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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी-
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भारतीय जनता पार्टी के बारे में कहा जाता है कि वह वैचारिक प्रतिबद्धता से पूर्ण सुचिता के संकल्प को लेकर राजनीतिक क्षेत्र में कार्य करनेवाली पार्टी है। भाजपा के अस्तित्व में आने को लेकर विचार किया जाए तो यह किसी सत्ता केन्द्रित कार्यों पर प्रतिवेदन तैयार करने और कांग्रेस की तरह ह्यूम कल्पना से निकलकर साकार नहीं हुई। इसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रचारक श्रृंखला के तप के साथ कई नेताओं के बलिदान की शक्ति का बल जुड़ा हुआ है।

ऐसे में आश्चर्य तब होता है जब यह पार्टी भी कांग्रेस की राह पर चलती हुई दिखाई देती है। देश में अभीतक के कांग्रेस शासन में भ्रष्टाचार की पूरी सीरीज देखी जा सकती है। आजादी के बाद सिर्फ लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री काल को छोड़ दिया जाए तो सभी कांग्रेसी नेताओं के शासनकाल में भ्रष्टाचार की बेल-फलती-फूलती ही रही है। भाजपा के बारे में अभी तक ऐसा नहीं कहा जाता था, लेकिन पिछले कुछ समय में जो घटनाएं अपने प्रभाव के साथ उजागर हो रही हैं उनसे यह संदेश जरूर जाने लगा है कि भाजपा भी अब कहीं कांग्रेस की राह पर तो नहीं चल पड़ी है।

एनडीए के शासन में देश के प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रीमंडल के गलत निर्णय के अब एक के बाद एक जिन्न बोतल से बाहर निकल रहे हैं, जो यह बताने या संदेश देने के लिए पर्याप्त हैं कि भाजपा की करनी और कथनी में अंतर जरूर है। इसे लेकर हाल ही प्रकाश में आया प्रकरण राजस्थान के जोधपुर हैरिटेज लक्ष्मी विलास होटल डील का देखा जा सकता है। एनडीए सरकार के मंत्री रहे अरुण शौरी यहां हिंदुस्तान जिंक की डील के बाद हैरिटेज लक्ष्मी विलास होटल में फंसते नजर आ रहे हैं।

बात अरुण शौरी के व्यक्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाने की नहीं है। शौरी जी उन नेताओं-पत्रकारों और समाजिक सरोकारों से जुड़े व्यक्तियों में शुमार माने जाते हैं जिनके शोध परक कार्यों पर ही आज कई शोधार्थी कार्य कर रहे हैं। बावजूद इसके उनके द्वारा लिए गए निर्णय आज कहीं न कहीं उन पर सीधे प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। राजनीति में एक मुहावरा प्रचलित है कि यह पता नहीं लोगों से क्या-क्या करा लेगी, लेकिन यह बात उन पर सही नहीं बैठती जो राजनीति का मोहरा नहीं बनने का संकल्प लेकर यहां आते हैं। अदम्य निर्भीकता वाले पत्रकार, बुद्धिजीवी, प्रसिद्ध लेखक और राजनेता शौरी के बारे में कहा जाता है कि वे राजनीति में दशा और दिशा ठीक करने की मंशा से आए थे, आखिर फिर वे क्या करण रहे जो उनके शासन में केंद्रीय मंत्री रहते हुए उनसे यह भूले हो गईं।

सारा मामला जो अब प्रमुखता से प्रकाश में आ रहा है वह यह है कि भारतीय जनता पार्टी नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन..राजग..के शासनकाल में विनिवेश मंत्री रहे शौरी ने निजी वैल्यूअर व सरकार की एडवाइजरी कंपनी के कहने पर हैरिटेज लक्ष्मी विलास होटल महज 7 करोड़ 52 लाख रुपए में भारत होटल के मालिक ललित सूरी को बेच दिया था। उस समय ही इस होटल से जुड़ी 29 एकड़ जमीन की डीएलसी रेट से ही कीमत 151 करोड़ रुपए आंकी जा रही थी। इसके अलावा होटल में 54 आलीशान कमरे थे, निजी वैल्यूअर कर्ताओं ने जिनकी कीमत केवल 13 लाख आंकी।
सीबीआई की पड़ताल में पता चला है कि सरकार ने विनिवेश से पहले कांति करम नामक निजी कंपनी से इसकी वेल्युशन कराई। इस कंपनी ने जमीन की कीमत सिर्फ 4 करोड़ और 54 कमरों की कीमत महज 13 लाख ही आंकी। इसे सरकार की एडवाइजरी कंपनी लेजार्ड इंडिया लि. ने सही बताया और सरकार ने होटल बेच दिया। जबकि सिंगल बिड पर होटल नहीं बेचा जाना चाहिए था, यदि कम कीमत मिल रही थी तो सरकार ने क्यों दुबारा टेंडर नहीं किए। यहां पुरातत्व महत्व के होटल को बेचने के लिए राज्य सरकार से क्यों नहीं पूछा गया। उदयपुर की तीन झीलों के घाट पर फैली होटल की कीमत बेशकीमती है, यह जानते हुए भी जगह की कीमत का सही आंकलन राजद सरकार द्वारा नहीं कराया गया।

यहां सहज प्रश्न यह उठ रहा है कि एनडीए सरकार के कार्यकाल में करोड़ों की डील कौडिय़ों में कैसे संभव हो गई? क्यों कि सीबीआई की पड़ताल में यह तथ्य साफ उभरकर आए हैं कि होटल में बने 54 कमरों की कीमत 2 करोड़ से ज्यादा थी और 29 एकड़ जमीन की कीमत डीएलसी रेट से ही 151 करोड़ रुपए होती थी। जबकि बाजार में इसकी कीमत 300 करोड़ से ज्यादा आंकी जा रही थी। इसलिए सीबीआई ने मामले की छानबीन कर शुरुआती जांच (पीई) भी दर्ज कर ली है। जिसमें पूर्व मंत्री शौरी के साथ भारत होटल की सीएमडी डॉ. ज्योत्सना सूरी जो फिक्की की वरिष्ठ उपाध्यक्ष भी है, की भूमिका की जांच की जा रही है। इसके लिए सीबीआई ने विनिवेश मंत्रालय, पर्यटन मंत्रालय, लक्ष्मी विलास होटल के जीएम व आईटीडीसी के चेयरमैन को नोटिस देकर रिकॉर्ड अपने पास मंगवाया है।

यहा यह भी प्रश्न उठ रहा है कि आखिर वह कौन से कारण रहे, जिसके कारण एनडीए सरकार को 2002 में करीब बीस होटलों का विनिवेश करना पड़ा, जिसमें उदयपुर की लक्ष्मी विलास होटल भी शामिल है। इस होटल को लाभ दलिाने के लिए क्यों ऐसे नियम बनाए गए जिनमें इस होटल के विनिवेश के लिए केवल भारत होटल की ओर से ही बोली लगाई जा सकती थी और दूसरी कंपनी फिट नहीं बैठती थी। इस पूरे खुलासे में अभी यह जानकारी भी निकलकर आ रही है कि भारत होटल ने जो हैरिटेज होटल महज 7.52 करोड़ में खरीदा, उसमें भी भुगतान 6.75 करोड़ का ही किया है।

प्रश्न यह एक होटल या इस प्रकार के अन्य होटलों में हुए भ्रष्टाचार का नहीं है, बात इससे भी ऊपर जाकर नीयत की है। भाजपा को उसकी साफ नीयत के रूप में ही जनता जानती है, यदि इस प्रकार के खुलासे होते रहे तो इतना तय है कि भाजपा को कांग्रेस बनने में देर नहीं लगेगी। वैसे तो देश के जिन राज्यों में भाजपा की सरकार हैं और जहां पहले रही हैं, वहां समय-समय पर भ्रष्टाचार के मुद्दे उठते रहे हैं, लेकिन साबित कुछ नहीं हो सका है, किंतु इस मामले में सीधेतौर पर एनडीए सरकार की गलती नजर आ रही है। अब सोचना भाजपा के खेबनहारों को होगा कि क्या इसी सुचिता के लिए देश में कांग्रेस के विकल्प के रूप में भारतीय जनता पार्टी का उदय हुआ था और क्या इसलिए भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनाए गए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी कांग्रेस मुक्त भारत का सपना देख रहे हैं ?

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