लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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-मनमोहन कुमार आर्य-

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विश्व के सभी मानवों की संस्कृति क्या है? इसका उत्तर है कि संसार की सबसे प्राचीन एवं सब सत्य विद्याओं सहित जीवन के प्रत्येक पहलू पर प्रकाश डालने वाली ईश्वर प्रदत्त दिव्य ज्ञान की पुस्तक ‘वेद’ सारे विश्व की धर्म, संस्कृति, शिक्षा, संस्कार व सभ्यता का मूल है। वेदों के अनुरूप कार्य, व्यवहार व आचरण ही मानव संस्कृति कहलाता है और इसके विपरीत आचरण मानवेत्तर या पशु संज्ञक कार्य होता है। इस पर विचार करते हैं। संस्कृति, शिक्षा, संस्कार, सभ्यता आदि शब्द धर्म शब्द के विस्तार प्रतीत होते हैं। धर्म का अर्थ है सत्य गुण,कर्म व स्वभाव को सभी मनुष्यों द्वारा जीवन में धारण किया जाना। सत्य एक व्यापक शब्द है। ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति (कारण व कार्य प्रकृति दोनों) का संसार में अस्तित्व है जो कि सत्य है। जिस पदार्थ व वस्तु की सत्ता यथार्थ हो वह सत्य होती है और जिसकी सत्ता न हो व जो जिसकी मात्र कल्पना की गई हो, वह असत्य होती है। ईश्वर, जीव व प्रकृति इन तीन तत्वों व पदार्थों का यथार्थ ज्ञान सृष्टि की आदि या आरम्भ में ईश्वर प्रदत्त ज्ञान वेद में तथा उसके बाद ऋषियों द्वारा वेदों पर किए गए व्याख्यानों जो ब्राह्मण ग्रन्थ, दर्शन, उपनिषद्, मनुस्मृति आदि ग्रन्थों के रूप में हैं, विद्यमान है। वेदादि इन ग्रन्थों में ईश्वर, जीव व प्रकृति विषयों का जो विज्ञान सम्मत निर्भ्रान्त ज्ञान है वह इन शास्त्रीय ग्रन्थों के अध्ययन से प्राप्त होता है। क्या यह ज्ञान वेदेतर अन्य धर्म या मजहब के ग्रन्थ कहलाने वाली पुस्तकों से हो सकता है? ऐसा कदापि नहीं हो सकता क्योंकि वह अनेक विषयों में वेद विरूद्ध होने से सत्य व असत्य से मिश्रित हैं। इन सब ग्रन्थों की महर्षि दयानन्द ने सूक्ष्मता से जांच-पड़ताल की है जिसमें उन्हें सभी मतों के ग्रन्थों में प्रचुर मात्रा में असत्य मान्यतायें दृष्टिगोचर हुईं हैं। ऐसी कुछ असत्य, कल्पित व ज्ञान विरूद्ध बातों का दिग्दर्शन उन्होंने अपने सत्यार्थ प्रकाश ग्रन्थ में कराया है।  इन वेदेतर मतों व मजहबी ग्रन्थों में न तो ईश्वर का और न ही जीवात्मा के सत्य स्वरूप का ज्ञान उपलब्ध होता है। जहां तक प्रकृति के सत्य स्वरूप का ज्ञान है वह भी किसी एक मजहब के ग्रन्थ में भी उपलब्ध नहीं होता। हां, विज्ञान के पास इस विषय में कुछ व अधिकांश सत्य ज्ञान उपलब्ध है। हमें लगता है कि कालान्तर में विज्ञान द्वारा सृष्टि विषयक ज्ञान की खोज वेद वर्णित प्रकृति के ज्ञान को जानकर पूरी हो सकती है। धर्म के अन्तर्गत मनुष्य को किन गुणों को धारण करना है, तो इसका उत्तर है कि धैर्य, क्षमा, इच्छाओं का दमन, अस्तेय अर्थात् चोरी की प्रवृत्ति का त्याग, शौच, इन्द्रिय निग्रह, बुद्धिमत्ता या विवेकशीलता, विद्या, सत्य व अक्रोध आदि गुणों को धारण करना ही धर्म है और इन गुणों से युक्त मनुष्यों द्वारा किये जाने वाले व प्रचारित सभी अच्छे कार्यों की संज्ञा संस्कृति है।

वेदों में मनुष्य जीवन के सभी पक्षों पर प्रकाश डाला गया है। वेदों के आधार पर ही हमारे ऋषियों ने 16 संस्कारों की रचना की है। बालक व बालिका के जन्म से पहले ही सुसंस्कारों से युक्त सन्तान के लिए माता-पिता को तैयारी करनी होती है। संस्कारों का आरम्भ अन्य मतो व मजहबों की तरह शिशु के जन्म लेने से आरम्भ न होकर गर्भाधान संस्कार व उससे भी पूर्व किया जाता है। अच्छी सन्तान के लिए सन्तानोत्पत्ति से पूर्व माता-पिता का ब्रह्मचर्य को धारण करना कर्तव्य होता है। वैदिक संस्कारों से सन्तान को सुभूषित करने के लिए हमारे यहां गुरूकुलीय शिक्षा पद्धति विकसित व प्रचलित की गई थी। गुरूकुलीय शिक्षा पद्धति की एक विशेषता यह है कि वैदिक व आर्ष गुरूकुलों में आर्ष व्याकरण, चारों वेदों व इतर शास्त्रों के ज्ञानियों द्वारा अध्ययन कराया जाता है। भाषा संस्कृत होती है जिसमें हमारा सारा प्राचीन साहित्य व शास्त्र विद्यमान हैं। ब्रह्मचारी वा विद्यार्थी को गायत्री मन्त्र का उच्चारण कराकर व वेदोपदेश देकर उसका अध्ययन आरम्भ होता है। वह गुरूकुल में स्नातक बनने तक प्रातः व सायं ब्रह्मयज्ञ=सन्ध्या=ईश्वरोपासना व अन्य चार यज्ञों को वैदिक व वैज्ञानिक विधि से करता है। इसमें कहीं किसी प्रकार का अन्धविश्वास व पाखण्ड नहीं होता। केवल आत्मा को परमात्मा से संयुक्त करना ही सन्ध्या या उपासना का उद्देश्य है व इसे सफल करने का प्रयास ही ‘‘सन्ध्या’’ व ‘‘ध्यान’’ की क्रिया है। यह पंचमहायज्ञ भी वस्तुतः पांच प्रकार के प्रमुख संस्कार हैं और इसी से बालक व बालिका, ब्रह्मचारी व ब्रह्मचारिणी अथवा विद्यार्थी व विद्यार्थिनी सुसंस्कृत होते हैं। इसके विपरीत बालक-बालिकाओं के जीवन को हम संस्कृति रहित, संस्कृति के विपरीत या अल्प मात्रा में संस्कृतियुक्त जीवन की संज्ञा देते हैं। स्नातक बनने तक शिष्य व शिष्या वैदिक संस्कारों से समलंकृत व अभ्यस्त हो जाते हैं। हमें इन्हें संस्कारित व भारतीय वैदिक संस्कृति के अनुरूप युवा कह सकते हैं। इनमें पंचमहायज्ञों के संस्कार तो होते ही हैं अपितु इसके साथ यह सदाचारी, धर्मात्मा, साहसी, निर्भय, वीर, सत्यानुरागी,सत्यमानी, सत्याचारी, ईश्वर भक्त, गुरूभक्त, मातृ-पितृ-आचार्य भक्त, देश भक्त, समाज-सेवक, परोपकारी व सच्चे शिक्षक होते हैं। ऐसे सदाचारी युवक व युवती हमारी आजकल की अन्य शिक्षा पद्धतियों में नहीं बनते। आजकल का उच्च शिक्षित व्यक्ति तो ईश्वर व जीवात्मा के स्वरूप को परिभाषित भी नहीं कर पाता।  वह आधुनिक शिक्षा में दीक्षित होने पर भी इन दोनों सत्ताओं के यथार्थ स्वरूप से अनभिज्ञ रहता है। अब रहा आजकल के नवीन विषयों जिसमें एक या अधिक भाषाओं का ज्ञान, विज्ञान, गणित, कला, समाज, राजनीति, अर्थशास्त्र, इलेक्ट्रोनिक्स, कम्प्यूटर, इंजीनियरिंग, चिकित्सा व अन्य सभी प्रकार के आधुनिक ज्ञान व विज्ञान आदि विषयों के अध्ययन की बात है तो हमें वैदिक गुरूकुलों में इन विषयों के अध्ययन में कहीं कोई कठिनाई दिखाई नहीं देती। कठिनाई केवल गुरूकुलों में साधनों के अभाव के कारण हैं जहां सरकारी सहायता का न दिया जाना है। गुरूकुल में बिना साधनों के ही वह कार्य होता है जो किसी चमत्कार से कम नहीं है। यदि सरकारी विद्यालयों की तरह से गुरूकुलों को आर्थिक व अन्य सहायता मिले तो यह वो कार्य कर सकते हैं जिसे कल्पनातीत कह सकते हैं। गुरूकुल का विद्यार्थी इन प्राचीन व आधुनिक सब विषयों को बहुत अच्छी तरह पढ़ व सीख सकता है। हमारा अनुमान है कि वह प्रयत्न करने पर आजकल के विद्यार्थियों से कुछ अधिक ही सीखेगा क्योंकि गुरूकुल में माता-पिता व परिवार के सदस्यों से पृथक रहने से उसके पास समय अधिक होता है और उसके मन में आजकल के युवकों की तरह अनाप-शनाप विचार कुप्रभावित कर अपना दास नहीं बनाते। इस प्रकार आधुनिक विषयों का भी साथ-साथ अध्ययन करने से गुरूकुल का विद्यार्थी आज के समय की आवश्यकता के अनुरूप सभी गुणों से युक्त व अवगुण-शून्य बलवान व मेधावी युवा बनाया जा सकता है। ऐसा युतक ही भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधि होता है। हम उदाहरण के रूप में राम, कृष्ण, पाणिनी, यास्क, पतंजलि, कपिल, कणाद, गौतम, बादरायण व्यास, बाल्मिीक, पाणिनी, दयानन्द, चाणक्य, शंकर, श्रद्धानन्द, गुरूदत्त विद्यार्थी, पं. लेखराम, स्वामी दर्शनानन्द, मेहता जैमिनी आदि को प्रस्तुत कर सकते हैं। यह भारतीय संस्कृति के आदर्श थे। इनका अध्ययन व कार्य भारतीय वैदिक संस्कृति के मार्गदर्शक हैं और इसके विपरीत जो कार्य, क्रियायें व अन्य बातें समाज में हो रहीं हैं वह सब संस्कृति के विपरीत कही जायेंगी।

इससे पूर्व कि हम अन्य संस्कारों की चर्चा करें, जो संस्कृति का ही अंग हैं, हम वैदिक संस्कृति के मुख्य आधार चार आश्रमों की चर्चा करते हैं। वैदिक मान्यताओं के आधार पर जीवन को चार आश्रमों में विभाजित किया गया है जिनमें सामान्यतः प्रथम 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य, इसके बाद दूसरा 50 वर्ष की वय तक गृहस्थ, तीसरा वानप्रस्थ जो आयु के 50 से 75 वर्षों के मध्य होता है तथा इसके बाद शेष आयु पर्यन्त चौथा संन्यास आश्रम है। ब्रह्मचर्य आश्रम में गुरू के सान्निध्य में रहकर सभी विद्याओं का अर्जन, दूसरे आश्रम में गृहस्थ जीवन व उसके कर्तव्यों का वेदानुसार निर्वाह, वानप्रस्थ में परिवार से पृथक वन व अन्य किसी स्थान पर आश्रम में पत्नी सहित या अकेले रहकर अध्ययन, अध्यापन, चिन्तन, मनन, सन्ध्या-उपासना-योगाभ्यास आदि में संलग्न रहना तथा अन्तिम चतुर्थ संन्यास आश्रम में देश व समाज के कल्याण के लिए अपने ज्ञान व योग्यता का बिना किसी लोभ व आर्थिक प्रयोजन के प्रचार व प्रसार करना होता है। इन सभी 4 आश्रमों के कर्तव्य व व्यवहार निर्धारित हैं। इनका पालन व आचरण ही संस्कृति है। सामान्य, सरल व साधारण धोती, कुर्ता धारण कर व शुद्ध भोजन कर अपने लक्ष्य की प्राप्ति में एकनिष्ठ संलग्न रहना ही वैदिक व भारतीय संस्कृति है।  बिना किसी उद्देश्य के मनोरजंन, सुरम्य स्थानों की यात्रा करना व अनावश्यक घूमना-फिरना, अनेक प्रकार के अन्य कार्याें को करना जो हमारे जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य ‘‘भोग व अपवर्ग’’ अथवा ‘‘धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष’’ में सहायक होने के स्थान पर इनके विपरीत हों, धर्म व संस्कृति में नहीं आता। इससे हम अपने उद्देश्य से भटक जाते हैं और यह हमारे जीवन के उद्देश्य की प्राप्ति में बाधक होते हैं जिससे फिर हम बन्धनों में फंस कर जन्म-मरण व सुख-दुःख के चक्र में उलझ कर अपने जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य से दूर हो जाते हैं और दुःख पाते हैं। अन्य देश व समाजों में क्योंकि जीवन के उद्देश्य का ही किसी को पता नहीं है और न वहां चार आश्रमों का ही ताना-बाना है, अतः वहां का जीवन व व्यवहार सुख व दुःख के चक्र में फंस कर इस मानव जीवन के उद्देश्य से भटक कर इस जीवन को एक प्रकार से बर्बाद करना ही है।

अब हम 16 संस्कारों पर कुछ चर्चा करते हैं। 16 संस्कार हैं – गर्भाधान, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णवेध, उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन, विवाह व गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास आश्रम प्रवेश संस्कार व अन्त्येष्टि कर्म एवं विधि।  इन संस्कारों का उद्देश्य मानव जीवन को समुन्नत करना है। हम यहां इतना और बता देना चाहते हैं कि मनुष्य एक भौतिक शरीर एवं चेतन अनादि, नित्य, अजन्मा व अमर जीवात्मा का युग्म है। हमारे जीवन का उद्देश्य शारीरिक उन्नति के साथ बौद्धिक, मानसिक व आत्मिक सहित सामाजिक उन्नति करना है। शरीर की उन्नति अच्छे भोजन अर्थात् युक्ताहारविहार से होती है तथा बौद्धिक व आत्मिक उन्नति ईश्वरोपासना आदि अच्छे संस्कारों, वेद-विद्या के अर्जन, अभ्यास व तदनुकुल आचरण से होती है। यह भी ध्यान रखने योग्य तथ्य है कि आज भारतीय व विश्व समाज अनेक अन्धविश्वासों, अज्ञानमूलक कृत्यों, रूढ़ अनावश्यक रीतिरिवाजों व पर्वों, कर्मकाण्डों, पाखण्डों यथा मूर्तिपूजा, अवतारवाद, जन्म जाति व ऊंच-नीच की भावनाओं आदि से ग्रसित है। शिक्षा व्यापार बन चुकी है। नैतिक मूल्य समाप्ती पर हैं। हमारे शिक्षित कहे जाने वाले सम्भ्रान्त व्यक्तियों का आचरण, व्यवहार व चरित्र भी स्वार्थ व मिथ्याचारों से परिपूर्ण है। शिक्षा अपना महत्व खो चुकी है या खो रही है। संस्कृति में इन मिथ्याचारों का कोई स्थान नहीं है। यह मिथ्याचार संस्कृति की विकृतियां हैं। जीवन में मिथ्याचार व विकृतियां कभी भी संस्कृति वा इसका अंग नहीं बन सकती हैं। सस्कृति वही है जो वेदों से पोषित है वा वैदिक मूल्यों के अनुकूल, अनुरूप व उसकी पूरक है। देश काल व परिस्थितियों के अनुसार हमारे जीवन व कार्य, व्यवहार व आचरण में न्यूनाधिक हो सकता है परन्तु वह वेदाचरण के अनुकूल होना चाहिये,विपरीत नहीं। तभी वह आचरण, व्यवहार या जीवन शैली संस्कृति शब्द से ग्रहण की जा सकती है।

संस्कारों के सन्दर्भ में हम यह भी विचार करते हैं कि ईश्वर से हमें पांच ज्ञानेन्द्रियां मिली है। हम देखकर, सुनकर, सूंघकर, चखकर व स्पर्श द्वारा ज्ञान प्राप्त करते हैं। 16 संस्कारों में जो मन्त्र बोले जाते हैं, उनका अपना महत्व है। आज दुर्दैव से हम संस्कृत व संस्कृति से दूर चले गये हैं। हम इतने अयोग्य हैं कि हमें ईश्वर की वाणी जो हमारे लिए मातृभाषा से भी बढ़कर है, उसे जानते व समझते ही नहीं है। इसी कारण मुख्यतः हम संस्कार विहीन हैं। वैदिक काल में ऐसा नहीं था। तब सब संस्कृत जानते थे और अधिकांश व सभी वेद मन्त्रों के सही व यथार्थ अर्थ भी जानते थे। इसके साथ सभी संस्कारों में कुछ क्रियायें भी की जातीं हैं, उनका भी ज्ञान न हमें हैं और न आज के अधिकांश पुरोहित व विद्वानों को ही पूर्णतः व विशेषतः है। इस कारण हम वैदिक संस्कारों से पूरा लाभ नहीं ले पा रहे हैं। हमें अपना जीवन सफल करने के लिए वेदों के मन्त्रों के अर्थों को जानना होगा और उसके अनुसार ही आचरण व व्यवहार करना होगा। वही आचरण व व्यवहार हमारा धर्म भी है व संस्कृति भी। विद्या व शिक्षा से युक्त कर्म व आचरण का नाम ही संस्कृति हैं जिससे किसी का किंचित भी अपकार न हो और स्वयं व अन्यों को अधिकाधिक लाभ हो। इसका हमें ध्यान रखना है।

हम संसार पर दृष्टि डालते हैं तो हमें संसार मत, मजहब, सम्प्रदाय, रीलिजियन आदि में विभक्त दिखाई देता है। तर्क व वेद के प्रमाणों के आधार पर संसार के सभी लोगों का धर्म व मत एक ही सिद्ध होता हैै अर्थात् संसार के सभी लोगों का धर्म एक ही है और वह है ‘‘सत्याचरण’’करना जो कि ‘‘वेदाचरण’’ का पर्यायवाची है।  अपने स्वार्थों व अज्ञान आदि के कारण मत व सम्प्रदायों के आचार्य अपनी मिथ्या मान्यताओं व सिद्धान्तों को छोड़ना नहीं चाहते जिससे सारे विश्व में अशान्ति फैली हुई है। आज कल मत-मतान्तरों की मिथ्या बातों व परम्पराओं को भी संस्कृति के नाम से ग्रहण किया जाता है जो कि उचित नहीं है। इससे भी समाज व मनुष्यता को हानि पहुंच रही है। आज संसार के सभी मतों व सम्प्रदायों के एकीकरण की आवश्यकता हैं जिसका आधार सत्य होना चाहिये। इसी कारण आधुनिक युग के वेदों के सर्वाेपरि विद्वान महर्षि दयानन्द ने सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने, अविद्या का नाश व विद्या की वृद्धि करने, अपनी ही उन्नति में सन्तुष्ट न रहकर सबकी उन्नति में तत्पर रहनेेे, सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार व यथायोग्य व्यवहार करने व संसार का उपकार करने को ही धर्म माना है। सत्य पर आधारित धर्मानुसार व्यवहार ही सत्य संस्कृति है अथवा वेदानुसार सत्य-आचरण का करना ही धर्म व संस्कृति है। संस्कृति का सम्बन्ध आत्मा से है। आत्मा में जैसा ज्ञान होगा व उसके संस्कार जिस प्रकार के होंगे वैसा ही मनुष्य का आचरण होगा। अतः संस्कारों, वेदाध्ययन एव ंविद्याध्ययन से आत्मा को शुद्ध व पवित्र कर उसे ज्ञानवान बनाना व श्रेष्ठ आचरण करना ही संस्कृति है। हम गीता के 3 पदों ‘‘योगः कर्मसु कौशलम्’’ के आधार पर भी यह कहना चाहते हैं कि किसी भी कार्य को सर्वोत्तम रूप से करना ही सस्कृति है। हमें यह भी अनुभव होता है कि ‘‘योगः कर्मसु कौशलम्’’ विश्व वरणीय श्रेष्ठ संस्कृति को परिभाषित करता प्रतीत हो रहा है।  सन्ध्या, उपासना, यज्ञ, हवन, पितृ यज्ञ, बलिवैश्वदेव यज्ञ, अतिथि यज्ञ, गृहस्थ के सभी कार्य, सभी सामाजिक व देश भक्ति के कार्य, सभी कार्यों में सत्य की प्रतिष्ठा का होना व हमारा प्रत्येक कार्य विद्वानों व ज्ञानियों के परामर्श से होता हैे, तो वह संस्कृति की परिसीमा में होता है।

हम समझते है कि संसार में वैदिक मान्यताओं व सिद्धान्तों के प्रचार की आज सबसे अधिक आवश्यकता है जिससे प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्तव्य का ज्ञान हो सके और उसे वह ज्ञान पूर्वक कुशलता से सम्पन्न करें। यही संस्कृति है।  विषय के अनुरूप यजुर्वेद के सातवें अध्याय का चौदहवें मन्त्र को विचारार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं। मन्त्र हैः- ‘‘अच्छिन्नस्य ते देव सोम सुवीर्य्यस्य रायस्पोषस्य ददितारः स्याम। सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा स प्रथमो वरूणो मित्रोऽअग्निः।।, अर्थः- हे योगविद्या सीखने की इच्छा रखने वाले प्रशंसनीय गुणों से युक्त शिष्य! हम अध्यापक लोग तेरे लिये, जिस पदार्थ से शुद्ध पराक्रम बढ़े, उसके समान व उस अखण्ड योग विद्या से उत्पन्न हुए धन की दृढ़-बुद्धि व शिक्षा के देने वाले हों। जो यह पहिली सब सुखों के स्वीकार कराने योग्य (संस्कृति) विद्या-सुुशिक्षा-जनित नीति है वह तेरे लिये इस जगत् में सुखदायक हो और हम लोगों में जो श्रेष्ठ अग्नि के समान सब विद्यायों से प्रकाशित है वह सब से प्रथम तेरा अर्थात शिष्य का मित्र हो। भावार्थः- इस मन्त्र में उपमा अलंकार है। योग विद्या में सम्पन्न शुद्धचित्त युक्त योगियों को योग्य है कि जिज्ञासुओं के लिए नित्य योग और विद्यादान देकर उन्हें शारीरिक और आत्मबल से युक्त किया करें।

मन्त्र में महर्षि दयानन्द ने संस्कृति शब्द का अर्थ विद्या सुशिक्षा जनित नीति किया है, यह मनन करने योग्य है। संस्कृति के पालन से सभी सुखों की प्राप्ति होती है तथा विद्या-सुुशिक्षा जनित सिद्धान्त को जीवन में धारण करने से जीवन सभी सुखों से पूर्ण होकर, धर्म अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति में, सफल होता है। ईश्वर करें कि  हम सब श्रेष्ठ वेदानुयायीजन विद्या व सुशिक्षा रूपी श्रेष्ठ ज्ञानाग्नि को अपना मित्र बनाकर सब सुखों को प्राप्त हों। पाठकों से निवेदन है कि वह अपनी प्रतिक्रियाओं से हमें अवगत करायें।

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