वीरेन्द्र सिंह परिहार 

जैसे कि प्रत्याशा थी, कुछ उसी तरह सरकारी लोकपाल बिल जनता के सामने आया, वह कम से कम ऐसा लोकपाल तो नही है, जैसा सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधि चाहते थे। अब इस लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री एवं न्यायपालिका नही होगी,जबकि सिविल सोसाइटी का पूरा आग्रह इस बात को लेकर था कि प्रधानमंत्री एवं न्यायपालिका को भी लोकपाल के दायरे में होना चाहिए। न्यायपालिका के लिए सरकार का कहना है कि उसके लिए जजेज स्टैण्डर्ड एण्ड एकाउन्टिबिलटी बिल लाया जा रहा है। इसके लिए भी सिविल सोसाइटी को आपत्ति है, कि जजों की जॉच जज ही करेगे। लेकिन प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे में क्यो नही? इसको लेकर तरह-तरह के तर्क है। कांग्रेस के प्रवक्ता शकील अमहद का कहना है कि ऐसा बिल एन.डी.ए. शासन में क्यो नही पारित किया गया? ठीक वैसे ही जैसे आतंकवाद या भ्रष्टाचार के मामले में यह कह दिया जाता है कि एन.डी.ए. शासन काल में भी कुछ ऐसा था। एक संविधान विशेषज्ञ का कहना है-प्रधानमंत्री सिर्फ लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है। यदि इस बात को मान लिया जावें तो इस तरह से तो मुख्यमंत्री भी विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है। फिर उन्हे लोकायुक्त की परिधि में क्यो होना चाहिए? गौर करने का विषय है कि यदि कर्नाटक के मुख्यमंत्री लोकायुक्त की परिधि में न होते तो आज उनके विरूद्ध अवैध-उत्खनन को लेकर क्या लोकायुक्त की कोई जॉच रिपोर्ट होती? इतना ही नही वह पूर्ववत अपनी कुर्सी पर जमें रहते।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि जहां तक प्रधानमंत्री का लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होने का प्रश्न है, उसके मायने सिर्फ इतने ही है, कि प्रधानमंत्री अपनी कुर्सी पर तभी तक रह सकता है, जब तक लोकसभा में उसका बहुमत रहेगा। यदि वह कोई अपराध करता है, भ्रष्टाचार करता है, घोटाले करता है, ऐसी स्थिति मेें जो कानून देश के आम आदमी पर लागू है, वह उस पर भी लागू है। एक पुलिस का इस्पेक्टर एक आयकर का इस्पेक्टर या सी.बी.आई. सभी प्रधानमंत्री के विरूद्ध जॉच कर सकते है। फिर भी यह सब प्रधानमंत्री की जॉच इसलिए निष्पक्षता से नही कर सकते कि यह सब प्रधानमंत्री के अधीन है। निःसन्देह कोई स्वतंत्र संस्था ही प्रधानमंत्री के विरूद्ध आरोपो पर जॉच कर सकती है, और उसका समुचित विकल्प एकमात्र लोकपाल है। लेकिन प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में न लाकर उसे आधा-अधूरा यूं ही बना दिया गया है। आखिर में प्रधानमंत्री सत्ता का केन्द्र होता है, वह किसी भी मंत्रालय के संबंध में कोई आदेश दे सकता है, और इस तरह से सत्ता का दुरूपयोग कर सकता है। किसी ने कहा कि प्रधानमंत्री की जॉच संसदीय समिति करेगी। पहली चीज तो यह कि संसदीय समिति तभी बनेगी, जब सरकार चाहेगी, 2 जी स्पेक्ट्रम पर बनी संसदीय जॉच कमेटी इसका उदाहरण है। दूसरी बात यह कि वह संसदीय समिति कितनी निष्पक्षता से जॉच करती है-यह सभी ने बोफोर्स प्रकरण और नोट के बदले वोट-काण्ड दोनों में ही देखा है, इस संसदीय समिति कोे कोई साक्ष्य ही नही मिलते है। हकीकत यह है कि इस दलबंदी के घनचक्कर में केाई संसदीय समिति कैसे जॉच कर सकती है? क्योकि संसदीय समिति में बहुमत सत्तारूढ़ दल के लोगों या गठबंधन का रहता है। ऐसी समिति अपने प्रधानमंत्री के विरूद्ध कैसे जॉच करेगी? क्योकि इन सांसदों को आखिर में राजनीति करनी है, चुनाव लड़ने के टिकट चाहिए, मंत्री पद चाहिए या दूसरे लाभ चाहिए। ऐसी स्थिति में किसी प्रधानमंत्री के विरूद्ध निष्पक्ष जॉच कैसे संभव है? इस मामले में सबसे बड़ी व्यावहारिक कठिनाई यह है कि प्रधानमंत्री और सांसद अलग है-ही नही। प्रधानमंत्री संसद का नेता हेाता है, और अपने नेता के विरूद्ध कोई संस्था कैसे जॉच कर सकती है? यह कार्य तो कोई स्वतंत्र संस्था ही कर सकती है।

दूसरी उल्लेखनीय बात यह है कि संसद-सदस्यों के सदन के भीतर के आचरण को भी लोकपाल के दायरे में नही रखा गया है। जबकि सिविल सोसाइटी के नुमाइन्दे चाहते थे कि प्रधानमंत्री के साथ सांसदों का आचरण भी लोकपाल के दायरे मंें हो, इसके उचित कारण भी थे। 1993 में नरसिंह राव सरकार के अविश्वास प्रस्ताव के विरोध में झामूमो के पॉच सांसदों और अजीत सिंह के लोकदल के सांसदों ने पॉच-पॉच लाख रूपयें लेकर अविश्वास प्रस्ताव के विरोध में वोट देकर नरसिंह राव सरकार को बचाया था। जुलाई 2008 में मनमोहन सरकार के विश्वास प्रस्ताव में विपक्ष के दर्जनों से ज्यादा सांसदों को खरीद कर मनमोहन सरकार बचाई गई थी। अब ऐसे भ्रष्ट-कृत्यों से सांसदों को विरत करने के लिए यह आवश्यक था कि सांसदों के सदन के भीतर के भ्रष्ट-कृत्य भी लोकपाल के दायरे में होते। इसके साथ ही यह सभी को पता है कि वर्ष 2006 में 11 सांसद पैसे लेकर प्रश्न पूंछने के बदले संसद-सदस्यता से बर्खास्त किए जा चुके है। अब यदि सरकार सांसदो के सदन के भीतर के आचरण को लोकपाल के दायरे में नही रख रही है, तो इसका अर्थ तो यही निकाला जाना चाहिए कि वह सांसदों को खरीद-फरोख्त एवं उनकी भ्रष्ट कारनामों को अपने निहित-स्वार्थो के चलते होने देना चाहती है। अब जब देश की सबसे बड़ी जन-प्रतिनिधि संस्था संदेह के दायरे में होगी तो देश भ्रष्टाचार से कैसे मुक्त होगा? समझा जा सकता है।

एक अहम बात यह भी कि लोकपाल की नियुक्ति जो नौ लोग करेगें, उसमें पॉच सरकारी पक्ष के लोग होगें। अब ऐसी स्थिति में लोगों में ऐसी आंशंका होना स्वाभाविक है कि सी.बी.सी. मामले की तरह थामस प्रकरण न दुहराया जावें। सिविल सोसाइटी की मॉग के अनुरूप सी.बी.आई.और दूसरी जॉच एजेन्सियॉ भी लोकपाल के अधीन नही होगी। कहां जा रहा है कि जरूरत पड़ने पर लोकपाल इनकी सेवाएं ले सकता है। अहम बात यह कि सी.बी.आई यदि लोकपाल के अधीन नही हो तो फिर उसके आदेशों का कितनी निष्ठा से पालन करेगी। फिर काम के बोझ का बहाना तो है-ही। सबसे बड़ी बात सी.बी.आई का दुरूपयोग का प्रश्न जस का तस बना रहेगा।

वैसे यह भी सच है कि सरकार ने जो कुछ इस दिशा में किया है, सिविल सोसाइटी के दबाब में ही किया है। वरना वह तो लोकपाल को स्वतः जॉच एवं अभियोजन का अधिकार भी नही देना चाहती थी। अब ऐसी स्थिति में अन्ना हजारे ने 16 अगस्त से जंतर-मंतर पर आमरण अनशन पर बैठने की घोषणा तो कर ही दी है। इसका अंजाम क्या होगा? संभवतः सरकार को इसका पता नही होगा। लोगों को पता है कि केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के निर्वाचन क्षेत्र चॉदनी चौक में जब जनमत संग्रह की दृष्टि से सिविल सोसाइटी के नुमाइन्दें गए तब आमजन ने सिर्फ उनका स्वागत ही नही किया, बल्कि बतौर कार्यकर्ता इस कार्य के लिए घरों से निकल पड़ें। इतना ही नही उपरोक्त जनमत संग्रह के नतीजों में 85 प्रतिशत से ज्यादा लोगों ने सिविल सोसाइटी के जन लोकपाल के पक्ष में मत दिया। कई प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया द्वारा कराए गए जनमत संग्रह के नतीजे भी कुछ ऐसे ही है। दिल्ली के जंतर-मंतर में 7 अगस्त को और मुम्बई में 9 अगस्त को अन्ना हजारे की सभा में इस मुद्दे को लेकर जो जन-सैलाब उमड़ा-उससे यह समझा जा सकता है कि इस देश की जनता अब इस मुद्दे पर सरकार से निर्णायक लडाई लड़ने को तैयार है। उसमे सरकार को यह पता होना चाहिए कि लोकपाल का प्रश्न इस देश के जन-जन के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन चुका है। वस्तुतः अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने उन्हे ऐसी सोच से लैस कर दिया है कि वह इस भ्रष्ट-व्यवस्था को झेलने को अब तैयार नही है। फ्रंास के एक प्रसिद्ध दार्शनिक जीन जैवक्स रूसों ने कभी कहा था-‘‘जनवाणी-देववाणी है’’। बेहतर है कि सरकार इस जनवाणी का एहसास कर सके, और ऐसा लोकपाल गठित करे जो भ्रष्टाचार को जड़-मूल से उच्छेदित कर सके। वरना यदि इतिहास से नही सीखना है, तो इतिहास दुहराने को तो तैयार रहना ही पडे़गा।

(लेखक प्रसिद्ध स्तंभकार है)

1 thought on “जनवाणी-देववाणी

  1. हम शासक है,
    हम ही बिल लाएंगे,
    उसे “लोकपाल” बिल कहेंगे|
    जो हम शासक हमारे हितमें करेंगे,
    उसे जन तंत्र कह देंगे,
    बस हो गया|
    हम जो भी हमारे हितमें करेंगे,
    उसे लोगों के हितमें कानुनसे माना जायगा|
    kyaa, अन्ना को उत्तर चाहिए ?
    अब अन्ना को उत्तर देने, —
    मैडम तो बहार गयी है,
    किससे हुकम लूं?
    ………………………….
    ” अबे बुद्धू ऐसा बिल “शासक पाल बिल” या
    “भ्रष्टाचार पाल बिल” होगा|
    ====तू ही गुनहगार और तू ही जज?
    वाह वाह, वाह|
    कभी पगड़ी के निचे भी झाँक कर देख कि अन्दर कुछ है भी, या नहीं?
    क्या?
    वहां सब कुछ खाली खाली?
    झट पगड़ी बाँध, कोई जान न जाए|

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