चलो ये माँ से ही पूछें

बलराम सिंह

बचपन से ही आदत बनी रहती है कि जहाँ कोई शंका रहती है तो माँ से पूछते हैं। मेरे मन में राइट्स और ड्यूटीज को लेकर द्वन्द्व कम से कम तीन दशकों से चल रहे हैं, तब से जब से हमारे यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेसाचुसेट्स सहयोगी और मित्र प्रोफेसर मधुसूदन झवेरी ने यह बताया था की भारतीय परंपरा में ड्यूटी का अधिक महत्व होता है,राइट्स का नहीं। हाल में ही मैंने यह सवाल आधे दर्जन मेरी जान पहचान की महिलाओं से पूछा, जोकि स्वयं माँ हैं। सवाल था कि आपके बच्चों के प्रति आपके राइट्स प्राथमिक हैं या ड्यूटीज। करीब ९७% राय मिली की ड्यूटी की प्राथमिकता है। अब हम देखते हैं कि आज के युग में सामाजिक व राजनितिक रूप में राइट्स और ड्यूटीज के क्या अर्थ व्यवहार में लाये जा रहे हैं। राइट और ड्यूटी को कई सन्दर्भों में देखा जा सकता है। उसमे एक सन्दर्भ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ’ह्यूमन राइट्स’ के रूप में मिलता है। ह्यूमन राइट एक पश्चिमी अवधारणा है जो पूरी तरह से अपनी संस्कृति और दर्शन में निहित है। यह स्पष्ट हो जाता है जब कोई भारतीय भाषाओं में शब्दों का अनुवाद करता है – ’ह्यूमन’ का उर्दू में आदमी और हिंदी में एव्ं कई भारतीय भाषाओं में ’मानव’ अनुवाद किया जा सकता है। सही या गलत के रूप में, वास्तव में, ’राइट’ का अर्थ है सही या उचित। इसलिए, यदि सही को सही या उचित के रूप में लिया जाता है, तो इसका अनुवाद आदमी सही या मानवोचित के रूप में किया जाएगा। हालांकि, ये बात दिलचस्प है कि ’ह्यूमन राइट’ का अधिकार के रूप में अनुवाद किया गया है, पर ऐसा अनुवाद विवादस्पद हो सकता है। अधिकार भारतीय ग्रंथों में एक बहुत अच्छी तरह से इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है, जोकि अधि + कार से बनता है। ’अधि’ का अर्थ सुपर या अत्यधिक है, और ’कार’ शब्द कार्य से लिया गया है, जिसका अर्थ है काम या काम करना। इस तरह मानवोचित और मानवधिकार दोनों ही ह्यूमन राइट्स की इच्छित परिभाषा या अर्थ को नहीं दर्शाते हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, “ह्यूमन राइट्स सभी मनुष्यों के लिए निहित राइट्स हैं, चाहे वे नस्ल, लिंग, राष्ट्रीयता, जातीयता, भाषा, धर्म या किसी अन्य स्थिति के क्यों न हों। ह्यूमन राइट्स में जीवन और फ्रीडम का राइट, दासता और यातना से मुक्ति, राय और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, काम और शिक्षा का राइट, और बहुत कुछ शामिल हैं।” (https://www.un.org/en/sections/issues-depth/human-rights/)। संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा राइट्स और फ्रीडम का मिश्रण है, लेकिन वास्तव में यहां राइट्स एंटाइटलमेन्ट्स से अधिक संदर्भित हैं। तथ्य की बात के रूप में, ह्यूमन राइट्स की संयुक्त राष्ट्र घोषणा के अनुच्छेद 2 में, यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “हर कोई इस तरह की घोषणा में उल्लिखित सभी राइट्स और फ्रीडम का हकदार है, बिना किसी प्रकार के भेद, जैसे नस्ल, रंग, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीतिक या अन्य राय, राष्ट्रीय या सामाजिक मूल, संपत्ति, जन्म या अन्य स्थिति।” (https://www.un.org/en/universal-declaration-human-rights/index.html)। अंग्रेजी में ’एंटाइटलमेन्ट’ का अर्थ है कानून द्वारा प्रदत्त राइट। स्मरण रहे कि एंटाइटलमेन्ट और कानून के अर्थ के लिए कोई समानार्थी शब्द हिंदी में नहीं हैं – क्योंकि एंटाइटलमेन्ट के लिए पात्रता और लॉ के लिए नियम आशयित/ उद्देश्यति तथा सांस्कृतिक अर्थ को नहीं दर्शाते हैं। इस प्रकार, परिभाषा के अनुसार ह्यूमन राइट मानववाद शब्द के सांस्कृतिक अर्थ को व्यक्त नहीं करता है, फिर भी ऐसी चेष्टा किसी और द्वारा नहीं, बल्कि भारत सरकार द्वारा ही की गई है (चित्र 1), जो कि पूर्णतया गलत है। ’मानवोचित’ शब्द शायद बेहतर होगा, लेकिन यह तभी भी एंटाइटलमेन्ट को नहीं दर्शा पाता है। उचित शब्द सामाजिक और राजनीतिक व्यवहार में सांस्कृतिक सहयोग के लिए महत्वपूर्ण हैं, जिसके लिए ह्यूमन राइट्स का मानव अधिकारों के रूप में अनुवाद स्पष्ट रूप से अपूर्ण प्रतीत होता है। अधिकार को भारतीय परंपरा से राइट का अनुवाद माना जाता है। परन्तु उसका आंकलन किसी एक सन्दर्भ विशेष में ही किया जा सकता है, जैसे कि वेदांत जैसे भारतीय मानक ग्रंथों में संदर्भित उपयोग से अर्थ सुनिश्चित किया जा सकता है। भगवद्गीता एक मानक वेदांत ग्रंथ है, और उसमे अधिकार जैसे शब्दों का प्रकरण अच्छी तरह से उद्धृत किये जाने से एक उचित व्याख्या की जा सकती है। भगवद्गीता में एक बहुत ही लोकप्रिय श्लोक है जो अधिकार का अर्थ समझाने में मदद कर सकता है। कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन | मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि || 2.47 || अनुवाद आपको अपने निर्धारित कर्तव्यों को निभाने का अधिकार है, लेकिन आप अपने कार्यों के फल के हकदार नहीं हैं। कभी भी अपने आप को अपनी गतिविधियों के परिणामों का कारण न समझें, न ही निष्क्रियता से जुड़े रहें। (संदर्भ स्वामी मुकुंदानंद – भगवद्गीता – भगवान का गीत, २०१४; https://www.holy-bhagavad-gita.org/chapter/2/verse/47) अधिकार का उपयोग किसी के निर्धारित कर्तव्यों के प्रदर्शन के संबंध में किया जाता है, इस शर्त के साथ कि परिणाम के लिए क्रेडिट भी न लें। करने का मात्र भाव होता है कि अमुक कार्य करणीय है। यह संयुक्त राष्ट्र घोषणा में ह्यूमन राइट्स (UN Declaration of Human Rights)के लिए प्रदान किए गए कानून द्वारा राइट्स से मूलतः भिन्न है। एंटाइटलमेंट का अर्थ यदि पात्रता के रूप में भी लें तो इसका आशय कुछ और निकलता है। हितोपदेश (स्रोत: हितोपदेश 6) में उद्धरित निम्नलिखित श्लोक को संदर्भित करने से पात्रता के अर्थ का वास्तविक आत्मबोध होता है।: विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्। पात्रत्वाद् धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥ अर्थात विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म, और धर्म से सुख प्राप्त होता है। अंत में, जब किसी को कानूनन एंटाइटलमेंट की व्याख्या करने के लिए कानून के अर्थ पर विचार किया जाय, तो यह फिर से भारतीय संस्कृति पर आधारित तात्पर्य और यूनाइटेड नेशंस के घोषणा में दिए गए उद्देश्य में भिन्नता दृष्टिगोचर होती है। जॉन ऑस्टिन के अनुसार, कानून “एक संप्रभु या शासक का आदेश है, जो कि उसके प्रतिबंधों की धमकी से समर्थित होता है, जिनके लिए लोगों को आज्ञाकारिता की आदत पड़ जाती है” (… law “commands, backed by threat of sanctions, from a sovereign, to whom people have a habit of obedience”) (विकिपीडिया)। इसमें शीर्ष संचालित दृष्टिकोण की प्रचुरता है, जबकि भारतीय अनुवाद में कानून के लिए इस्तेमाल किया गया शब्द है नियम। इस तरह ’कानून’ शब्द का पूरी तरह से अलग अर्थ और संदर्भ है, जैसा कि पतंजलि योगसूत्र में प्रस्तुत किया गया है। शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः॥२.३२॥ अर्थात नियम में सौच (पवित्रता), संतोष (संतोष और शांति), तपस (आध्यात्मिक जुनून और आग), स्वाध्याय (स्वाध्याय और निपुणता), और इश्वर प्राणधन (बीइंग की सार्वभौमिक महान अखंडता के लिए समर्पण) शामिल हैं। (http://www.integralyogastudio.com/ysp/ysp-alex-bailey-long.pdf)। जहाँ कानून एक शासक की इच्छाओं के अनुरूप कार्य करने की प्रणाली को प्रतिपादित करता है, वहीँ पर नियम इसके विपरीत है, जिसमे कि व्यक्ति इसे स्वयं सूत्रपात करके स्थापित करता है। पश्चिमी सभ्यता के अपने रिलीजियस दृष्टिकोण में भी व्यक्ति स्वयं से परे सत्ता से ग्रस्त है, जहां गॉड कोई है जो आम लोगों के पहुंच से बाहर बैठता है, उससे संपर्क के लिए पैगंबर या पादरी जैसे बिचौलिये की आवश्यकता होती है। बाइबल के दस कमांडमेंट्स (हुक्मनामे) उस सत्ता या गॉड द्वारा जारी किये गए हैं, और सभी को मोक्ष पाने के लिए उनका पालन करना चाहिए। जबकि धर्म संबंधी परिकल्पना में ’अहम् ब्रह्मास्मि’ की अवधारणा है, जिसमे आत्म तत्त्व सर्वोच्च है, और इस प्रकार स्वयं पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, चाहे वो राइट को अधिकार के रूप में, एंटाइटलमेंट को पात्रता के रूप में, या कि कानून को नियम के रूप में। उन सभी में स्वयं की पहल को महत्त्व दिया जाता है, स्वतः अभ्यास, और आत्म योग्यता को कर्म के एक तटस्थ परिणाम के रूप में माना जाता है। यह दृष्टिकोण लोगों को स्वतंत्रता प्रदान करता है, ऐसा कुछ जो कि संयुक्त राष्ट्र के ह्यूमन राइट्स की घोषणा में केवल आधे मन से स्वीकार किया जाता है। धर्म और कर्म दृष्टिकोण के एक अधिक मजबूत परीक्षण व विश्लेषण से राइट्स (अथवा अधिकारों) की पाश्चात्य लक्षित अवधारणाओं को चुनौती देने की आवश्यकता है, क्योंकि ऐसी अवधारणाएं वास्तव में लोगों के बीच सहयोग के स्थान पर टकराव अधिक उत्पन्न करती हैं। भारतीय परंपरा में माँ को ईश्वर का स्थान दिया गया है, अतः उसके विचार और उत्तर से पता चलता है कि कर्तव्य पालन से जो अधिकार बनता है, वह क़ानूनी राइट से कहीं अधिक उपयोगी है। ऐसी मातृ शक्ति को मातृ दिवस पर शत शत नमन करना चाहिए।

2 thoughts on “चलो ये माँ से ही पूछें

  1. बहुत ही बढ़िया लेख है। सभी को पढ़ना चाहिए। आज हर कोई अधिकार की बात करता है, लेकिन कर्तव्य की बात कम की जाती है। इसके साथ ही अधिकार और right में अंतर पता होना आवश्यक है। प्रोफेसर बलराम सिंह ने बहुत सटीक बात कही है। कुछ ऐसी बातें भी हैं, जो मैंने पहले कभी सुनी या पढ़ी नहीं है।

  2. A nice observation on rights and responsibilities. A thin differenence between Rights and Right, needs to be elaborated for common readers where two conotations are quite different. The references from western and indoligical works are properly mended in between. Thanks to Prof. Singh ji for a quality based educational reading article.

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