्ली में पूर्वोत्तर के लोगों पर जिस तरह से जानलेवा हमले हुए हैं,उस संदर्भ में पूर्व से पश्चिम तक रेलवे कॉरीडोर का विस्तार विविधता में एकता को मजबूत करने वाला आभियान है। रेल मंत्री ने 64,875 नई बोगिया बनाने की घोषणा की है। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए रायबरेली, छपरा और धनपूरी में यात्री डब्बे बनाए जाने के कारखाने लगाए जा रहे हैं। इनमें से अभी लघु पैमाने पर डब्बों का उत्पादन रायबरेली में ही शुरू हुआ है। ऐसे में इतने डिब्बे कैसे तैयार होगें,यह एक बड़ा सवाल है। रेल मंत्री ने 38 एक्प्रेस, 17 प्रीमियम, 10 यात्री, 4 मेमो और 3 डेमो रेलें नई चलाने की बात कही है। इन रेलों को अगले वित्त वर्ष में तभी चलाना संभव हो सकेगा, जब तीनों कोच कारखानें अपनी पूरी क्षमता से डब्बों का निर्माण शुरू कर दें, क्योंकि फिलहाल हमारी डब्बे बनाने की क्षमता हजार-बारह सौ डब्बे बनाने की हैं।
17 प्रीमियम रेलें चलाए जाने पर सवाल उठना लाजिमी है। ये वातानुकूलित रेलें सुरक्षा व सुविधाओं से तो परिपूर्ण होंगी,ही इनका किराया भी अधिकतम होगा। इनके स्टॉपेज कम से कम होंगे। जाहिर है, ये रेलें उन लोगों के लिए होंगी,जो आभिजात्य तबके से आते हैं और यात्रा के लिए उनके पास हवाई यात्रा के भी विकल्प होते है। इसकी बजाए ये रेलें लालू यादव के कार्यकाल में चलाई गईं ‘गरीब-रथ‘ की तर्ज पर होती, तो इनमें हर जरूरतमंद यात्री यात्रा कर सकता था। इस प्रस्ताव को चुनाव के बाद नई सरकार बदल दे तो अच्छा होगा?
दरअसल ऐसे उपाय रेलवे की आमदानी बढ़ाने की ओट में किए जा रहे है,क्योंकि रेलवे को घाटे से उबारने के लिए 60 हजार करोड़ रूपए की आय बढ़ानी है। मौजूदा वित्तीय साल में भी रेलवे की आय में 4000 करोड़ रूपए की कमी हुई है। इसके आलावा 5000 करोड़ रूपए ऐसे मदों में खर्च किए गए हैं,जिनकी जरूरत नहीं थी। लिहाजा हाल ही में नियंत्रक एवं महालेख परीक्षक की जो रिपोर्ट आई है, उनमें रेलवे के घाटों के कारणों में भ्रष्टाचार और लीकेज बताए गए हैं। रेलवे महत्वपूर्ण लोगों को सुविधा देने के बहाने 28 प्रकार के रियायती अथवा मुफ्त पास देती है। देश के सभी वरिष्ठ नागरिकों को खैरात में यात्रा के लिए 30 फीसदी छूट दी जा रही है। यह छूट करोड़पतियों को भी दी जा रही है। जबकि इसे बीपीएल कार्डधारियों तक सीमित करने की जरूरत है। इस छूट के चलते धर्मभीरू लोग हरेक पर्व और मेला विशेष के अबसर पर रेल यात्रा करने लगे हैं। यह छूट रेलों में बेवजह भीड़ बढ़ाने के साथ असुरक्षा बढ़ाने का काम भी कर रही है। रेल में लेट-लतीफी की भी यह एक वजह है।
रेल मंत्री ने रेलवे में पूंजी निवेश के संकेत दिए हैं। पिछले वित्त वर्ष में रेल मंत्री पवन बंसल ने भी 63,300 करोड़ के पूंजी निवेश और 600 करोड़ पीपीपी से जुटाने की उम्मीद जताई थी। लेकिन कोई बात बनी नहीं। रेलवे नए कोच कारखाने और रेलवे को बंदरगाहों से जोड़ने का काम एफडीआई से कर सकती है। बंदरगाहों को जोड़ने में करीब 9000 करोड़ की पूंजी लगाई जाना प्रस्तावित है। लेकिन दृढ राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना निवेश में आ रहे गतिरोधों को तोड़ना मुश्किल ही है। बहरहाल,इस अंतरिम बजट को न तो बदलाव का बजट माना जा सकता है और न ही लोक-लुभावन। क्योंकि नई रेलें चलाने की घोषणाएं हर बजट में होती हैं। इसलिए इन्हें चुनावी सौगात नहीं माना जाना चाहिए।

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