लेखक परिचय

इफ्तेख़ार अहमद

मो. इफ्तेख़ार अहमद

लेखक इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के अनुभवी पत्रकार है। वर्तमान में पत्रिका रायपुर एडिशन में वरिष्ठ सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं और निरंतर लेखन कर रहे हैं। कई राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों में इनके लेख प्रकाशित हो चुके हैं। पत्र पत्रिकाओं के लिए लेख मंगवाने हेतु 09806103561 पर या फिर iftekhar.ahmed.no1@gmail.com पर संपर्क करें.

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मो. इफ्तेखार अहमद,

रमजान का महत्व धार्मिक ही नहीं, वैज्ञानिक भी

’’रमजान‘‘ के पाक महीना के आरम्भ होते ही मस्जिदों में इबादत की हलचल व तिलावत-ए कुरआन षरीफ गुंजने लगी है। रोजे की पवित्रता से लोगों के मन इस कद्र पाक हो जाता है कि षाम होते ही रोजेदार इफतार के लिए रंग-बिरंगी टोपियॉ सर पर लगा कर अमीर-गरीब एवं छाटे-बड़े का भेद-भाव भूल कर एक साथ रोजा खोलने के लिए जमा होते है तो ऐसा लगता कि मानो ईष्वर ने किसी बाग़ में रंग-बिरंगे फूलों को अपने हाथों से सजाया हो। जिसे देख कर दूसरे भी षन्ति का आभास कर आनंद की अनुभूति प्राप्त करते है। रात होते ही मस्जिदों में तरावीह की नमाज में होने वाली कुरआन की तिलावत से मस्जिदों में कुरआन की मधुर संगीतमय स्वर गुंजने लगती है। यह सिलसिला पुरे महीने चलता है जिस में कम से कम एक बार पुरा कुरआन षरीफ आवष्य पढ़ा जाता है।रमजान हिजरी संवत के अनुसार साल का नवां महीना होता है। कुरान षरीफ का नुजूल भी इसी महीने में हुआ था। रमजान में मुस्लिम समाज पूरे महीने का रोजा रखते हैं। रोजा इस्लाम धर्म की पांच प्रमुख फर्जों में से एक है जो हर बालिग मर्द एवं औरतों पर फर्ज है। रोजेदार सुबह सूरज निकलने से पूर्व से लेकर सूयास्त तक कुछ भी खाते-पीते नहीं हैं। मुस्लिम समाज रोजा सिर्फ इसलिए रखते हैं कि इसका आदेष उनके धर्म में दिया गया है लेकिन आधुनिक विज्ञान की दृश्टि से किए जारहे रिसर्च एवं अध्ययन से रोजे के अनेक सामाजिक एवं वैज्ञानिक लाभ सामने आ रहे हैं।

स्वास्थ्य लाभ:
पैगम्बर मोहम्मद. (स.) ने फरमाया कि रोजे रखा करो, स्वस्थ रहा करोगे।” इस तरह की अनेक हदीस हैं जिस में यह बताया गया है कि रोजा बीमारियों से बचाता है। जिस की पुश्टि आधुनिक मेडिकल साईंस से भी होती है। जो यह बताती है कि कभी-कभी कुछ समय अंतराल के पष्चात खाना-पीना बंद करके अपने पाचन क्रिया को, जिस पर पूरे षरीर का स्वास्थ्य निर्भर करता है को खाली रख कर आराम दिया जाना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से पेट में उपस्थित व्यर्थ पदार्थ जल कर साफ हो जाता है जिससे पाचन क्रिया पुनः सही तरीके से कार्य करने लगता है।
जर्मनी, इंग्लैण्ड और अमेरिका के माहिर डॉक्टरों की एक टीम रमजान के अवसर पर इस बात की पड़ताल करने के लिए आई कि रमजान में मुसलमानों के कान, नाक, मुंह एवं गले की बिमारी कम हो जाती है। इस के परिक्षण के लिए उन्होंने पाकिस्तान के तीन षहरों करांची, लाहौर एवं फैसलाबाद का चुनाव किया। इस सर्वे के बाद उन्होंने जो रिपोर्ट पेष की उसका खुलासा था…..(.1)चूंकि मुसलमान नमाज पढ़ंते हैं और खास तौर पर रमजान में ज्याद पाबंदी करते हैं। इसलिए वजू अर्थात नमाज से पूर्व हाथ, पांव, मंुह, गला एवं नाक की सफाई करने से नाक, कान, गले की बिमारी कम हो जाती है।
1. खाना कम खाने से मेंदे एवं जिगर की बिमारियां कम हो जाती हैं।
2. चूकि मुसलमान रमजान में डाईटिंग करते हैं इसलिए वह दिल की बिमारी के षिकार भी कम होते हैं। (फाइल दैनिक उर्दू जंग, पाकिस्तान 1988)
इस्लाम धर्म किसी इन्सान पर उसकी ताकत से ज्यादा बोझ डालने के खिलाफ है। यही कारण है कि बीमार, मुसाफिर, बूढ़े, गर्भवती एवं दूध पिलाने वाली महिलाओं एवं बच्चों पर रोजा रखने की बंदिष नहीं है। जिसे आधुनिक मेडिकल साईंस भी सराहता है।

मनोवैज्ञानिक लाभ:
कुरआन षरीफ में अल्लाह तआला फरमाते हैं कि “रोजे रखवाने का मकसद तुम्हें भूखा रखना नहीं है, बल्कि तुम्हें रोजा रखने का आदेष इसलिए दिया गया है ताकि तुम अपनी इन्द्रियों पर काबू पाकर परहेजगार बन सको।“
आमतौर पर दिनभर कुछ न खाने पीने को रोजा समझा जाता है। लेकिन रोजे का अर्थ इससे अधिक व्यापक है रोजे में ष्रीर के अलग अलग अंगों का रोजा इस प्रकार है। पेट को खाने एवं पीने से, कान को गलत बातों को सुनने से ,ज़बान को झूठ, किसी के पीठ पीछे बुराई करने एवं दूसरों के दिल दुखाने वाले गलत षब्दों के प्रयोग से, आंखों को गलत चीजों एवं किसी की मां, बहन एवं बेटी को गलत निगाह से देखने से, हाथों को किसी को नुकसान पहंुचाने से, पांव को किसी को नुकसान पहुंचाने एवं गलत रास्ते पर चलने से बचाना एवं दिल का रोजा गलत इरादों से बचकर ईष्वर की तपस्या करना है।
रोजेदार के घर में जब सब कुछ होता है और उन्हें कोई रोकने-टोकने एवं देखने वाला नहीं होता है तब भी वह मानते हैं कि ईष्वर मुझे देख रहा है और ऐसा मानकर वे भूख एवं प्यास की परेषानी तो झेलते हैं पर छुप कर कुछ खाते-पीते नहीं हैं। रोजे को समझकर रखने के कारण ईष्वर के प्रति उनकी आस्था मनोवैज्ञानिक रूप से इसकद्र मजबूत हो जाते है कि आम दिनों में भी कोई ऐसा कार्य जिसे धर्म में मना किया गया हो दुनिया की कोई भी षक्ति या लालच करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती है। उनके विष्वाष का यह हाल होता है कि मरने की नौबत आने पर भी बुरे कार्यों में संलिप्त नहीं होते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि यदि मैंने कोई ऐसा गलत कार्य कर लिया जिसे ईष्वर ने मना किया है तो मैं उस के पास किस मुहॅ से जाऊॅगा।

रोजे के सामाजिक लाभ:
रोजा केवल एक उपासना पद्धति एवं ईष्वर को प्रसन्न करने का तरीका भर नहीं है। मानव को ईष्वर ने अषरफुल मखलुकात अर्थात सारे प्राणियों में सर्वोत्तम बनाया है। रोजा एक-दूसरों के दुख दर्द को समझने एवं मदद करने के लिए प्रेरित कर इस अवधरण को साकार रूप देता है। समाजषास्त्र की दृश्टि से देखें तो यह ’’सहभागी अवलोकन‘‘ के सिद्धांत जिसमें यह बताया गया है कि ‘‘यदि आप किसी समाज विषेश के दुःख दर्द एवं परेषानियों को समझना चाहते हैं तो उनके साथ उन के ही जैसी जिन्दगी गुजारना होगा। तभी उनकी परेषानियों से भलिभांति परिचित हो कर उनका उपचार कर सकते है’’ का प्रयोगिक रूप है। सर्वप्रभम मुसलमानों को रोजा रखकर भूख की सिद्दत को समझने का मौका दिया जाता है कि यह सोंचो कि तुम्हारे वह भाई जो गरीब हैं जिनके पास दो जून की रोटी नहीं होती है। उनका दुःख दर्द कैसा होता होगा ? इसके बाद मुसलमानों को यह आदेष दिया गया कि यदि इस महीने में अपने माल का जकात अर्थात अवष्यकता से अधिक धन का ढ़ाई प्रतिषत दान में गरीबों को दोगे तो इसका पुण्य सत्तर गुना बढ़ा दिया जायेगा। इसका सिर्फ एक ही कारण है कि मुसलमान इस महीने में खुद भूखः की ताब झेलते है। अतः दूसरों के दुःखों को महसूस कर उनकी मदद अवष्य करेंगे। यही वजह है कि इस महीने में मस्जिदों में पकवानों, फलों एवं अन्य खाद्य सामग्री की ढे़र लग जाती है। जहां बड़े-छोट, अमीर-गरीब सभी एक कतार में बैठकर बिना किसी भेदभाव के एक ही बर्तन में खाते हैं। इस महीने में अमीर मुसलमान बड़ी संख्या में जकात गरीबों को देते हैं। जिस के कारण रमजान के पष्चात मनाई जाने वाली ईद अमीरों के साथ-साथ गरीबों के लिए भी खूषी का दिन होता है। इस प्रकार रोजा मूल्यपरक जीवन जीने का प्रषिक्षण षिविर का कार्य करता है।

अन्य धर्म एवं महापुरूशों की दृश्टि में रोजाः
कुरान षरीफ की सुरा-ए- बकरा की आयत नं. 22-23 अल्लाह तआला फरमाते है कि “ऐ मुसलमानों तुम पर रोजा फर्ज किया जाता है जैसा कि तुम से पहले के कौमों पर भी रोजा फर्ज किया किया था ताकि तुम्हारे अंदर परहेजगारी पैदा हो।“ यही कारण है कि हर धर्म में कहीं फास्ट के रूप में तो कहीं उपवास के रूप में रोजा मौजूद है और इस के सामाजिक एवं स्वास्थ लाभ को देखकर अनेक विद्वान भी समय-समय पर ऐसा करने के लिए कहते रहे हैं।
हरितक्रांति के प्रणेता पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर षास्त्री जब भारत के प्रधानमंत्री थे। उस समय भारत खाद्य समस्या का षिकार था। तब उन्होंने जय जवान जय किसान के साथ एक बात और कही थी। वह यह कि हर सोमवार को उपवास रखो। यह उन्होंने किसी धार्मिक कारण से नहीं वरन उपवास रखकर अनाज की बचन करने की गर्ज से कहा था। क्योंकि इससे हमारे षरीर पर कोई बुरा असर भी नहीं पड़ता है और लाखों टन अनाज की बचत के साथ स्वास्थ लाभ भी होता है।
चीन के राश्ट्रपिता माव त्जे तुंग के सामने जब भूखमरी जैसी सामाजिक समस्या थी। तब उन्होंने अपने भाशण में इस बात पर जोर दिया था कि खूद खाना खाते हुए अपने पड़ोसी और देखने वालों को भी
श।मिल कर लिया करो। खूद भूखे रहकर भूखों का एहसास पैदा करो। जिसे इस्लाम धर्म के मानने वाले पिछले 1400 सालों से रोजे के रूप में निभाते आ रहे हैं।

E-mail Id: iftekhar .ahmed@yahoo.com

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