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सुभाष सेतिया

महिलाओं के प्रति गांधीजी के सकारात्मक दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वे महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले अधिक सुदृढ़ और सहृदय मानते थे। वे नारी को अबला कहने के भी सख्त खिलाफ थे। उनकी यह धारणा उनके आचरण, लेखों तथा व्याख्यानों में अनेक बार प्रकट हुई। इस संदर्भ में महात्मा गांधी का यह उध्दरण जानने योग्य है, ”उन्हें अबला पुकारना महिलाओं की आंतरिक शक्ति को दुत्कारना है। यदि हम इतिहास पर नजर डालें तो हमें उनकी वीरता की कई मिसालें मिलेंगी। यदि महिलाएं देश की गरिमा बढ़ाने का संकल्प कर लें तो कुछ ही महीनों में वे अपनी आध्यात्मिक अनुभूति के बल पर देश का रूप बदल सकती हैं।”

सामान्यतया महात्मा गांधी को धार्मिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक मामलों में परंपरावादी तथा अनुदार माना जाता है। किंतु जहां तक हिंदू समाज में महिलाओं की स्थिति का प्रश्न है, गांधीजी ने जो दृष्टि बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध्द में न केवल अपने भीतर विकसित की, बल्कि उसे अपने आचरण में भी उतारा, वह इक्कीसवीं शताब्दी के इस चरण में भी काफी क्रांतिकारी लग सकती है। कभी-कभी यह बात बहुत अचरज-भरी लगती है कि अन्य अनेक सामाजिक मामलों में परंपरावादी रीति-नीति का समर्थन करने वाले गांधीजी महिलाओं से जुडे प्रश्नों पर इतनी गहरी उदारतावादी और समतावादी दृष्टि कैसे अपना पाए? परंतु उनका आचरण तथा उनके लेख, भाषण, पत्र आदि इस तथ्य के जीवंत प्रमाण हैं कि वे नारी को पुरुष से किसी भी बात में कम नहीं आंकते थे और सहिष्णुता जैसे मामलों में तो औरतों को पुरुषों से अधिक समर्थ और सक्षम मानते थे। यही कारण है कि उन्होंने कांग्रेस में महिलाओं को नेतृत्व का पूरा अवसर दिया। विभिन्न आंदोलनों में औरतों को शरीक करने के साथ-साथ उनके सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक उत्थान के कार्यक्रम भी चलाए। उल्लेखनीय बात यह है कि नारी-मुक्ति का शोर मचाने की बजाय उन्होंने महिलाओं को एकदम सहज ढंग से स्वतंत्रता आंदोलन का अभिन्न अंग बनाया।

यह निस्संकोच कहा जा सकता है कि महिला-अधिकारों के संबंध में आज जो अनुकूल वातावरण हमें दिखाई दे रहा है, उसकी नींव गांधीजी सरीखे महानुभावों ने बहुत पहले रख दी थी। इस संदर्भ में प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता इला भट्ट का वह कथन एकदम सटीक प्रतीत होता है जो उन्होंने ‘गांधी आन वुमेन’ पुस्तक की भूमिका में लिखा है। वे लिखती हैं- ”महिलाओं ने उनके नेतृत्व में चले जन-आंदोलन में सहज ढंग से भाग लिया। इससे भारतीय महिलाओं के जीवन में हमेशा के लिए एक मोड़ आ गया। मैं यह कहना चाहूंगी कि यदि गांधीजी यह मोड़ न लाए होते तो मैं वह न होती जो मैं आज हूं। यह बात आज की हर महिला पर लागू होती है।”

गांधीजी यों तो समूची मानवजाति का सम्मान करते थे, परंतु महिलाओं के लिए उनके हृदय में अत्यंत गहरी सहानुभूति और आदर का भाव मौजूद था। समूचे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने अनेक महिलाओं को न केवल स्वतंत्रता संघर्ष में कूदने के लिए प्रेरित किया, बल्कि उन्हें नेतृत्व करने का भी अवसर दिया। स्वाधीनता संघर्ष के इतिहास में सरोजिनी नायडू, सुचेता कृपालानी, सुशीला नैयर, विजय लक्ष्मी पंडित, अरुणा आसफ अली, इंदिरा गांधी तथा कई अन्य महिला नेताओं ने कांग्रेस को सशक्त बनाने में योगदान दिया। इसके अलावा बहुत-सी महिलाओं ने महात्मा गांधी की प्रेरणा से सामाजिक उत्थान तथा अन्य रचनात्मक कार्यों को अपनाया। यही नहीं, गांधीजी ने कुछ विदेशी महिलाओं को भी अपने व्यवहार व स्नेह से इतना प्रभावित किया कि वे अपना देश छोड़कर न केवल भारत में बस गई, बल्कि भारतीय नाम और जीवन-पध्दति भी अपनाई और रचनात्मक कार्यो में सक्रिय सहयोग दिया। इनमें सरला बेन तथा मीरा बेन जैसे नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

महिलाओं के प्रति गांधीजी के सकारात्मक दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वे महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले अधिक सुदृढ़ और सहृदय मानते थे। वे नारी को अबला कहने के भी सख्त खिलाफ थे। इस संदर्भ में महात्मा गांधी का यह उध्दरण जानने योग्य है, ”उन्हें अबला पुकारना महिलाओं की आंतरिक शक्ति को दुत्कारना है। यदि हम इतिहास पर नजर डालें तो हमें उनकी वीरता की कई मिसालें मिलेंगी। यदि महिलाएं देश की गरिमा बढ़ाने का संकल्प कर लें तो कुछ ही महीनों में वे अपनी आध्यात्मिक अनुभूति के बल पर देश का रूप बदल सकती हैं।”

महिलाओं की इस आंतरिक शक्ति को गांधीजी सत्याग्रह जैसे अहिंसक हथियार के लिए सर्वथा उपयुक्त मानते थे। उनका यह भी दृढ़ विश्वास था कि सत्याग्रह ने महिलाओं को घर की चारदीवारी से बाहर निकालकर समाज एवं देश की सेवा करने का मौका दिया है। यह बात उनके इस कथन से स्पष्ट होती है, ”मैंने महिला-सेवा को रचनात्मक कार्यक्रम में शामिल किया है, क्योंकि सत्याग्रह ने स्वत: ही महिलाओं को जिस तरह अंधेरे से बाहर निकाल दिया है वैसा इतने कम समय में और किसी भी उपाय से नहीं हो सकता था।”

जाहिर है, भावनात्मक स्तर पर सम्मान और समानता के समर्थन-भर से महिलाओं को समाज में वास्तविक बराबरी नहीं दिलाई जा सकती। इस संबंध में गांधीजी का स्पष्ट मत था कि औरतों का शैक्षिक स्तर सुधारकर उन्हें आर्थिक रूप में आत्मनिर्भर बनाना बहुत जरूरी है। उस दौर में ही गांधीजी ने महिला समानता के लिए आर्थिक स्वावलंबन की आवश्यकता को पहचान लिया था। उनके खादी आंदोलन का एक उद्देश्य स्वदेशी की भावना को उजागर करना और दूसरा उद्देश्य देश की गरीब जनता, विशेषकर महिलाओं को, जो कि सामाजिक बंधनों के कारण घर से बाहर जाकर काम-धंधे नहीं कर पाती थीं, उन्हें घर पर चरखा या तकली चलाकर कुछ धन अर्जित करने का साधन उपलब्ध कराना था। खादी उद्योग के माध्यम से गांवों, कस्बों व शहरों की लाखों निर्धन महिलाओं को देशभक्ति की अनुभूति के साथ-साथ रोजगार भी मिला और उनके जीवन में खुशहाली भी आई।

महात्मा गांधी स्त्रियों के सामाजिक उत्थान के लिए भी बहुत चिंतित थे। महिलाओं के जीवन को प्रभावित करने वाली सामाजिक कुरीतियों के बारे में उनके मन में काफी कड़वाहट थी। वे मानते थे कि बाल-विवाह, पर्दा प्रथा, सती प्रथा और विधवा-विवाह-निषेध जैसी कुरीतियों के कारण ही महिलाएं उन्नति नहीं कर पातीं और शोषण, अन्याय तथा अत्याचार झेलने को विवश होती हैं। उन्होंने यद्यपि इन कुप्रथाओं के उन्मूलन के लिए कोई संगठित आंदोलन नहीं चलाया, किंतु विभिन्न मंचों पर अपने व्याख्यानों और लेखों के माध्यम से वे इन सामाजिक कुरीतियों पर कठोर प्रहार करते रहे।

गांधीजी कितनी गहराई तक स्त्री को समानता का हक देने के पक्षधर थे, इसे समझने के लिए यह संवाद देखा जा सकता है। जो उन्होंने अपने सहयोगी और जाने-माने विद्वान काका कालेलकर के कहने पर बच्चों को भाषा-ज्ञान कराने की बालपोथी के लिए लिखा था। वह संवाद इस प्रकार है:

मां- ‘बेटे, तुम्हें भी अपनी बहन की तरह घर के कामकाज में हाथ बंटाना चाहिए।’

लड़का- ‘पर वह लड़की है। मैं तो लड़का हूं। लड़कों का काम खेलना और पढ़ाई करना है।’

लड़की- ‘ऐसा क्यों? मुझे भी तो खेलना और पढ़ना होता है!’

लड़का- ‘इससे मैं कब इंकार करता हूं। परंतु मेरी प्यारी बहन, तुम्हें घर का काम भी करना होगा।’

मां- ‘लड़का घर का काम क्यों न करे?’

लड़का- ‘क्योंकि लड़के को बड़ा होकर धन कमाना होता है, इसलिए उसे अच्छी तरह पढ़ना चाहिए।’

मां- ‘बेटे, तुम गलत कह रहे हो। औरत भी परिवार के लिए कमाई करती है। घर के काम में बहुत कुछ सीखने को मिलता है। घर के काम करके तुम कई कौशल सीख जाओगे और आत्मनिर्भर बन सकोगे। घर के काम अच्छी तरह करने के लिए तुम्हें आंखों और हाथों तथा दिमाग का इस्तेमाल करना होगा। अत: इन कामों से शिक्षा मिलती है और हमें चरित्र-निर्माण में मदद मिलती है। पुरुष व महिला दोनों को घर के काम सीखने चाहिए क्योंकि घर दोनों का है।’

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