लेखक परिचय

आशुतोष

आशुतोष

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के पूर्णकालिक कार्यकर्ता रहे आशुतोषजी स्‍वतंत्र पत्रकार के नाते विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतर्जाल पर सम-सामयिक विषयों पर लिखते रहते हैं। आप हिंदुस्‍थान समाचार एजेंसी से भी जुडे रहे हैं। सांस्‍कृतिक राष्ट्रवाद को प्रखर बनाने हेतु आप इसके बौद्धिक आंदोलन आयाम को गति प्रदान करने में जुटे हुए हैं।

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आशुतोष

जीत का अपना खुमार होता है। भारतीय क्रिकेट टीम के विश्वचषक विजेता बनने के खुमार में पूरा देश झूम रहा है। 28 वर्षों बाद भारतीय टीम ने देश को यह सम्मान दिलाया है। देश ने भी भारतीय टीम को उसकी इस उपलब्धि के लिये सर-आंखों पर बिठाया है जो स्वाभाविक ही है।

फरवरी माह से ही क्रिकेट का रंग छाने लगा था जो फाइनल तक पहुंचते-पहुंचते दीवानगी में बदल गया। भारतीय टीम ने भी श्रेष्ठ प्रदर्शन से दर्शकों की उम्मीद को बनाये रखा। पाकिस्तान से हुआ सेमीफाइनल और श्रीलंका के साथ खेले फाइनल में भारत ने जबरदस्त प्रदर्शन किया। खेल के अंत तक रोमांच बरकरार रहा। हारने वाली दोनों टीमों ने भी इस रोमांच को बनाये रखने में पूरा साथ दिया।

1975 से प्रारंभ हुए विश्वचषक ने दुनियां भर में क्रिकेट के प्रति रुचि जगायी है। पहले तीन टूर्नामेंट तक 60 ओवरों में खेले जाने वाला एक दिवसीय बाद में 50 ओवरों तक सीमित कर दिया गया। इस समय तक भारत की अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में केवल औपचारिक उपस्थिति रहती थी। पहले विश्वचषक में अपने समय के महान बल्लेबाज सुनील गावस्कर ने पूरे साठ ओवर की पारी खेली और कुल 36 रन बनाये। लेकिन इन अंतर्राष्ट्रीय अनुभवों ने तत्कालीन भारतीय टीम को मांजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

लंदन में लॉर्ड्स के मैदान पर खेले गये तीसरे विश्वचषक के मुकाबले में पहले दोनों टूर्नामेंट की विजेता रही अपराजेय मानी जाने वाली वेस्ट इंडीज को जब कपिलदेव के नेतृत्व में भारतीय टीम ने पराजित किया तो यह किसी भी भारतीय के लिये आश्चर्यजनक तो दुनियां की क्रिकेट महाशक्तियों के लिये किसी सदमे से कम न था।

कपिलदेव और सुनील गावसकर के नेतृत्व में भारतीय टीम ने अनेक सफलतायें बटोरीं। भारतीय टीम और खिलाडियों ने इस बीच अनेक कीर्तिमान बनाये। पीढ़ियां बदलीं। लेकिन विश्वचषक उसके हाथ से दूर ही रहा।

1983 के बाद से ही हर आयोजन में देश ने अपनी टीम से उम्मीदें बनाये रखीं, हालांकि वे पूरी न हो सकीं। 2007 में पिछले विश्वचषक में तो बांग्लादेश और श्रीलंका से हारकर भारत पहले ही चक्र में बाहर हो गया। इस बीच भारतीय खिलाड़ियों पर मैच फिक्सिंग के भी आरोप लगे। 20-20 के फटाफट क्रिकेट का भी दौर आया। खिलाडियों की नीलामी का भी अभूतपूर्व दृश्य देखने को मिला।

2011 में विश्वचषक के आतिथ्य का अवसर भारत को मिला। कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी के नेतृत्व में बुलंद हौंसले के साथ भारतीय टीम ने मजबूत प्रदर्शन किया। पूरे टूर्नामेंट के दौरान भारतीय खिलाड़ियों ने टीम भावना का बेहतर प्रदर्शन किया जिसका परिणाम देश की जीत के रूप में सामने आया। विजय के लिये आवश्यक आत्मविश्वास से भरपूर नेतृत्व, उसके नेतृत्व में सभी खिलाड़ियों की आस्था, सही समय पर सही निर्णय, अच्छा समन्वय, लक्ष्य को पाने का संकल्प और अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को राष्ट्रीय आकांक्षा में विलीन कर देने की विनम्रता के संतुलित संयोग ने ही देश को उल्लास का यह अवसर प्रदान किया है।

इसके विपरीत अपनी-अपनी महत्वाकांक्षा को राष्ट्रीय हित से ऊपर रखते हुए देश को अलग-अलग दिशाओं में ले जाने की कोशिश करने वाला राजनैतिक नेतृत्व, अपने-अपने मंत्रालय में खेल करने में जुटे मंत्रीगण, इस खेल को बाहर से समर्थन दे रहे दलाल और मैच फिक्सर, उनके कारनामों पर लीपापोती करने और गठबंधन को मजबूरी मानने वाला उसका नेतृत्व, पूरे खेल पर आंखें मूंदे बैठी परमोच्च सत्ता और नफा-नुकसान के हिसाब से समर्थन-विरोध करने वाला विपक्ष देश को किस बेबसी की हालत में पहुंचा सकते हैं यह भी सबके सामने है।

संप्रग सरकार के दूसरे दौर में घोटालों की जो अटूट श्रंखला सामने आ रही है उसने देश के नागरिक को विचलित किया है। यहां की व्यवस्था में ही इस पतन के बीज छिपे हैं। अगर सारे घोटालों की राशि को जोड़ा जाय तो संभवतः वह देश के बजट से भी आगे निकल जाय। संसद में होने वाली नाटकीय बहस नागरिकों कोई समाधान दे पाने में असफल रही है। सत्तारूढ़ दल की भूमिका हास्यास्पद है तो प्रतिपक्ष की भूमिका संदेहास्पद।

यह स्थिति समाज में प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है और निराशा भरती है। समाज में सकारात्मक ऊर्जा लुप्त होने लगती है और अंधेरा काबिज हो जाता है। ऐसी स्थिति में हर दिन के अवसाद से बचने के लिये सामान्य लोग जीवन जीने के लिये जरूरी उल्लास जुटाने के प्रयास में उन विधाओं की ओर आकर्षित होते हैं जो उन्हें क्षणिक ही सही, पर जीवन जीने के लिये आवश्यक उल्लास प्रदान करता है। क्रिकेट के मैच में मिलने वाली विजय ऐसा ही क्षणिक उल्लास देती है। लगभग ऐसा ही उल्लास लोग उन धारावाहिकों में ढ़ूंढ़ते हैं जो मनोरंजन के नाम पर फूहड़ हास्य परोसते हैं।

किसी भी खेल को खेल भावना से ही लिया जाना चाहिये। इसका आशय है कि निरंतर अभ्यास से किसी खेल में उत्कृष्टता का प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी को यथोचित सम्मान मिले। अन्य खेलों में जहां दूसरा और तीसरा स्थान पाने वाला खिलाड़ी भी रजत अथवा कांस्य पदक का हकदार होता है वहीं क्रिकेट में दूसरा स्थान पाने वाला पराजित माना जाता है, भले ही वह केवल एक रन से पीछे रहा हो। इस रूप में क्रिकेट खेल है ही नहीं।

यह संयोग ही है कि क्रिकेट का जन्म भी वहीं हुआ जहां आधुनिक लोकतंत्र का जन्म हुआ। भारत में यह वहीं से आया जहां से भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली आयी। दोनों में ही यह अद्भुत साम्य है कि यहां एक कदम आगे रहने वाला विजेता माना जाता है और एक कदम पीछे रहने वाला पराजित। इसलिये एक छक्का लगा कर धोनी विजेता होते हैं और दस रन कम बना कर संगाकारा पराजित। यह वैसा ही है जैसे संसद में मत विभाजन पर एक वोट खरीद कर विजय पाने वाला दल सत्ता पर काबिज रहता है और देश को भ्रष्टाचार के गर्त में डुबो देने का अधिकार पा लेता है।

जहां तक देश की जनता का सवाल है, वह इन भ्रष्टाचारियों को सबक सिखाना चाहती है, पराजित होते देखना चाहती है। इसमें असफल रहने पर वह मनोवैज्ञानिक रूप से एक सैडिस्ट जैसा आचरण करती है और किसी को भी पराजित होते देखने में सुख का अनुभव करती है। अन्य खेलों में किसी को पराजित होते देखने का सुख नहीं है इसलिये उसे क्रिकेट ही सुहाता है। इसलिये ही उसे यह जानते हुए भी कि यह काल्पनिक है, हिन्दी फिल्मों में कानून को अपने हाथ में लेकर बड़े-बड़े गुण्डों को ठिकाने लगाता अभिनेता अच्छा लगता है। मन ही मन वह उन्हें अपना नायक मान लेता है।

क्रिकेट में जीत पर हर्ष का यह उबाल दिन-प्रति-दिन की व्यवस्थाजन्य असहायता पर जनसामान्य की टिप्पणी है। लेकिन शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर घुसाकर सामने उपस्थित आपदा से मुंह मोड़ना लम्बे समय पर तक नहीं चल सकता। देश में भ्रष्टाचार के पहाड़ और असमानता की खाइयों का अस्तित्व जब तक है तब तक सुखी नागरिक जीवन की कल्पना करना संभव नहीं है। और बिना सुखी नागरिक जीवन सुनिश्चित किये कोई भी सत्ता प्रतिष्ठान गठबंधन की मजबूरियों का राग अलाप कर जनता को भ्रमित नहीं कर सकता।

क्रिकेट में विजय का उन्माद तो जल्द ही ढ़ल जायेगा। इसके बाद फिर व्यवस्था की वास्तविकता से सामना शुरू होगा और एक-न–एक दिन व्यवस्था परिवर्तन की मांग जोर पकड़ेगी। अन्ना हजारे से लेकर बाबा रामदेव तक जिस अलख को जगाने में लगे हैं वह आम नागरिक तक पहुंचेगी और जल्दी ही नये भविष्य की इबारत लिखी जायेगी। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद प्रारंभ से ही व्यवस्था परिवर्तन की पक्षधर रही है। देश में परिवर्तन का जो आलोड़न-विलोड़न चल रहा है वह जब आकार लेगा तो अभाविप स्वाभाविक ही उसकी ध्वजवाहक बनेगी।

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