लेखक परिचय

लालकृष्‍ण आडवाणी

लालकृष्‍ण आडवाणी

भारतीय जनसंघ एवं भाजपा के पूर्व राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष। भारत के उपप्रधानमंत्री एवं केन्‍द्रीय गृहमंत्री रहे। राजनैतिक शुचिता के प्रबल पक्षधर। प्रखर बौद्धिक क्षमता के धनी एवं बृहद जनाधार वाले करिश्‍माई व्‍यक्तित्‍व। वर्तमान में भाजपा संसदीय दल के अध्‍यक्ष एवं लोकसभा सांसद।

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लालकृष्ण आडवाणी

 

निस्संदेह, इस महीने दुनिया को हिलाकर रख देने वाली घटना एबटाबाद के ठिकाने से ओसामा बिन लादेन की बेदखली वाली रही, जहां वह पिछले कुछ समय से रह रहा था। करण थापर आक्रमक अंदाज में टीवी इंटरव्यू करने वाले एंकर के रुप में जाने जाते हैं। सीएनएन-आईबीएन पर उनका साप्ताहिक कार्यक्रम ‘डेविल्स एडवोकेट‘ प्रसारित होता है। उनका पिछला इंटरव्यू जनरल मुशर्रफ के साथ था जिसमें उन्होंने जनरल से यह उगलवा लिया कि यदि वे वर्तमान में पाकिस्तान के शासक होते तो जो कुछ हुआ है उसके लिए वे माफी मांग लेते। लेकिन अपने स्वभाव के मुताबिक थापर बार-बार कुरदने पर भी मुशर्रफ से इससे तनिक ज्यादा यह स्वीकार नहीं करा पाए कि यह घटना पाकिस्तान के लिए गुप्तचर असफलता के चलते शर्मिन्दगी वाली है।

यद्यपि शेष दुनिया के लिए कुछ तथ्य साफ दृष्टव्य हैं:

तथ्य-1

ओसमा बिन लादेन इस स्थान पर पाक सेना प्रमुख कयानी और आइ.एस.आई. प्रमुख शुजा पाशा की जानकारी और स्वीकृति के बिना नहीं छुप सकता था। और यदि बिन लादेन सन 2005 से इस भवन में रह रहा था तो इसका निर्णय निश्चित रुप से जनरल मुशर्रफ द्वारा लिया गया होगा।

तथ्य-2

यह धारणा भी है कि जिन लोगों ने बिन लादेन को एबटाबाद कैंटोंमेंट शहर में रखने का निर्णय किया उन्होंने वांछित आतंकवादी की स्वास्थ्य सम्बंधी आवश्यकताओं का भी ध्यान रखा होगा। सैन्य अस्पताल का डाक्टर किसी अन्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ की तुलना में एक ऐसे मरीज के लिए ज्यादा गारंटी वाला सिध्द हो सकता है जो मरीज के ईलाज के साथ-साथ उसकी पहचान को भी गुप्त रखे।

तथ्य-3

अमेरिका ने सार्वजनिक रुप से कहा है कि उन्होंने 40 मिनट के इस ऑपरेशन के बारे में पाकिस्तान को तब ही सूचित किया जब वे बिन लादेन के शव और उसके ठिकाने से जो ले जाना जरुरी था, ले गए थे। सीआईए के मुखिया लियोन पनेट्टा ने ‘टाइम‘ पत्रिका को बताया है कि पाकिस्तान को गुप्तचर जानकारी इसलिए नहीं बताई गई कि हमें डर था कि पाकिस्तानी इसके बारे में ओसामा बिन लादेन को बता देंगे।

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति से थापर के लम्बे इंटरव्यू के कुछ अंश इस प्रकार हैं:

करण थापर: मैं इस तरह से पूछना चाहता हूं। आज, जैसाकि आप भी जानते हैं कि पाकिस्तान में नाराजगी और गुस्सा है कि इसकी हवाई सीमा का उल्लंघन किया गया, इसकी संप्रभुता लगभग दो घंटे के लिए अतिक्रमण होती रही, अमेरिकी सैनिक एक घर के आंगन में उतरे और ओसमा बिन लादेन को मारा तथा बगैर किसी की जानकारी में आए बगैर किसी रुकावट के चले गए। अनेक पाकिस्तानियों के लिए इससे पाकिस्तान की रक्षा तैयारियों और इसकी अपनी सीमाओं की रक्षा करने की क्षमता को लेकर चिंतनीय और गंभीर सवाल उठते हैं। एक पूर्व सेनाध्यक्ष होने के नाते आज आप इन चिंताओं के बारे में क्या कहेंगे?

परवेज मुशर्रफ: मुझे यह स्वीकार करने में कतई संकोच नहीं है कि सभी गुप्तचर राडार का हमारा ध्यान आपकी तरफ केंद्रित है और इस तरफ क्योंकि पहाड़ों तथा विषम भू-भाग, दुर्गम भू-भाग के चलते टोही कवरेज प्रभावी नहीं है।

करण थापर: आप जो उत्तर दे रहे हैं उससे यह अर्थ निकलता है कि पाकिस्तानी सेना, वायु सेना और इसकी तैयारियों की पोल खुल गई ?

परवेज मुशर्रफ: क्या आपको मुंह पर तमाचा, पोल खुलना जैसे इन शब्दों का प्रयोग करते समय आनन्द नहीं आ रहा? ठीक है, आज यह शर्मिन्दगी वाली स्थिति है।

करण थापर: आप खुले तौर पर स्वीकार रहे हैं कि यह शर्मिन्दगी है। अनेक लोग कह रहे हैं कि यह शर्मिन्दगी से ज्यादा अपमानजनक है क्योंकि आखिरकार पाकिस्तान सिर्फ सेना वाला देश नहीं हैं अपितु एक परमाणु राष्ट्र है। क्या यह अपमानजनक नहीं है?

परवेज मुशर्रफ: आप क्यों इन विशेषणों में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हो? चलिए इसे भूल जाएं, यह शर्मिन्दगी वाली स्थिति है।

करण थापर: जनरल मुशर्रफ मुझे बताएं कि पाकिस्तान में नाराजगी और उपद्रव के लिए जिम्मेदार लोगों को क्या हटना नहीं चाहिए?

परवेज मुशर्रफ: हां, मुझे लगता है कि उनके जाने की जरुरत है और यह पता लगाकर कि कौन इसके जिम्मेदार हैं, को दण्डित किया जाना चाहिए।

करण थापर: जनरल पाशा के बारे में क्या है, पाकिस्तान में अटकलें लग रहीं है कि वह अपना पद छोड़ने पर विचार कर रहे हैं, सेना ने अधिकारिक रुप से घोषित किया है कि ऐसा कुछ मामला नहीं है क्या आपको लगता है कि आईएसआई का प्रमुख होने के नाते उन्हें नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार कर इस्तीफा दे देना चाहिए?

परवेज मुशर्रफ: वह सर्वाधिक योग्य अफसर हैं और मुझे नहीं लगता कि उन्हें इस्तीफा देना चाहिए।

करण थापर: जनरल कयानी के बारे में क्या है ? वे सेनाध्यक्ष हैं और यदि पाकिस्तान की रक्षा तैयारियां तथा सीमाओं को इतना खुला अतिक्रमण हुआ है तो क्या जनरल कयानी को कुछ जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा नहीं दे देना चाहिए ?

परवेज मुशर्रफ: तटस्थ कमाण्डर के रुप में, मैं कहता हूं कि जिम्मेदारी तो ऊपर है, यदि हम ऊपर की ओर देखें तो यह ऊपर से नीचे आती है। इसे जांच के लिए छोड़ दीजिए और कार्रवाई बाद में की जाएगी।

करण थापर: एक तरफ तो आप कह रहे हैं कि जिम्मेदार लोग हटने चाहिएं लेकिन आप उनमें से कईयों को छोड़ रहे हैं, जैसे जनरल पाशा और कयानी के त्यागपत्र की संभावनाओं को। क्या आपको लगता है कि इन दोनों व्यक्तियों को देश से माफी मांगनी चाहिए।

परवेज मुशर्रफ: यह फैसला उनको करने दीजिए।

करण थापर: अब आपने बहुत सधा और नपा हुआ उत्तार दिया है कि यह फैसला उन पर छोड़ दीजिए। यदि आप उनकी स्थिति में होते तो क्या आप माफी मांगते ?

परवेज मुशर्रफ: मैं शायद गुप्तचर एजेंसियों की तरफ से माफी मांगता क्योंकि यह एक बड़ी गलती है,और एक प्रकार से यह बड़ी शर्मिन्दगी है। हो सकता है, हां और तब राष्ट्र को आश्वस्त करता कि हम जांच करेंगे तथा यह पता लगाएंगे कि गलती कैसे हुई? ”

मेरा मानना है कि जनरल को यह अहसास होना चाहिए कि इस प्रकरण में वाशिंगटन निश्चिंत था कि यह गलती नहीं है अपितु वह इसे एक सुनियोजित दोगलेपन और विश्वासघात का कदम मानता है।

इसकी जड़ में, यह गुप्तचर असफलता नहीं है। जिस शर्मिंदगी की स्थिति में पाकिस्तान ने अपने को पहुंचाया है उसके मूल में दो कारण हैं:

पहला, पाकिस्तान द्वारा किसी भी तरह से कश्मीर को हथियाने का जुनून। और यह भी कि वह इसे पाने में 1947 में कबाईलियों के दु:स्साहसी अभियान या उसके पश्चात भारत के विरुध्द छेड़े गये तीन युध्द; और यहां तक कि उसके पश्चात् तीन आतंकवादी संगठनों के माध्यम से ‘प्रच्छन्न युध्द‘ (प्रोक्सी वार) जारी रखने के निर्णय, जिनका निशाना भारत के विरुध्द है – के बावजूद वह सफल नहीं हो पाया ।

इसमें आश्चर्य नहीं कि, एनडीए के शासन के दौरान भारत में अमेरिका राजदूत राबर्ट ब्लैकविल ने एनडीटीवी को बताया कि पाकिस्तान और अमेरिका के बीच विश्वास टूट चुका है। उन्हें इस पर यकीन करना मुश्किल है कि ओसामा की उपस्थित के बारें में पाकिस्तान अनजान था।

वस्तुत: 1 मई, 2011 के बाद से पाकिस्तान की परिस्थितियां बिलकुल अवांछनीय है। अमेरिकी उन पर भरोसा नहीं कर सकते। और न ही अन्य राष्ट्र जो आतंकवाद के विरुध्द लड़ रहे वैश्विक गठबंधन के अंग है। विडम्बना है कि अलकायदा और उसके साथी तक भी इस पर असमंजस में होंगे कि पाकिस्तान पर कितना भरोसा किया जाए।

9 मई को ब्रिटेन के अग्रणी समाचारपत्र ‘गार्जियन‘ में एक चौंका देने वाली रिपोर्ट प्रकाशित हुई है कि सन् 2001 में ही जब बिन लादेन अमेरिका के द्रोण हमले से किसी प्रकार बचकर अफगानिस्तान की टोरा बोरा पहाड़ियों में छुप गया तब राष्ट्रपति बुश और पाकिस्तानी राष्ट्रपति मुशर्रफ में यह गुप्त समझौता हुआ था कि यदि अमेरिकी किसी भी समय लादेन को को ढूंढ निकालेंगे, और वह ठिकाना संयोग से पाकिस्तान हुआ तो अमेरिकी आकर उसका ले जाएंगें।

समझौते के मुताबिक पाकिस्तान इस पर शोर तो मचा सकेगा परन्तु उन्हें रोकेगा नहीं। ठीक यही हुआ है 11 मई को अमेरिकी नेवी सील्स द्वारा किए गए ऑपरेशन में !

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1 Comment on "क्या इसके बाद पाकिस्तान पर कोई भरोसा करेगा?"

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sunil patel
Guest

आदरणीय आडवानी जी बिलकुल सही कह रहे है. किन्तु हकीकत यह है की भारत कभी भी पाकिस्तान के प्रति कठोर कार्यवही नहीं करेगा. बिच्छु का काम डंक मारना है और साधू तो सहता रहता है. अमेरिका और चीन अभी भी पाकिस्तान को भारत के खिलाफ मदद देते रहेंगे और भारत अभी भी अमेरिका की तरफ टकटकी लगाकर देखेगा की वोह पाकिस्तान को कोई सबक सिखा दे. किन्तु अमेरिका हमेशा की तरह ऊपर से पाकिस्तान को नजर दिखा कर फिर से भारत के खिलाफ उपयोग के लिए हतियार / आर्थिक सहायता दे देता.

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