लेखक परिचय

नीरज वर्मा

नीरज वर्मा

1998 से सक्रिय, टी.वी.पत्रकारिता की शुरुवात , 16 सालों का तज़ुर्बा, राजनीति-आध्यात्म-समाज और मीडिया पर लगातार लेखन ! एक्टिव ब्लॉगर ! हिन्दी-मराठी-अंग्रेजी-भोजपुरी पर ख़ासी पकड़ ! अघोर-परम्परा पर, पिछले कई सालों से लगातार शोध !

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two sectsदुनिया में सिर्फ 2 कौम हैं ! अमीर-गरीब ! गर हिन्दुस्तान की बात करें तो टाटा-बिड़ला और अम्बानी-अडानी जैसों की अलग कौम और खून पसीने से रोटी का जुगाड़ करने वालों की अलग कौम ! मुकेश अम्बानी, टाटा-बिरला-अदानी, सचिन तेंदुलकर, शाहरुख़ खान जैसों के पास अरबों-करोड़ों के बंगले और बेशुमार-दौलत , 40% भारतीयों के पास कहने को भी अपनी छत नहीं ! महज़ 100,000 लोगों के पास इस देश का 80% पैसा है ! बाकी 20% में 100 करोड़ लोगों की हिस्सेदारी है ! 50 रुपये रोज़ाना  से ज़्यादा कमाने वाला भारतीय गरीब नहीं , करोड़ों-अरबों रुपयों  का बैंक बैलेंस रखने वाला अलग कौम का !  प्राइवेट स्कूल के बच्चों का अलग रूतबा , सरकारी स्कूल के बच्चों का हाल -बेहाल ! सरकारी अस्पताल “गरीब का अस्पताल”, प्राइवेट बड़े हॉस्पिटल “बड़ो के लिए” ! पैसा बोलता है हर जगह ! भोपाल गैस-काण्ड में हज़ारों लोग मर गए (या अपाहिज़ हुए) और ज़िम्मेदार सी.ई.ओ. इज्ज़त के साथ देश छोड़कर चला गया ! दंगों के इतिहास में मारे जाना वाला ज़्यादातर गरीब कौम का ही  होता है ! गरीब की बेटी की शादी रो-रो कर होती है , अमीर करोड़ों रुँपये फूंक देता है शाही अंदाज़ में हंस-हंस कर ! अमीर अपनी गाड़ी से कुचल कर -ज़मानत पा , शान से रहता है ! गरीब का रिक्शा भी टकरा जाए तो , वो सहम जाता है ! ऊँची आवाज़ और तल्खियत , अमीरी का मर्म है- गरीब वाज़िब अंदाज़ में भी बात करे तो गोया ज़ुर्म है ! अमीर के साथ ना-इंसाफी तो जग साथ, गरीब के साथ हादसा महज़ इत्तेफ़ाक ! अमीर कम कपड़े पहन कर घुमे तो फैशन , गरीब के फटे कपड़ों को देखकर, “और कुछ देखने” का कुछ और ख़याल !  गरीब अपने जंगल और ज़मीन को बचाने की कोशिश करे तो बागी, अमीर उन्हें उजाड़ कर अपना बसाए तो त्यागी ! गरीब भूखों मर जाए तो सरकार सोये, अमीर को छींक भी आये तो सरकार फ़ौरन जागी ! जो बैंक बैलेंस रक्खे, वो दाता, अमीर को और अमीर बनाने वाले के हिस्से में रोटी से ज़्यादा कुछ नहीं आता !  अमीर , अपने लिए क्षेत्र वाद , भाषा वाद , जातिवाद और सम्रदाय-वाद करे तो जायज़ , गरीब हक के लिए भी फुसफुसाए तो नाजायज़ ! गरीब मुल्कों की तरक्की का राज ये क्यों है- समझ में नहीं आता ! शोषण और हक में फर्क भी कोई नहीं समझाता ! तरक्की का असल मतलब क्या है, ये सरकार को भी समझ नहीं आता !
 अमेरिका ने , अपने यहाँ, मज़बूत बुनियादी सुविधाओं के ज़रिये, गरीबी और अमीरी के बीच का फासला कम किया और दुनिया पर राज किया !  (तरक्की और पावर के लिहाज़ से ) अमेरिका को अपना आदर्श मानने वाले हिन्दुस्तान में, इस दूरी को बढ़ाते हुए “सुपरपावर” बनने का सपना संजोया जा रहा है ! किसी ने सच ही कहा है-कि- मुंगेरीलाल के हसीं सपने , कभी-कभी  दिल खुश कर देते हैं ! हमारे यहाँ (ज़्यादातर) अमीर की सोहबत अक्सर, अपनी बिरादरी यानी पैसे वालों के साथ ही होती है !  कमोबेश यही हाल गरीब का होता है ! फर्क सिर्फ इतना भर – कि गरीब की मजबूरी होती है और अमीर सिर्फ एक आँख से देख पाता है ! “खुदा” ने इनायत की-तो-अमीर इसे अपनी किस्मत समझ बैठा और गरीब ने “उस” इनायत से बेपरवाह खून-पसीना बहाया तो मोहताज़ हो गया !…. “ऊपर वाले तेरा जवाब नहीं- कब दे क्या दे हिसाब नहीं…

” ! “खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान” ऐसी कहावत भी सुनी गयी है  ! पैसों से अमीर बने पहलवानों को गधा  पसंद नहीं , उन्हें घोड़ों पर बैठने का शौक होता है ! अजीब बात है ! …. वो भी घोड़ों पर बैठा हुआ ! वाह रे …..की किस्मत ! किस्मत-किस्मत का फेर है ! गधों को घोड़ों की किस्मत पर रश्क हो सकता है- घोड़ों को गधे की किस्मत देख- अश्क बहाना पड़ सकता है ! मामला २ “कौम” अमीरी-गरीबी का है ! और इंसानियत की बजाय “कौम” के लिए मर-मिटने की परम्परा पुरानी है ! कहते हैं कि पैसा आ जाने के बाद ज़मीन पर पैर रखने का रिवाज़ बहुत कम लोगों को मालूम है ! पर एक  रिवाज़ इन दोनों कौमों को एक कर देता है ! बेहद आम और ख़ास रिवाज़ – दो गज ज़मीन और चार कन्धों का ! पर ज़िंदगी भर गफलत बनी रहती है कि- ख़ास तौर पर अमीर कौम में ! शायद कई एकड़ ज़मीन, गरीबों से दूरी, करोड़ों का  बैंक बैलेंस और सैकड़ों कन्धों की ज़रुरत पड़े ! “काहे पैसे पे इतना गुरूर किये है- यही पैसा तो अपनों से दूर किये है” ! पर दूरी अच्छी लगती है – गलतफहमी की तरह ! ऊपर जाकर “खुदा खैर करे” !

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4 Comments on "यकीं मानिए- दुनिया में सिर्फ दो-कौम हैं !"

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डॉ.अशोक कुमार तिवारी
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डॉ.अशोक कुमार तिवारी
मैं लेखक से सहमत हूँ —————– जब तक भारत और इण्डिया में भेद करके इण्डिया के लिए ही सोचने वाले मुकेश अम्बानी से मोदी साहब की दोस्ती तले डीजल-पेट्रोल-गैस के दाम बढ़ाकर बेलगाम महँगाई बढ़ाई जाएगी तब तक गरीबों का क्ल्याण नहीं हो सकता है —- ये खाते खोलना —– आदि सब दिखावा हैं क्या इससे गरीब को किराया कम देना पड़ेगा या मुकेश अम्बानी अनिल अम्बानी का अथाह पैसा जो भारतीयों के खूनपसीने की ही कमाई स्विस बैंकों में बंद है वापस आ जाएगी ? या रिलायंस कम्पनी जामनगर में गरीबों की प्रताड़ना रुक जाएगी ——————————————————————– पता नहीं रिलायंस… Read more »
आर. सिंह
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मैं इसे नहीं मानता,क्योंकि यह कृत्रिम विभाजन है. भारत में शायद यह आम बात नहीं है,पर अन्य देशों में यह बहुत बार होता है कि आज का गरीब कल अमीर हो सकता है.भारत में यह अवश्य होता है कि आज का मध्यम वर्गीय परिवार कल कंगाल हो सकता है अगर उसके यहां एक या दो व्यक्ति खतरनाक रोग के शिकार हो गए,पर अन्य देशों में ऐसा बिरले ही होता है,क्योंकि वहां चिकित्सा के लिए घर या जायदाद बेच कर इलाज कराने की नौबत नहीं आती..आज भारत में आर्थिक विषमता से ज्यादा सामाजिक विषमता है,जिसका मूल कारण भी कुछ हद तक… Read more »
इक़बाल हिंदुस्तानी
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नीरज वर्मा जी आपको हार्दिक बधाई। लेख बहुत शानदार है।
सवाल यह है कि गरीब जनता धर्म जाति और दूसरे भावुक मुद्दों के नाम पर अगर बंट सकती है तो अमीर उसको बांटकर देश की धन सम्पदा को दोनों हाथो से क्यों नही लूटना चाहेगा?
जिस दिन गरीब जनता संगठित होकर अमीर मुट्ठीभर लोगो के खिलाफ बिगुल बजादेगी उस दिन कोई सत्ता उसको किसी भी तरीके से रोक नहीं पाएगी और सरकार को वो करना होगा जो गरीब जनता चाहेगी।

नीरज वर्मा
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शुक्रिया, इकबाल भाई !

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