लेखक परिचय

अनिल अनूप

अनिल अनूप

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार व ब्लॉगर हैं।

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अनिल अनूप
मकर संक्रांति हिन्दुओं का प्रमुख त्यौहार है। चाहे वह महाभारत के समय की बात हो या फिर रामायण काल की बात हो या फिर अन्य पौराणिक ग्रन्थ हो, कहीं न कहीं मकर संक्राति का किसी न किसी रूप में वर्णन मिलता है। गोस्वामी तुलसी दास जी श्री रामचरित्र मानस में लिखते है- माघ मकर गति जब रवि होई। तीरथपतिहिं आव तहाँ सोई।। अर्थात् जब माघ के महीने में सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो सभी तीर्थो के स्वामी गंगा व प्रयाग में जन कल्याण हेतु रहते है। अर्थात् संक्रांति काल में स्नान दान का बड़ा महत्व हो जाता है। इसी प्रकार महाभारत काल में भीष्म पितामह जी ने भगवान भास्कर के उत्तरायण होने तक अपने शरीर को शर शैया पर रखते हुए भी देह त्याग नहीं किया। भगवान भास्कर के मकर राशि मे प्रवेश करते ही उनकी गति उत्तरायण हो जाती है। जिससे समूचे वातावरण में अद्वितीय सकारात्मक ऊर्जा रहती है। साथ ही बैकुण्ठ के द्वार खुल जाते हैं। अतः उत्तरायण सूर्य होने पर पितामह जी ने स्वर्ग को प्राप्त किया। क्योंकि उत्तरायण को देव काल भी कहा जाता है। अतः इस पुण्यकाल में शान्ति, पुष्टि सहित यज्ञादि कर्म सहित विवाह संस्कारों के शुभ अवसर रहते हैं।
मकर संक्रांति का इतिहास बड़ा ही पुराना है। इस त्यौहार को सनातन व पुरातन त्यौहार भी कहा जाता है। क्योकि जितना पुराना इतिहास ज्योतिष का है, धरती में मानव के विकास का है। हमारे पौराणिक ग्रंथों महाभारत, रामायण का है। उतना ही पुराना इतिहास मकर संक्रांति के त्यौहार का है। पौराणिक कथानक के अनुसार सूर्य के पुत्र शनि हैं, और इस समय अपने पुत्र के पास होते है। साथ ही सूर्य के उत्तरायण होने अर्थात् सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध में भारत के नज़दीक होते है, जिससे सूर्य की ऊर्जा से फसलों में दानों का संचार होता है। अर्थात् चाहे मकर संक्रांति के त्यौहार का धार्मिक, वैज्ञानिक व ऐतिहासिक महत्व हो स्नान दान की बात हो बहुत महत्वपूर्ण व पुण्यदायक है।
इस वर्ष प्रतिवर्ष की भांति मकर संक्रांति माघ मास कृष्ण पक्ष 14 जनवरी 2017 को शनिवार के दिन तिथि द्वितीया को मनाई जाएगी। इस संक्रांति काल में स्नानादि से निवृत होकर पवित्र जगह पर विधि विधान से सूर्यनारायण की पूजा अर्चना करनी चाहिए। यथा शक्ति मंत्रों का जाप, स्नान, दान, ध्यान, बहुत ही कल्याण देने वाला रहता है। संक्रान्ति काल मे शादी, मैथुन, तेल मर्दन, छौर कर्म, नए कार्यों की शुरूआत नहीं करना चाहिए। आज संक्रांति के समय में तीर्थ या फिर धर्म स्थानों मे गुड़, घी, चिनी, आदि का दान करना धर्म व पुण्य लाभ देने वाला तथा लोक परलोक को सुधारने वाला रहता है। अगर संक्रांति के शुभाशुभ फल का विचार करे, तो यह अपने ग्रह नक्षत्रों के अनुसार शुभाशुभ फल को देने वाली रहती है। इस वर्ष की संक्रांति दुष्ट लोगों के लिए अच्छी रहेगी। किन्तु ईश्वर में आस्था रखने वालों के लिए दान स्नान से शुभ रहेगी। मकर संक्रान्ति धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तो है ही, यह मनोरंजन की दृष्टि से भी अति महत्त्वपूर्ण है। इस दिन 14 जनवरी को पतंग उड़ाने की प्रथा प्रचलित है जो भारत सहित कई देशों में व्याप्त है। अर्थात् मकर संक्राति अति महत्वपूर्ण हिन्दुओं का त्यौहार है। जिससे प्रत्येक व्यक्ति धर्म लाभ प्राप्त करके जीवन को धन्य बना सकते हैं।
मकर संक्रांति का जितना धार्मिक महत्व हैं, उतना ही वैज्ञानिक महत्व भी है। इस काल में गगांदि नदियों में पवित्र नदियों का जल प्रवाहित होते हुए नाना औषधियों से युक्त रहता है। जिससे चर्मादि रोगों से छुटकारा रहता है। ज्योतिषीय दृष्टि से भी मकर संक्रांति का बड़ा महत्व है। इस दौरान सूर्य मकर राशि में संक्रमण करते है। जिससे इसे मकर संक्रांति कहते है। सूर्य का शनि राशि में प्रवेश बड़ा भी प्रभावशाली है। क्योंकि ज्योतिषीय गणनाओं में भगवान सूर्य की उत्तरायण गति इसी राशि से मानी जाती है। यद्यपि आकाशीय ग्रह गोचर में ग्रहों का विभिन्न राशियों में प्रवेश होता रहता है। यद्यपि सूर्य का राशि प्रवेश अत्यंत महत्वपूर्ण है। अतः भगवान सूर्य विभिन्न राशियों में यथा समय संक्रमण करते रहते हैं। अर्थात् ग्रहों के एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश स़ंक्रांति का समय कहलाता है। जिसका अर्थ संक्रमण से है। जिसे संक्राति की संज्ञा दी जाती है। अर्थात् इस दौरान वातावरण सकारात्मक रहता है। कृषि प्रधान भारत देश में धरा फसलों से परिणूर्ण रहती है। जिससे किसान सहित देश के लोग प्रसन्न रहते हैं। शीत ऋतु होने से विभिन्न प्रकार के खाद्य मेवे का सेवन रेवड़ी, गजक, मूंमफली, लाई, चने, ज्वार, बाजरा, मक्का, तिल सहित विविध प्रकार के धान्यों का सेवन सेहत के लिहाज से बढ़िया रहते हैं। उदाहारण के लिए इस त्यौहार के आगमन से जन मानस कपकंपाती शीत से बचने हेतु गर्म धान्यों का परस्पर उपहार व दान देते हैं। गंगादि तीर्थों में स्नान जहां तन को स्वच्छ रखते हैं, वहीं गर्म धान्यों के प्रयोग तन को तंदुरूस्त रखते हैं।
मकर संक्रांति के अवसर पर गंगादि तीर्थों में स्नान का बड़ा ही महत्व होता है। इस दौरान सूर्य के उत्तरायण होने तथा माघ मास होने से पौराणिक ग्रथों के अनुसार तीर्थों में स्नान से जन्म-जमान्तर के पाप समाप्त होते हैं, रोगों, दु‘खों, पीड़ाओं से छुटकारा होता है, जीवन को सुखद व संतुलित पथ प्रदान होता है। गंगादि तीर्थों की पवित्रता से व्यक्ति तन को सुन्दर व मन को पवित्र बनाते हैं। गंगादि तीर्थों के सेवन इस मकर संक्रांति के अवसर पर सभी स्त्री पुरूषों को मनोवांछित फल देने वाले कहे हैं। इस मकर संक्रांति को भारत ही नहीं, बल्कि विदेश सहित पास के देश नेपाल में भी मनाया जाता है। यह उत्तर-प्रदेश में खिचड़ी, पंजाब, हरियाणा में लोहड़ी इसी प्रकार अन्य प्रांतों में लोगों द्वारा इसे विविध रूप नामों से बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस त्यौहार के अवसर पर उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा आदि विभिन्न प्रदेशों सहित सम्पूर्ण भारत के लोग बड़ी श्रद्धा के साथ गंगादि तीर्थों में स्नान व विविध प्रकार की खाद्य पदार्थों गर्म कपड़ों का दान दे अपने जीवन को धन्य बनाते हुए पुण्य के भागी बनते हैं। इस महान पर्व के अवसर पर इलाहाबाद में माघ मेले का आयोजन होता है। इस पुण्य पर्व पर देश के विभिन्न स्थानों में मेले, कुश्ती के आखाड़ों का आयोजन होता है। जिसमे बंगाल का गंगा सागर का मेला सुप्रसिद्ध है। इस संक्रांति में गंगासागर में स्नान की अद्भुत महिमा है।

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