बारिशो के मौसम में ;

यूँ ही पानी की तेज बरसाती बौछारों में ;

मैं अपना हाथ बढाता हूँ कि तुम थाम लो  ,

पर सिर्फ तुम्हारी यादो की बूंदे ही ;

मेरी हथेली पर तेरा नाम लिख जाती है .. !

और फिर गले में कुछ गीला सा अटक जाता है ;

जो पिछली बारिश की याद दिलाता है ,

जो बरसो पहले बरसी थी .

और ; तुमने अपने भीगे हुए हाथो से मेरा हाथ पकड़ा था;

और मुझमे आग लग गयी थी .

तुम फिर कब बरसोंगी जानां ….!

 

अक्सर ….

हिज्र की तनहा रातो में

जब जागता हूँ मैं – तेरी यादो के उजाले में ;

तो तेरी खोयी हुई मुस्कराहट बिजली की तरह कौंध जाती है,

और मैं तेरी तस्वीर निकाल कर अपने गालो से लगा लेता हूँ .

इस ऐतबार में कि तुम शायद उस तस्वीर से बाहर आ जाओ .

पर ऐसा जादू सिर्फ एक ही बार हुआ था ,

जो कि पिछली बहार में था,

जब दहकते फ्लाश की डालियों के नीचे मैंने तुम्हे छुआ था.

तुम जो गयी , ज़िन्दगी का वसंत ही मुरझा गया ;

अब पता चला कि ;

ज़िन्दगी के मौसम भी तुम से ज़ेरेसाया है जानां !

 

अक्सर …

मैं तुम्हे अपने आप में मौजूद पाता हूँ ,

और फिर तुम्हारी बची हुई हुई महक के साथ ;

बेवजह सी बाते करता हूँ ;

कभी कभी यूँ ही खामोश सडको और अजनबी गलियों में,

और पेड़ो के घने सायो में भी तुम्हे ढूंढता हूँ.

याद है तुम्हे – हम आँख मिचोली खेला करते थे

और तुम कभी कभी छुप जाती थी

और अब जनम बीत गए ..

ढूंढें नहीं मिलती हो अब तुम ;

ये किस जगह तुम छुप गयी हो जानां !!!

 

अक्सर …..

उम्र के गांठे खोलता हूँ और फिर बुनता हूँ

बिना तुम्हारे वजूद के .

और फिर तन्हाईयाँ डसने लगती है ..

सोचता हूँ कि तेरे गेसुओं में मेरा वजूद होता तो

यूँ तन्हा नहीं होता पर ..

फिर सोचता हूँ कि ये तन्हाई भी तो तुमने ही दी है ..

ज़िन्दगी के किसी भी साहिल पर अब तुम नज़र नहीं आती हो …

अक्सर मैं ये सोचता हूँ की तुम न मिली होती तो ज़िन्दगी कैसी होती .

अक्सर मैं ये सोचता हूँ कि तुम मिली ही क्यों ;

अक्सर मैं ये पूछता हूँ कि तुम क्यों जुदा हो गयी ?

अक्सर मैं बस अब उदास ही रहता हूँ

अक्सर अब मैं जिंदा रहने के सबब ढूंढता हूँ  ….

अक्सर……..

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