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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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शाक्त ध्यानी

दिग्गी राजा ने संघ पर आरोप लगाया है कि वह सरस्वती विद्या मन्दिरों की शिक्षा में बच्चों को हिंसा का पाठ पढ़ा जाता है। संघ की शिक्षायें कोई इंटरनेट पर चलने वाले गुप्त फतवे नहीं हैं कि जिसके निर्देश पर भविष्य की रणनीति बन रही हो, जिन लोगों को सरस्वती विद्या मंदिरों की किताबें देखने का अवसर मिला हो वे जानते हैं कि उनमें देशभक्ति के अतिरिक्त कोई दूसरा पाठ है तो वह नैतिकता और चरित्र निर्माण को दृष्टि में रखकर लिख गया है। रानी लक्ष्मीबाई, महराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, गुरू गोविन्द सिंह, वीर बंदा वैरागी आदि…आदि। असल में बात यह है कि जिन महापुरूषों के देशप्रेम को रेखांकित एवं शिक्षाओं में शामिल किया गया है, उनकी भिड़ंत मुगलों-अंग्रेजों से हुई, कांग्रेस और मुगल शैली में ढ़ले कुछ बिके हुये इतिहासविद् जिन्होंनें कि स्वतंत्रता के बाद बच्चों का पाठ्यक्रम बनाने का धतकर्म किया, उसी के उत्तर में सरस्वती विद्या मंदिर के पाठ लिखे गये है। सिकंदर को पानी पिलाने वाले राजा पुरू को पराजित दिखाना, जिन मुगलों ने भारतीय जनता पर अमानवीय अत्याचार किये, हमारे गुरूओं को अपमानित किया, उन्हीं के गुणगान हमारे बच्चों को अब तक पढ़ाये जाते रहे हैं। हमारे बालमन में बचपन से एक पराजित जाति का अपमान पिलाकर वे षडयंत्रकारी, वे बिके हुये बाल मनोवैज्ञानिक एक लंगड़ी क्लीव प्रजाति तैयार करने में जुटे थे। संघ के विद्वानों ने उसका विरोघ किया और उन योध्दाओं और शूरमाओं का गुणगान कर सोये समाज को झिंझोड़ा, तो दिग्गी की घिग्घी बंध गई। किसी आदमी को यदि बचपन से प्रतिदिन अपमानित इतिहास रटाया जायेगा तो वह कभी भी आत्माभिमानी नागरिक नहीं बन सकता। राष्ट्रबोध उसमें जाग्रत नहीं होगा। शायद यही कारण है कि अपना पैसा विदेशों में जमा करने वाले सर्वाधिक शासक, व्यापारी, अफसर हमारे देश में हैं। आज भ्रष्टाचार में लिप्त नेता, बलात्कारी, हत्यारों के आगे यदि जनता विवश सी खड़ी है, तो यह उसी पराजय बोध के कारण है। आने वाली पीढ़ियों को समझाया जा रहा है कि यह देश तो सदा से पालथी मारकर बैठे निस्तेज संस्कृति का देश रहा है। तथ्य छुपाकर पढ़ाये जा रहे इतिहास उन लोगों को बहुत रास आते हैं जिन्हें भारत को अराजक, पराजित, और असभ्य कहने में बड़ा आनंद मिलता है। इसी कारण अपराधी यदि कैमरों के आगे विजेता की तरह दांत निपोरते हैं तो इसलिये कि उन्हें लगता है कि हम तो ऐसे ही थे। हमारा इतिहास पराजितों, अपमानितों का इतिहास है…उसे अपना अपमान अपने देश, अपनी जाति का अपमान नहीं लगता। यह हमारे शिक्षाविदों और मनस्वियों की पुस्तकों का ही कमाल है। इससे उलट संघ बच्चों को उसके अभिमान भरे अतीत का स्मरण करवाता है, गुरूओं की खड़ग का खनक सुनाता है, तो दिग्गी राजा को लगता है कि ये हिंसा है… कल कांग्रेस हमारे सेना अधिकारियों पर भी आरोप लगा सकती है कि वे आतंकवादियों को मार रहे हैं, यह हिंसा है… और क्योंकि वे हमारे वोट बैंक की प्रजाति के हैं, तो यह सांप्रदायिकता भी है। वे काली के हाथ में खून से सनी तलवार और खप्पर को कोसेंगे, राहुल बाबा कहीं भूल से किसी मंदिर में चले गये, तो कल वे दुर्गा पर भी आरोप लगा सकते हैं कि इस स्त्री ने अपने अठारह हाथों में बज्र कुल्हाड़े रखे हुये हैं, और क्योंकि संघ की शिक्षाओं में देवी-देवता भी हैं, धर्नुधर राम चक्रपाणि हैं, सभी हिंसक…बोले तो…यह मुसलमानों को डरा रही है। यह समाज की समरसता भंग कर रही है, सांप्रदायिकता और भाईचारा खत्म कर रही है…और क्या कहते हैं…हिंसा और घृणा फैला रही है। और संघ क्योंकि इन देवियों की स्तुति अपने बाल-स्कूलों में करवाता है, इसलिये संघ भी सिमी जैसा है। भाई लोग कुछ भी बोल सकते हैं कांग्रेस संघ को हिंसा से किसी भी तरह जोड़ना चाहती है ताकि आतंकियों की हिंसा को नैतिक आधार मिले, जायज ठहराया जा सके, तभी तो मलिका-ए-सदर ने हिंसा का वर्गीकरण करके आतंकवादियों को राहत का पैकेज दिया है…भारत ने कभी भी अहिंसा की बात नहीं की। अहिंसा राज्यधर्म कभी नहीं हो सकता। भारत के इतिहास में सम्राट अशोक के अतिरिक्त किसी भी राजा नें अहिंसा को राज्य का स्वर नहीं बनाया। अशोक के बाद गांधी जैसे राजनीति से जुड़े व्यक्ति ने अहिंसा का नारा चलाया जो उन्हीं के सामने बुरी तरह फ्लॉप हो गया। अशोक की अहिंसा से ही यह राष्ट्र मुगलों की दाड़ में गया, इसी कारण बुध्द से बुध्दु शब्द प्रचलन में आया क्योंकि भारतीय जनता जानती थी कि अहिंसा व्यक्ति का गुण हो सकता है, राज्य का नहीं। कांग्रेस जिस अहिंसा की बात करती है वह गांधी जी का बजाया रिकार्ड है। कांग्रेस उसे कई तरह के संगीतकारों से अलग-अलग ढंग से गवाकर विधायिका से गुजरा करवाती है।

हमारे नायक श्री कृष्ण हैं। वे महायुध्द के ठीक बीच खड़े हुये कायर अहिंसक अर्जुन की अठारह अध्याय तक मरम्मत करते हैं कि तू लड, हिंसा कर, हां इतना अवश्य है कि हिंसा क्यों, कहां, और कैसे की जाये और उसकी पात्रता क्या है? यह समझना आवश्यक है। गांधी गीता को लेकर जीवन भर भ्रमित रहे। उनका यह भ्रम स्वंतत्रता आंदोलनों में अनेक बार प्रतिबिंबित होता रहा। जब गढ़वाली ने अहिंसक सैनिक बनकर ”सीज-फायर” कहा तो गांधी ने उसकी आलोचना की, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस की भर्त्सना की और द्वितीय महायुध्द की भीषण हिंसा में भाग लेने के लिये हमारे भारतीय सैनिकों को अंग्रेजों के साथ भेज दिया। ये कैसी अहिंसा थी? महावीर ही इस देश में पूर्ण अहिंसक थे। वे रात को करवट भी नहीं बदलते थे कि कहीं कोई जीव-जन्तु न मर जाये…परन्तु महावीर की अहिंसा राज्य-समाज तो दूर, उनके प्रिय शिष्यों के जीवन में भी नहीं उतर सकी। दिग्गी राजा किस अहिंसा की बात कर रहे हैं….? गांधी जी का अनशन महावीर की दृष्टि में भयानक हिंसा है। इस हिंसक हथियार को असमर्थ बुजुर्ग लोग घर-घर में उपयोग करते हैं। दिशा बदल कर की गई हिंसा ही गांधी की अंहिसा थी। पुतले फूंकना क्या हिंसा-घृणा नहीं है? बचपन से हम पढ़ते थे कि औरंगजेब कितना परिश्रमी मेहनती था, बाबर अपने पुत्र को कितना प्यार करता था, हमें इन विद्यालयों में सेक्युलर बनाया गया, अपमान पीने का अभ्यस्त बनाया गया, ‘खड़ग बिना ढाल’ गवाकर करोड़ों शहीदों को विस्मृत करना सिखाया गया। सरस्वती विद्या मंदिर ने गुरूजनों पर हुये अत्याचार हमें सुनाये, प्रताप की फौलाद का स्पर्श करवाया, शिवा के खड्ग की खनक सुनाई, तो हिंसा हो गई? वाह! दिग्गी राजा!, पशुता के दर्शन पर आधारित कसाब, अफजल और माओवादियों की हिंसा दिग्गी राजा को नहीं दिखाई देती? हिंसा के पक्ष में हमारा समाज तभी खड़ा हुआ है जब किसी दुर्योधन, किसी रावण, किसी औरंगजेब ने दुर्बल पर हाथ उठाया। इसी कारण गांधी जी ने गीता को भारत का शुभंकर बनाया था क्योंकि गीता और भारतीयों की हिंसा द्वेष, जाति, व्यक्ति से ऊपर उठकर सत्य के पक्ष में खड़ी खड्ग है। इसी कारण कृष्ण ने हिंसा-अहिंसा का पाठ भीम को नहीं, अर्जुन को पढ़ाया…क्योंकि जब तक व्यक्ति गुणातीत होकर स्वार्थ रहित न हो, तब तक वह हिंसा करने का पात्र नहीं है। अतिवादियों की हिंसा मात्र हत्या है। हत्यारों को राज्य से अहिंसा की उम्मीद नहीं करनी चाहिये। अहिंसा को राज्य से जोड़कर गांधी ने सम्राट अशोक जैसी भूल की। संघ की शिक्षायें इसी भ्रम की क्षतिपूर्तियां हैं। यदि दुश्मनों को मारने वाले हमारे सैनिक पदक पा सकते हैं तो राष्ट्र प्रेम की शिक्षा देने वाले संस्थानों को कांग्रेस हिंसक क्यों कह रही है?

* ‘हलन्त’ मासिक पत्रिका के संपादक हैं।

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2 Comments on "हिंसा न भवति"

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शैलेन्‍द्र कुमार
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धन्यवाद

rajeev dubey
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RSS, School Texts and the Murder of Mahatma Gandhi, Sage Pub. २००८ – पढ़िए और जानिये कि इतिहासकार क्या लिख रहे हैं…

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