लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

Posted On by &filed under Uncategorized.


prabhash joshi jiप्रभाष जोशी का अचानक ऐसे चला जाना उन लोगों के लिए दुखद घटना है जो पत्रकारिता को मिशन की तरह लेते थे और वैसा व्यवहार भी करते थे। जोशी जी के जाने के वाद अब लम्बे समय तक दूसरा प्रभाष जोशी पैदा नहीं होगा। राजेंद्र माथुर जी के जाने के बाद प्रभाष जोशी ने उनके रिक्त स्थान को जैसे भर दिया था। एक नए तेवर, नई दृष्टि के साथ हिंदी पत्रकारिता को उन्होंने एक ऐसा मोड़ दिया, जैसा पहले किसी ने नहीं दिया था। जनसत्ता के साथ जोशी जी के संपादकत्व में जैसे हिंदी पत्रकारिता में एक नये युग की शुरुआत हुई थी। (आज जो जनसत्ता है, मैं उसकी बात नहीं कर रहा, लेकिन) उस दौर में उन्होंने इस अखबार के माध्यम से हिंदी पत्रकारिता को एक साहस दिया, एक नई प्रतिरोधी-भाषा दी. समाचार, विचार किस तरह से प्रस्तुत किस तरह प्रस्तुत जाएँ, इसको बताने-समझाने का काम प्रभाष जी ने किया। वे साहित्यकार तो नहीं थे, लेकिन उनकी भाषा में लालित्य था। ललित निबंध जैसे लगते थे उनके वैचारिक लेख। उनके लेखों में रस नि:सृत होता था। गहन अध्ययन भी झलकता था। उनमें साफगोई भी थी। जोशी जी किसी के सामने नहीं झुके। प्रबंधन के सामने भी नहीं। अपनी शर्तों पर काम किया, वरना अब तो अनेक संपादक केवल मालिकों की पालकी ढोने का ही काम करते हैं। अब जोशी जी के जाने के बाद कहार किस्म के पत्रकार शायद खुश हो जाएँ, लेकिन हिंदी पत्रकारिता को मिशन मान कर चलने वाले पत्रकारों की आँखों में आँसू हैं क्योंकि अब अखबारों से जुड़े पत्रकार तो हजारों हैं लेकिन जोशी जी जैसा संपादक कोई नहीं है।

जोशीजी देश-विदेश का भ्रमण करते रहते थे। पत्रकारिता या वैचारित मुद्दों से जुड़े हर बड़े आयोजनों में उनकी उपस्तिति अनिवार्य-सी हो जाती थी। आयोजन की गरिमा बढ़ानी हो तो लोग प्रभाष जी को बुलाया करते थे। वे अनेक बार रायपुर के आयोजनों में आए। हर बार उनके विचारों से हमें प्रेरणा ही मिली। मंच पर सत्ताधीशों के साथ भी ने बैैठते रहे लेकिन किसी का उन्होंने गुणानुवाद नहीं किया। जो अच्छा लगा, वही कहा। अनेक मौकों पर उन्होंने व्यवस्था की आलोचना भी की। पत्रकारिता की दिशा क्या हो, इस पर वे हम लोगों से बातें करते रहते थे। मेरा अपना सौभाग्य है कि जब मैंने पत्रकारिता की विसंगतियों पर अपना पहला (बहुचर्चित मगर विवादस्पद बना दिया गया) उपन्यास मिठलबरा की आत्मकथा लिखा और वह छपा तो मैंने अपने स्वभाव के ठीक विपरीत काम करते हुए एक प्रति प्रभाष जी को भी दी थी। वे किसी कार्यक्रम में शामिल होने रायपुर आये थे. हालांकि पुस्तक देने के बाद मैं यही सोचता रहा कि पता नहीं वे उपन्यास पढ़ते भी हैं या नहीं। बेकार ही दे दिया. खैर, कुछ महीनों बाद प्रभाष जी दुबारा रायपुर आए तो मैं भी उनको सुनने गया। गोष्ठी शुरू होने में वक्त था. लोग उनसे मिल रहे थे लेकिन मैं अपनी जगह बैठा रहा। किसी दंभ के कारण नहीं, बस इसी स्वाभिमानी भावना के तहत कि होंगे प्रभाष जी अपनी जगह, मुझे क्या… अब इनसे क्या मिलना जो एक लेखक की कृति का सम्मान ही न कर सकें, उस पर कोई प्रतिक्रिया ही न दे।

मैं यथास्थान बैठा ही रहा और अपने किसी परिचित से बतियाता रहा, तभी देखा, कि प्रभाष जी तो हाथ जोड़े मेरी ओर ही चले आ रहे हैं। वे मुझे देख कर मुसकरा भी रहे थे। शायद वे मेरे मनोभावों को भी पढ़ चुके हों। वे जब बिल्कुल मेरे पास ही पहुँच गए तो मैं हड़बड़ा कर उठा और नमस्कार किया। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- ”मैंने आपका उपन्यास पढ़ लिया है। भई, ‘मिठलबरा’ शब्द मुझे बहुत पसंद आया। इस उपन्यास पर मैं कुछ लिखना चाहता था, लेकिन लिख नहीं पाया। कभी मौका मिला तो लिखूँगा, वैसे मिठलबरा शब्द का मैंने अनेक लोगों से जिक्र किया है।”

जोशी जी की इतनी बात सुन कर मुझे परम संतोष हुआ। उनकी बातें सुन कर मेरा यह भ्रम तो टूटा कि उन्होंने मेरे उपन्यास को पढ़ा ही नहीं होगा। प्रभाष जोशी जैसा व्यक्तित्व किसी कनिष्ठ पत्रकार की कृति को सराहे तो यह उसके लिए गर्व की बात होगी ही। प्रभाष जी से जुड़ा यह अनुभव मैं कभी भूल नहीं सकता। आज जब वे नहीं रहे तो यह घटना बरबस ही याद आ गई।

अभी पिछले दिनों वे एक विवाद में फँसे, जिस कारण मैं भी उनसे नाराज था। उन्होंने सती प्रथा का महिमा मंडन किया था। यह बात उनके तेवर से मेल नहीं खाती थी। फिर मैंने विश्लेषण किया तो बात समझ में आई कि उन्होंने उस मानसिकता को सराहा था, जो पति के साथ लम्बे समय तक रहने के कारण एक पत्नी की बन ही जाती है। रायपुर का ही एक हादसा है। एक महिला अस्पताल में भरती अपने पति मृत्यु के बाद इतनी विचलित हो गई, कि उसने पास ही स्थित एक तालाब में कूद कर अपनी जान दे दी। यह भी एक किस्म का सती होना ही है। वह अपने पति से बहुत स्नेह करती थी। जब पति न रहा तो उसे अपना जीवन भी निस्सार लगा। सती होने के पीछ इस भावना को समझने की जरूरत है और इस भावना का सम्मान भी किया जाना चाहिए। ऐसे दौर में जब किसी के मर जाने से किसी को फर्क नहीं पड़ता। ऐसे दौर में कोई नारी पति के वियोग में जान दे दे, यह बड़ी प्रेरक घटना है, उन महिलाओं के लिए जो पति से गद्दारी करती हैं, या व्यभिचार करती घूमती रहती हैं। जोशी जी ने के मन में सती प्रथा का महिमा-मंडन नहीं था, वरन वे उस भावना का आदर कर रहे थे, जो अब कुछ तथाकथित आधुनिक किस्म की औरतों में नजर नहीं आती। जोशीजी की आलोचना हुई लेकिन वे उन्होंने परवाह नहीं की। जो लिख दिया सो लिख दिया।

जोशीजी पत्रकारिता में प्रगतिशील मूल्यों के संवाहक थे। वे बिल्कुल दकियानूस नहीं थे। बेशक वे धोती-कुरता पहनते थे, लेकिन इसके बावजूद वे -वैचारिक स्तर पर- सूट-बूट में रहने वाले पत्रकारों की भी छुट्टी कर देते थे। समाजवादी सोच के थे। विनोबा और जयप्रकाश नारायण जैसे महान लोगों के साथ काम करने के कारण उन्होंने पत्रकारिता को समाजवादी चिंतन से लबरेज किया।

वे प्रखर गाँधीवादी चिन्तक- संपादक थे। इसमें दो राय नहीं कि उनके जाने के बाद रचनात्मक पत्रकारिता का एक पुरोधा चला गया। यह एक युगांत भी है। ऐसे युगांत जो दुबारा नहीं आने वाला। बस उनका लेखन ही हमारे सामने रहेगा। आने वाली पीढ़ी अगर पत्रकारिता के चरित्र को उज्ज्वल बनाए रखना चाहती है, सचमुच पत्रकारिता करना चाहती है, तो वह प्रभाष जोशी के रास्ते पर चले। पत्रकार केवल सामाजिक विषयों पर ही न लिखे, वह खेल, विज्ञान आदि अन्य विषयों पर भी पढ़े और लिखे। प्रभाषजी यही करते थे। जितना अच्छा वे किसी राजनीतिक-सामाजिक विषय पर लिखते थे, उससे बेहतर भाषा में वे क्रिकेट पर भी लिखते थे। हिंदी के सुधी पाठक उनके इस शीर्षक को आज तक याद करते हैं, कि ”जब तक सूरज-चाँद रहेगा, अजहर तेरा नाम रहेगा”। उनके अनेक लेखों ने यह भी स्थापित किया कि खेल पर लिखने के लिए एक यांत्रिक भाषा की ही जरूरत नहीं है, उसे हम बेहद अनौपचारिक भाषा में भी लिख सकते हैं। प्रभाष जी के जाने से हिंदी पत्रकारिता की जो क्षति पहुँची है, उसकी भरपाई पता नहीं कब होगी। फिलहाल मैं उनको अपनी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि देकर उनकी आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हुए इतना ही सह सकता हूँ कि जब-तक सूरज चाँद रहेगा,

प्रभाष जोशी का नाम रहेगा।

3 Responses to “जब-तक सूरज चाँद रहेगा, प्रभाष जोशी का नाम रहेगा – गिरीश पंकज”

  1. rakesh upadhyay

    प्रभाषजी का जाना बहुत दुःखदायी रहा. वे प्रकाशस्तंभ थे, अंधेरे में भी पूरी हनक और चमक के साथ जलने वाले, उनके जैसों की पत्रकारिता को बहुत जरूरत है.. इससे फर्क नहीं पडता कि वे किस विचार-पंथ की ओर ज्यादा झुकाव रखते थे.. मूल बात तो यही है कि वे हर पंथ के पत्रकार को अपने साथ रख पाने में सफल थे..खासियत यह कि उसे पत्रकारिता की मूल सत्यनिष्ठा से डिगने नहीं देते थे..अब ने कभी प्रत्यक्ष नहीं दिखेंगे लेकिन उनका जीवन सदा ही जीवित रहेगा…
    कौन पत्रकार होगा जो आपके मिठलबरा का संज्ञान नहीं लेगा..आपकी रचना कालजयी है..समय के माथे पर एक सटीक हस्ताक्षर…मैंने थोडा ही पढा है लेकिन जितना पढा वह ये बताने के लिए पर्याप्त है कि आपके अंदर नाचिकेत अग्नि है।..

    Reply
  2. Vibhash kumar Jha

    गिरीश् जी आप् का लेख् प्रभाश् जी पर् बहुत् ही सार्थक् है और् यह् बात् भी सत्य् है कि प्रभाश् जी की तरह् लिख्नने वाला पत्रकार् अब् शायद् ही कभी देख्नने कॊ मिलेगा. आपकी तरह् मेरे भी कुछ् अनुभव् उन्से सम्बन्धित् है. जल्द् ही उन्कॊ यहान् लिख्कर् भेजुगा .मेरी तरफ् से भी प्रभाश् जी कॊ विनम्र् श्रन्धाजली देना चाह्ता हू .
    विभाश् कुमार् झा रायपुर्

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *