लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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शादाब जफर ‘‘शादाब’’

आजाद भारत के हर नागरिक के लिये 15 अगस्त का दिन खुशी का दिन होने के साथ साथ आत्मंथन करने का भी है। देश के ज्यादातर मुसलमान आज ये सोचते है कि आजादी के लिये हमारे बुर्जुगो ने जो कुरबानिया दी आखिर उन सब का सिला हमे क्या मिला। गुलामी कि जंजीरे काटने के बाद फॉसी के फंदों को चूमने के बाद भी हम देश में सिर्फ तमाशाई बन कर क्यो रह गये। मुसलमानो के वो सारे सपने जिन्हे उन्होने अपनी ऑखो में सजाकर आजादी कि लडाई लडी सीने पर गोलिया खाई। देश को आजादी दिलाने के लियें अपनी जिन्दगी, अपना कुन्बा, अपना घर बार सब कुछ कुर्बान कर दिया। पर इस का सिला उस को क्यो नही मिला। आज आजादी के 65 बरस गुजरने व भारत कि मिट्टी में रचने बसने के बाद भी उसे पाकिस्तान परस्त क्यो समझा जाता है। दरअसल जब जब हमे हमारे देश में हिन्दू मुस्लिम एकता खंडित होती दिखाई देती है तब तब हमारे दिलो में ये सारे सवाल उठने लगते है। मेरा मानना है कि आज यौम ए आजादी के दिन हर एक हिन्दू और मुसलमान को यह जरूर सोचना चाहिये कि आखिर हमने आजादी को पाने के लिये और आजादी पाने के 65 साल बाद में क्या खोया और क्या पाया। दूसरा सब से बडा सवाल हमे खुद से समय समय पर ये भी पूछते रहना चाहिये कि हमने देश को क्या दिया। ये नफरत कि दीवार हमारे बीच में क्यो और किसने बनाई इस नफरत से देश और इन्सानियत को कितना नुकसान हुआ।

आज देश जिस राह पर चल रहा है या यू कहॅू कि हमारे राजनेता देश को जिस राह पर ले जा रहे है वहा न तो वतनपरस्ती नजर आ रही है और न वतन को आगे बढाने का जज्बा। लूट, भ्रष्टाचार, हिंसा, मक्कारी, चोरी, डकैती, खून खराबा, छल, कपट, घात प्रतिघात, धूर्तता, ठगी, छीना झपटी आज हमारे राजनेताओ का पेशा बन गया है। भारत कि तारीख गवाह है कि मुगल शासनकाल के आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफर को अग्रेजो ने बहुत समझाया लालच दिया के हम से हाथ मिला लो माल ओ दौलत के साथ साथ तुम्हे रियासत भी अता कर दी जायेगी पर ये वतनपरस्त भारत मॉ का बेटा अग्रेजो के लालच में जरा भी नही आया। इस देश भक्त ने भारत की आजादी के सामने नर्म गद्दो और अग्रेजो कि गुलामी पसन्द नही कि। भारत कि जंगे आजादी के इस महान शहीद सिपाही को अग्रेजो ने कैद कर के रंगून की जेल में डाल दियां। एक अंग्रेज शासक हडसन ने बहादुर शाह जफर के कदम डगमगाने के लिये इन के चारो बेटो के सर कलम करा कर उन्हे एक थाल में रखवाकर रंगून की जेल में बतौर तौहफा जब भारत माता के इस सच्चे सपूत को भिजवाये तो बहादुर शाह जफर ने अपने चारो बेटो के कटे हुए सरो को देखकर कहा ‘मादरे वतन के खिदमतगारो के बेटे इसी तरह जीत कर बाप के सामने आते है’।

10 मई 1957 को बहादुर षाह जफर ने एक अपील हिदुस्तानीयो से कि थी जो कुछ इस प्रकार थी ‘‘ हिन्दुस्तान के हिंदुओ और मुसलमानो! उठो!! भाईयो उठो!! खुदा ने जितनी बरकते इन्सान को अता कि है उन में सब से कीमती बरकत आजादी है। क्या वह जालिम शासक जिसने धोखा देकर यह बरकत हम से छीन ली है, हमेषा के लिये हमे उस से महरूम रख सकेगा? हिंदुओ को गंगा, तुलसी और षलिग्राम की षपथ है और आप सब मुसलमानो को कुरान की!’’। बहादुर शाह जफर ने यह अपील हिंदू और मुसलमानो को देश कि जंगे आजादी की लडाई एकजुट होकर लडने और संघर्ष करने के लिये की थी। आज हम करोडो मुसलमानो में से शायद कोई एक या दो ही बहादुर शाह जफर जैसा देश भक्त मुसलमान हो या शायद ना भी हो इस हकीकत को भी देश के मुसलमानो को मानना चाहिये। दरअसल जब हम गुलाम थे तब हम सब एक थे, हिन्दुस्तानी थे, भाई भाई थे, पर आज देष आजाद होने के बाद इन सारे बंधनो से हम आजाद हो गये फिरको में बट गये। मन्दिर मस्जिदो पर लडने लगे जरा जरा सी बात पर एक दूसरे के खून के प्यासे बन गये क्यो ?इस का जवाब आज किसी के पास नही है। हमारे दिलो से देश भक्ति गायब हो गई हम लोग देश को लूटने खसोटने लगे दीमक कि तरह चाटने में लग गये। हिन्दू हो या मुस्लिम, सत्ताधारी राजनेता, सरकारी अफसर, बिल्डर सब के सब देश को लूटने लगे। इन में न तो मन्दिर मस्जिद का झगडा है न हिन्दू मुसलमान का बडी ईमानदारी से ये सारे लोग अपना अपना हिस्सा बाट लेते है एक छत के नीचे बैठ कर खाते पीते है। आजादी से आज तक परेशान है तो देश का आम आदमी। अपने बच्चो के लिये रोटी की तलाश में निकलने पर इस के सीने में साम्प्रदायिक दंगो के नाम पर गोली उतार दी जाती है। आखिर हमारे सत्ताधारी राजनेता कुर्सियो पर लाशो कि तरह कब तक बैठे रहेगे। और कब तक देश का कानून ऑखो पर पट्टी बांधे हुए इन देश के देशद्रोही राजनेताओ का साथ देता रहेगा।

आज क्यो हम देश की राजनीति में अहम किरदार निभाने वाले देश के आम नागरिक, वोटर खामोश है। हम जहॅा है वही से देश भक्ति की अलख रूपी मशाल क्यो नही जला सकते। देश से भ्रष्टाचार क्यो नही मिटा सकते क्या हम अपने गॉव कस्बे मौहल्लो शहर इत्यादी की जनता कि सेवा बिना कोई पद लिये नही कर सकते। क्या देष सेवा करने के लिये खादी के कपडे पहनना जरूरी है चुनावी झगडे में पडना जरूरी है। आज तथाकथित बडे बडे राजनेताओ के पुत्र और पुत्रिया, सगे संबंधी भाई भतीजे वगैरा इन के राजनैतिक उत्तराधिकारी बनकर कथित लोकतांत्रिक तरीके से कुर्सिया और सरकार में अहम पदो को हथिया लेते है। किसी पार्टी के नेता के बेटे को राष्ट्रीय स्तर का नेता बनने में मुश्किल से चार पॉच दिन लगते है बडे बडे संगठन उन के कार्यकर्ता चन्द दिनो में ही इन के चमचे प्रतीत होने लगते है। मीडिया केवल पार्टी से मिलने वाले विज्ञापनो के लालच में इन राजनीतिक पुत्रो की षान में कसीदे लिखने लगता है।

क्या ये सब देश के हित में है। देश के गौरवपूर्ण अतीत की गरीमा के अनुरूप है। आज देश में नक्सली हिंसा, धर्म की राजनीति, अज्ञानता, निक्षरता, आपसी फूट, एकता भाई चारे की कमी मन्दिर मस्जिद व जात पात के झगडे देश की तबाही व पतन की सब से बडी चुनौती बनते चले जा रहे है देश में भ्रष्टाचार चारो ओर फैला है मंहगाई ने न जाने कितनी जाने ले ली है पर सत्ता में बैठे हुए हमारे राजनेताओ को इस कि जरा भी चिंता नही। करोडो अरबो रूपये खर्च कर के देश में कॉमनवैल्थ गेम्स कराने की फिक्र है लाखो टन देश का अनाज खुले में पडा है, पडा सड रहा है सड चुका इस के ऊपर टीन शेड पडना है या इसे ढापने के लिये कोई और इन्तेजाम करना है इस कि हमारे देश के कृषि मं़त्री और प्रधानमंत्री जी को जरा भी परवाह नही देष में स्वास्थ्य सेवाए ना कि बराबर है देश के कई ऐसे पिछडे इलाके है जहॅा बच्चो के पढने के लिये दस दस किलो मीटर तक स्कूल नही बिजली पानी की समुचित व्यवस्था नही सडके नही पर हमारे राजनेता इस बात से जरा भी चिंतित नही है। आज देश की संसद और विधान सभाये लुटेरो का अड्डा बन चुकी है फिर भी हमारे राजनेताओ को शर्म नही आ रही। पिछले एक साल से खाघान्न की कीमतो में रिकार्ड उछाल है, देश का हर गरीब व मध्यवर्गीय आम आदमी परिवार की गाडी खिचता खिचता थकता चला जा रहा है इस बात की शरद पवार जी को बिल्कुल भी परवाह नही अपनी जिम्मेदारी का जरा भी एहसास नही आखिर ये कैसी समाज सेवा है। हमारे मुल्क के ये कैसे राजनेता है?।

आज यदि अतीत से सबक लेकर हमने भविष्य को नही सुधारा तो कल हिंसा, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, साम्प्रदायिक ताकतो के शायद हम फिर से गुलाम बन जायेे। बेईमानी, ढोंग, स्वार्थ, हिंसा, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, और साम्प्रदायिकता की धूल से देश की आजादी का ये तिरंगा इतना मैला हो जाये कि इस के तीन खूबसूरत रंग जो आज हमे एकता भाई चारे का संदेश दे रहे, इस का अशोक चक्र जिस प्रकार हमारा मार्गदर्शन कर रहा कल हमे हमारे निजी स्वार्थो के कारण शायद दिखाई न दे।

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