दलित समाज के शोषण का हथियार अनुच्छेद 35 ए

डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

जम्मू कश्मीर के संविधान में धारा छह वहाँ के स्थाई निवासी को पारिभाषित करती है । भारत का वही नागरिक वहाँ का स्थाई निवासी बन सकता है जो या तो 1954 में वहाँ का स्थाई निवासी हो या फिर उसके पूर्वज 1944 से वहाँ रह रहेलहैं और उनके पास राज्य में अचल सम्पत्ति हो । वहाँ का स्थाई निवासी ही राज्य में ज़मीन ख़रीद सकता है , नौकरी पा सकता है , शिक्षा संस्थानों में दाख़िल हो सकता है , विधान सभा के लिए चुनाव लड़ सकता है या फिर उस चुनाव में मतदान कर सकता है । उससे भी बडी  बात है कि जम्मू कश्मीर की कार्यपालिका ने ही भारत के संविधान में एक नया अनुच्छेद 35 A डाल दिया है , जिसकी ख़बर भारतीय संसद को भी नहीं लगने दी । इस नए अनुच्छेद में यह व्यवस्था कर ली कि स्थाई निवासी को लेकर जम्मू कश्मीर सरकार जो भी क़ानून बनाएगी , चाहे वह संविधान के विपरीत ही क्यों न हो , उसे असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकेगा । सरकार का कहना था कि जम्मू कश्मीर ख़ास राज्य है , इसलिए उससे सामान्य तरीक़े से व्यवहार नहीं किया जा सकता । ख़ास क्यों है ? क्योंकि यह मुस्लिम बहुल है । लेकिन यह पूरी घेराबन्दी करने पर जम्मू कश्मीर सरकार ने स्थाई निवासी की परिभाषा और अवधारणा का इस्तेमाल  दलित समाज के शोषण व दमन के लिए शुरु किया । राज्य सरकार के सामने बड़ा प्रश्न था कि राज्य में शौचालयों और अन्य सफ़ाई से जुड़े काम कौन करेगा ? लेकिन इसका इलाज भी उसने सोच रखा था ।  जैसे ही 1957 में जम्मू कश्मीर में नया संविधान लागू हुआ , राज्य सरकार ने पंजाब के बाल्मीकि समाज पर डेरे डालने शुरु कर दिए कि वे जम्मू कश्मीर में आएँ , वहाँ उनके लिए नौकरी और शिक्षा के बेहतर अवसर उपलब्ध हैं । बाल्मीकि समाज क्या , पंजाब का बच्चा बच्चा तब तक जान गया था कि राज्य में बेहतर अवसर तो क्या किसी भी नागरिक को उपलब्ध होने वाले सामान्य अधिकार भी उपलब्ध नहीं हैं । स्थाई निवासी का प्रमाण पत्र न होने कोई सारी उम्र जम्मू कश्मीर में गुज़ार दे , तब भी कोई अवसर उसके नज़दीक़ नहीं फटकेगा । लेकिन राज्य सरकार को तो सफ़ाई के लिए स्वीपर हर हालत में चाहिए थे । इसलिए उसे पंजाब के बाल्मीकि समाज को सब्ज़ बाग़ दिखाने थे । उसने पंजाब के दो सौ बाल्मीकि परिवारों को लालच दिया कि यदि वे रियासत में आकर सफ़ाई से जुड़े काम करने के लिए तैयार हैं तो उन्हें राज्य के स्थाई निवासी का प्रमाण पत्र और अन्य सभी सुविधाएँ प्रदान की जाएँगी । राज्य सरकार स्वयं भी जानती थी कि यह काम वह राज्य के संविधान में बिना संशोधन किए नहीं कर सकती । लेकिन सरकार ने पंजाब के अनुसूचित जाति के बाल्मीकियों को धोखे से रियासत में बुला लिया । आश्चर्य है यह निर्णय भी वहाँ के मंत्रिमंडल ने लिया । इन बाल्मीकियों को स्वीपर के काम में लगा दिया गया । यह ठीक है कि उन्हें सरकार ने स्थाई निवासी के प्रमाण पत्र भी जारी कर दिए । लेकिन उन्हें स्थाई निवासी के जो प्रमाण पत्र जारी किए गए उन पर दर्ज कर दिया गया कि वे केवल स्वीपर के नाते काम करने के लिए ही योग्य होंगे । आज छह दशक बाद , जब उन परिवारों की संख्या भी बढ़ गई है , उनके बच्चे पढ़ लिख गए हैं लेकिन नौकरी के नाम पर वे केवल स्वीपर ही लग सकते हैं । वे राज्य में ज़मीन नहीं ले सकते और उनके बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए राज्य से बाहर जाना पड़ता है । यदि मान भी लिया जाए कि संविधान राज्य सरकार को स्थाई निवासियों के वर्ग बनाने का अधिकार देता है तो क्या राज्य सरकार को यह अधिकार भी देता है कि स्थाई निवासी का एक वर्ग केवल स्वीपर का काम ही कर सकता है ? कोई भी सरकार , चाहे वह कितनी भी ख़ास क्यों न हो यह कैसे कह सकती है कि उसके राज्य में बाल्मीकि समाज केवल स्वीपर का ही काम कर सकता है ? चाहे वह कितना भी पढ़ जाए , लेकिन जम्मू कश्मीर सरकार उसे केवल स्वीपर के काम के योग्य ही समझती है । इसी का विरोध करते हुए तो बाबा साहिब भीमराव आम्बेडकर सारी आयु संघर्ष करते रहे । उन्होंने दलित समाज के लिए ही कुछ विशेष काम नियत किए गए हैं ,लइसकोलकभी स्वीकार नहीं किया । आम्बेडकर का कहना था कि किसी भी व्यक्ति को अपनी योग्यता और रुचि के अनुसार काम चुनने का अधिकार होना चाहिए । लेकिन जम्मू कश्मीर सरकार ने पंजाब के हज़ारों बाल्मीकियों को एक प्रकार से बन्धक बना रखा है और उन पर स्वीपर का काम बलपूर्वक लाद रही है ।  भारत के संविधान के अनुसार तो यह अपराध की श्रेणी में माना जाएगा । इसका अर्थ तो यह हुआ कि जम्मू कश्मीर सरकार स्थाई निवासी प्रमाण पत्र के नाम पर स्थाई निवासियों से ही भेदभाव नहीं कर रही बल्कि वह जाति के आधार पर भी भेदभाव कर रही है ।
जब पाकिस्तान बना था तो वहाँ की सरकार दलित हिन्दुओं को भारत आने से रोक रही थी । उसकी दलील थी कि इनके चले जाने से पाकिस्तान के नगरों में सफाई का काम कौन करेगा ? तब बाबा साहिब आम्बेडकर ने दलित समाज के लोगों से अपील की थी कि वे किसी भी स्थिति में पाकिस्तान में न ठहरें और भारत आ जाएँ । उन्होंने तो यह भी कहा था कि उनमें से यदि कुछ को ज़बरदस्ती मुसलमान भी बना लिया गया है तो वे चिन्ता न करें और आ जाएँ , उन्हें स्वयं ही शुद्ध कर लिया जाएगा । बाबा साहिब ने पंडित जवाहर लाल नेहरु को भी पत्र लिखा था कि वे दलित समाज को पाकिस्तान से वापिस लाने की व्यवस्था करें क्योंकि दलित समाज केवल सफ़ाई कर्मचारियों का काम करने के लिये नहीं है । आम्बेडकर तो क्या पता था कि उनके आँखें मूँदते ही , जवाहर लाल नेहरु के सक्रिय मार्गदर्शन में ही चलने वाली जम्मू कश्मीर सरकार बाल्मीकियों को धोखे से बुला कर दशकों के लिए केवल स्वीपर का ही काम करने के लिए बाध्य कर देगी । इन प्रकार के अन्यायों के ख़िलाफ़ जब कोई ऊँगली उठाता है तो उसके पेट में अनुच्छेद 35 A की कटार राज्य सरकार घोंप देती है ।

1 thought on “दलित समाज के शोषण का हथियार अनुच्छेद 35 ए

  1. इस पर विडंबना यह है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आज इक्कीसवीं सदी में भी दलितों को लेकर राजनीति खेलने से परहेज नहीं करती और कांग्रेस के अनुयायी अर्ध-बुद्धिजीवी दलित-डंडे से प्रधान-मंत्री मोदी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय शासन को ही पीटे जा रहे हैं| दलित हो या कि पिछड़ी जातियों से कोई भी हो उसे इक्कीसवीं सदी के भारत में, धर्मावलम्बियों द्वारा नहीं बल्कि उपयुक्त विधि व्यवस्था के अंतर्गत शासन द्वारा सामान्य नागरिक का दर्जा देना होगा ताकि वह समाज में सम्मान व आत्म-विश्वास से जीवन-यापन कर सके|

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