लेखक परिचय

आलोक कुमार

आलोक कुमार

बिहार की राजधानी पटना के मूल निवासी। पटना विश्वविद्यालय से स्नातक (राजनीति-शास्त्र), दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर (लोक-प्रशासन)l लेखन व पत्रकारिता में बीस वर्षों से अधिक का अनुभव। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सायबर मीडिया का वृहत अनुभव। वर्तमान में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के परामर्शदात्री व संपादकीय मंडल से संलग्नl

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बिहार में पिछले नौ सालों से ऊपर के ‘सुशासनी शासनकाल’ में ‘और’ कुछ तो फला-फूला नहीं ही लेकिन राजनीति , सत्ता  और सरकारी महकमों के संरक्षण में शराब के वैध – अवैध कारोबार ने बेशक नई ऊंचाईयाँ हासिल कीं l आज आलम ये है कि शहर के गली –मुहल्लों से लेकर सूबे के ग्रामीण इलाकों तक में अगर कोई एक चीज सबसे सुलभता से उपलब्ध है तो वो शराब ही है l पूरे प्रदेश में आप कहीं भी चले जाईए शराब की वैध दुकानों से भी ज्यादा छाती ठोक कर अवैध तरीके से प्रीमियम पर खुलेआम शराब बेचने –परोसने वाले पॉइंट्स आपको मिल जाएँगे l नेशनल हाइवेज हों , स्टेट हाइवेज हों , गाँवों की गलियाँ हों, छोटे-बड़े ढाबे हों , पारचून की दुकान हो , चाय व पान की दुकानें हो , सड़कों के किनारे छोटे- बड़े  चौक-चौराहे हों शराब सब जगहों पर उपलब्ध है और २४ x ७ बेरोक-टोक , बेखौफ बेची – परोसी जा रही है l सड़क किनारे बसे सूबे के ज़्यादातर ग्रामीण इलाकों में आलम तो ये है कि अहले सुबह आपको चाय की दुकानों या ढाबों पर चाय मिले ना शराब और चखना जरूर मिल जाएगा l ऐसी जगहों पर शराब की खाली बोतलों के अंबार पूरी कहानी खुद-बख़ुद बयां कर देते हैं l ऐसी जगहों पर अमूनन लाल-पीली बत्तियाँ लगी गाड़ियाँ , स्थानीय थानों की जीप खड़ी दिख जाएंगी लेकिन कारोबार बदस्तूर जारी ही रहता है l
शराब के अवैध धंधे में लिप्त ऐसे ही छोटे प्यादों से बात करने पर एक कॉमन- जवाब सुनने को मिलता है “ जब मोटा मंथली देते हैं तो डर किसका और कैसा ??…पूछना ही है तो थाना –इंचार्ज, एक्साइज़ (आबाकारी) वाले या नेता जी लोग से पूछिए ??? ऐसा थोड़े ही है कि केवल हम लोग ही कमा रहे हैं हम से ज्यादा मोटा माल तो पटना में बैठे लोग चाभ रहे हैं …!!”
हाल ही में अपने उत्तर बिहार के भ्रमण के दौरान जब मैंने जनदाहा – समस्तीपुर मार्ग (एनएच(NH)-१०३) पर स्थित चकलालशाही के स्थानीय लोगों से इस संबंध में बातचीत की तो वहाँ के ग्रामीणों ने मुझ से कहा  “यहाँ पुलिस-प्रशासन , आबकारी विभाग है ही नहीं, या फिर मिलीभगत के चलते नजर नहीं आता , शराब ठेकेदार और उनके गुर्गे बिना किसी खौफ के गाँवों में अवैध शराब की खेप पहुँचा-बिकवा रहे हैं l” वहाँ एक निजी –विद्यालय का संचालन कर रहे श्री नीरज प्रसाद ने बातचीत के क्रम में बताया कि “जिला आबाकारी अधिकारी व स्थानीय थाना –इंचार्ज के संज्ञान में बात लाने के बाद भी इस की बिक्री पर रोक नहीं लगाया जा रहा है।“ उन्होने ने आगे कहा कि “ राजनीति से जुड़े एक दबंग व्यक्ति के इशारे पर फल-फूल रहे इस अवैध शराब के व्यवसाय का एक तयशुदा हिस्सा आबकारी विभाग समेत थानाध्यक्ष एवं इलाकाई दरोगा व सिपाहियों को माहवारी के रूप में समय से पहुंचाया  जाता है, जिसके चलते  इस अवैध धंधे पर कोई भी पुलिस अथवा आबकारी विभाग का अधिकारी व कर्मचारी हाथ डालने को तैयार नहीं होता है।“ इसी मार्ग पर बसे सुरजपुर गाँव के श्री नर्मदेश्वर झा ने बताया कि “ हाजीपुर –समस्तीपुर भाया जनदाहा मार्ग पर आप जो लाईन-होटलों एवं ढाबों का मक्कड़-जाल देख रहे हैं वो सब के सब शराब की खुली बिक्री से फल-फूल रहे हैं , शराब के दम पर ही ऐसे ढाबे –होटल खोलने की होड़ सी मची है लोगों में l”
मुझे ये कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि “विकास के तमाम खोखले दावों के बावजूद विकास की राह देख रहा बिहार शराब माफियाओं की गिरफ्त में आ चुका है l प्रशासनिक उदासीनता व संरक्षण की आड़ में सूबे के ग्रामीण इलाकों में खुलेआम अवैध शराब की बिक्री जारी है और आमजन , विशेषकर युवा तेजी से नशे की गिरफ्त में आते जा रहे हैं। सूबे के लभभग हरेक गाँव में शराब माफिए बिना किसी रोक-टोक के शराब की अवैध सप्लाई व बिक्री कर रहे हैं, जिससे पूरा सूबा नशे की गिरफ्त में जा चुका है।”

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1 Comment on "जब मोटा मंथली देते हैं तो डर किसका और कैसा ??"

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Sureshchandra Karmarkar
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Sureshchandra Karmarkar

आलोक कुमारजी बिहार से हम मध्यप्रदेशवासी किसी तरह कम नहीं हैं,अब तो हमारे यहाँ देसी दारू की दुकान पर विदेशी शराब मिलने के समाचार हैं. आप किसी भी गाओं मैं बस से जाएँ ,जहँ भी बस रूकती है ”शराब की सरकारी दुकान का बड़ा बोर्ड ”आपका स्वागत करेगा। बस ठीक वहीं रुकेगी जहांसे यह बोर्ड साफ साफ दिखाई देगा,/आजकल सभी सरकारें या तो पेट्रोल के वेट पर गाड़ी चला रही हैं या शराब ,तम्बाकू,बीड़ी सिगरेट के राजस्व से या खनन की रायल्टी से या जमीनो की रजिस्ट्री शुल्क से चल रही हैं.

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