लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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निर्मल रानी
अबुल पाकिर जैनुलआबदीन अब्दुल कलाम जिन्हें देश डा० एपीजे अब्दुल कलाम के नाम से जानता था की आकस्मिक मृत्यु ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है। महात्मा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक देश के महान से महानतम नेताओं तक का विछोह हमारे देश ने देखा है। ऐसे कई नेताओं की मौत पर समूचे राष्ट्र को बेशक कई बार गमगीन होते हुए भी देखा गया है। मीडिया में भी कई बड़े नेताओं की मृत्यु ने काफी जगह पाई है। परंतु इसमें कोई दो राय नहीं कि डा० कलाम की अचानक हुई मृत्यु ने मीडिया से लेकर आम लोगों तक यहां तक कि बच्चों और विशेषकर युवाओं के दिलों पर जो असर छोड़ा है उसकी तुलना किसी दूसरे नेता की मृत्यु से नहीं की जा सकती। बेशक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एक हत्यारे की गोली से शहीद हुए,पंडित जवाहर लाल नेहरू देश के अत्यंत लोकप्रिय प्रधानमंत्री के रूप में स्वर्ग सिधारे,इंदिरा गांधी व राजीव गांधी अपने दुश्मन आतंकियों के हमले का शिकार हुए। नि:संदेह राष्ट्र को इन सभी की मौत पर गहरा सदमा हुआ। परंतु इसमें भी कोई दो राय नहीं कि उपरोक्त नेताओं से वैचारिक मतभेद रखने वाले अथवा इनसे राजनैतिक दुराग्रह रखने वाले लोग भी इस देश में मौजूद थे और अब भी हैं। परंतु यदि हम डा० कलाम की तुलना इस संदर्भ में उपरोक्त नेताओं से करें तो हमें यही देखने को मिलेगा कि एक गरीब मुस्लिम परिवार में जन्मे होने के बावजूद तथा एक दक्षिण भारतीय गैर हिंदी भाषी व्यक्तित्व होने के बावजूद कलाम साहब समूचे राष्ट्र के सर्वमान्य व समान लोकप्रियता रखने वाले व्यक्ति थे।
गत् 27जुलाई का दिन वह मनहूस दिन था जिस दिन पंजाब के गुरदासपुर जि़ले में हमारे देश के सुरक्षा बल के जवान आतंकवादियों से हो रही भीषण मुठभेड़ में व्यस्त थे। इस मुठभेड़ में एक जांबाज़ पुलिस अधीक्षक सहित 12 लोग शहीद हुए। मीडिया द्वारा इस मुठभेड़ का सीधा प्रसारण दिखाया जा रहा था। मीडिया के माध्यम से पूरे देश का ध्यान इस आतंकवादी घटना की ओर लगा हुआ था। भारत-पाकिस्तान के रिश्ते इसी मुठभेड़ को लेकर चर्चा का विषय बन चुके हैं। कि अचानक इसी 27 जुलाई की शाम को देश के पूर्वोत्तरीय नगर शिलांग से यह समाचार आया कि भारत रत्न डा० कलाम एक कार्यक्रम में भाग लेने के बाद फिसल कर गिरे तथा अस्पताल पहुंचने के बाद कुछ ही समय में ह्ृदयगति रुक जाने के कारण 83 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। इस खबर के प्रसारित होते ही क्या आतंकवादी मुठभेड़ की खबर तो क्या देश या विदेश की अन्य खबरें सभी फीकी पड़ गईं। डा० कलाम की मौत की खबर से देश व दुनिया में प्रत्येक भारतवासी शोकाकुल हो उठा। देश के तमाम स्कूल व कॉलेज में जहां-जहां डा० कलाम के चित्र के समक्ष लोग पुष्प अर्पित करते अथवा उनकी स्मृति में मोमबत्तियां जलाते वे बच्चे अपने आंसुओं को नहीं रोक पाते। यह कहना गलत नहीं होगा कि डा० कलाम की मृत्यु ने देश के लोगों को कुछ ऐसा एहसास करा दिया गोया प्रत्येक व्यक्ति के परिवार का ही कोई लोकप्रिय सदस्य उसके अपने परिवार को छोडक़र चला गया हो।
निश्चित रूप से यह डा० कलाम की काबलियत और उसके साथ-साथ उनकी सादगी,उनके व्यक्तित्व से झलकने वाली उनकी बेपनाह शराफत,उनके बेदाग चरित्र तथा एक वैज्ञानिक के रूप में देश को दिया गया उनका अमूल्य योगदान ही था जिसने उनको जन-जन का नायक बना दिया। क्या पृथ्वी व पर्यायवरण की िफक्र, क्या जल संरक्षण की चिंता, क्या सैन्य आत्मनिर्भरता का विषय,क्या देश से गरीबी मिटाने की बात तो क्या बाढ़ व सूखे से निपटने के उपायों पर चिंतन तो क्या देश में हरित क्रांति लाए जाने का सपना या फिर पूरे देश को समान रूप से साक्षर बनाए जाने का संकल्प, राजनीति में शुचिता लाने का इरादा गोया उनकी हर सोच ऐसी थी जो जनमानस से तथा प्राणियों के जीवन से सीधेतौर पर जुड़ी हुई थी। 2002 में उनको देश का राष्ट्रपति किस राजनैतिक वातावरण के बीच बनाया गया यह पूरा देश भलीभांति जानता है। इसके बावजूद जबकि राजनैतिक दुष्प्रयासों के कारण हमारा देश धर्म आधारित ध्रुवीकरण की ओर बढ़ता जा रहा है फिर भी कलाम साहब का जन-जन के लिए लोकप्रिय होना तथा देश के किसी भी सामान्य व्यक्ति के मन में उनके धर्म के चलते किसी प्रकार के पूर्वाग्रह का न होना उन्हें वास्तव में एक महान इंसान के रूप में स्थापित करता है। देश की शायद ही कोई आंख ऐसी रही हो जो इस भारत रत्न के देहावसान की खबर सुनकर नम न हुई हो। शायद ही देश का कोई लेखक अथवा रचनाकार ऐसा रहा हो जिसने डा० कलाम को समर्पित आलेख न लिखा हो। देश का शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा रहा हो जिसने कलाम साहब की मौत पर होने वाली गमगीन चर्चा में खुद को शरीक न किया हो। गोया उनकी मृत्यु के बाद तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि डा० कलाम मृत्यु के पश्चात अपने जीवन से भी अधिक लोकप्रियता हासिल कर गए।
डा० कलाम के मरणोपरांत उनके जीवन से जुड़े तमाम िकस्से सामने आ रहे हैं। यहां तक कि अपनी मृत्यु के कुछ क्षण पहले तक भी उन्होंने जिस सादगी व शराफत का प्रदर्शन किया तथा पृथ्वी के प्रति अपनी चिंता का इज़हार किया उसने उन्हें और भी महान बना दिया। राष्ट्रपति के अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने जिस प्रकार कई विषयों पर कड़ा रुख अिख्तयार किया और स्वयं को भारत सरकार के रबर स्टैंप रूपी राष्ट्रपति होने से बचा कर रखा वह भी देश ने बहुत गौर से देखा। छात्रों के प्रति उनके स्नेह से भी देश भलीभांति परिचित था। डा० कलाम देश के विकास में छात्रों की महत्वपूर्ण भूमिका सुनिश्चित करना चाहते थे। देश में होनहार छात्रों की फ़ौज खड़ी हो तथा उनके कंधों पर देश की तरक्की का भार डाला जाए इसके लिए वे देश के शिक्षकों को और अधिक सुदढ़़ किए जाने की वकालत भी करते रहते थे। शिक्षकों के प्रति उनके लगाव का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जब कभी उन्हें पूर्व राष्ट्रपति अथवा भारतरत्न, मिसाईलमैन या वैज्ञानिक कहकर संबोधित किया गया तो उन्होंने इसमें से प्रत्येक संबोधन को अपने नाम के साथ जोडऩा नापसंद किया। बजाए इसके वे स्वयं को प्रोफ़ेसर कलाम ही कहलवाना चाहते थे। और अपने जीवन का अधिकांश समय भी उन्होंने स्कूल व कॉलेज के छात्रों को संबोधित करने में अथवा उनसे विचार विमर्श करने में ही बिताया। उनका स्पष्ट रूप से यह मानना था कि यदि शिक्षकों द्वारा छात्रों को सही ढंग से व सही दिशा में शिक्षा दी जाए तो देश में एक करोड़ कलाम पैदा हो सकते हैं।
2002 में जब राजग सरकार द्वारा उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया गया उस समय भी देश ने यह सोचकर राहत की सांस ली थी कि अब देश को एक योग्य तथा काबिल राष्ट्रपति मिल चुका है। परंतु 2007 में जब उनका कार्यकाल समाप्त हुआ उस समय देश में यूपीए की सरकार बन चुकी थी। देश की जनता 2007 में भी उन्हें पुन: राष्ट्रपति के पद पर देखना चाह रही थी। यहां तक कि विभिन्न मीडिया चैनल्स व अन्य एजेंसीज़ द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर कई सर्वेक्षण भी कराए गए। जिनसे यही पता चला कि लगभग पूरा देश डा० कलाम को ही एक बार पुन: राष्ट्रपति बनते देखना चाह रहा है। परंतु अपने पहले पांच वर्ष के कार्यकाल में ही उन्होंने राजनेताओं को अपनी कार्यप्रणाली के द्वारा जो संदेश दिया वह इतना सख्त था कि कोई भी सरकार डा० कलाम को पुन: राष्ट्रपति बनाए जाने जैसा जोखिम नहीं उठा सकती थी। यूपीए सरकार ने डा० कलाम को पुन: राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार बनाए जाने के बजाए प्रतिभा पाटिल को अपना उम्मीदवार बनाया जाना ज़्यादा मुनासिब समझा। अब यहां यह बताने की आवश्यकता नहीं कि डा० कलाम व प्रतिभा पाटिल के मध्य तुलनात्मक दृष्टि से कितना अंतर था। फिर भी 2007 के बाद भी मीडिया ने उन्हें ‘जनता के राष्ट्रपति’ होने की उपाधि से नवाज़ा।
बहरहाल देश का सच्चा सुपूत एवं भारत का वास्तविक अनमोल रत्न,भारतरत्न डा० एपीजे अब्दुल कलाम देश को अनाथ कर इस दुनिया से जा चुका है। इस महान व्यक्ति ने समय के मूल्य को समझते हुए अपनी मृत्यु से पहले ही यह कहा था कि मेरी मृत्यु के बाद शोकस्वरूप छुट्टी नहीं की जानी चाहिए बल्कि बजाए इसके एक दिन और अधिक काम कर देश को मज़बूत करना चाहिए। यदि हम अपने विचारों में, अपने जीवन में तथा अपनी दिनचर्या में डा० कलाम के कथनों व उनके सद्वचनों के दसवें हिस्से पर भी अमल कर सकें तो न केवल देश का इससे बहुत बड़ा कल्याण होगा बल्कि उस महापुरुष के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी।सर्वधर्म संभाव,सांप्रदायिक सौहाद्र् की मशाल रौशन रखने वाले इस महान व्यक्तित्व डा० एपीजे अब्दुल कलाम की आत्मा को शत-शत् नमन।

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