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    Homeसाहित्‍यकविताबूढ़ा पेड़ बरगद का

    बूढ़ा पेड़ बरगद का


    तल्खियां मौसम की,
    हवाओं के थपेड़े,
    जाने और क्या – क्या
    सहा उसने
    मगर रिश्ता कमजोर
    नहीं पड़ने दिया
    धरती से अपना!

    ज्यों – ज्यों
    उम्रदराज हुआ
    रिश्ता और भी
    आगाध हुआ
    उनका!

    हर मुसीबत को सह गया
    पर धरती को
    अपने आलिंगन से
    मुक्त ना होने दिया
    उसने!

    यही वज़ह है शायद…
    आज भी मुस्कुरा रहा है
    मेरे गांव में बूढ़ा पेड़
    बरगद का!

    आशीष “मोहन”

    लिमटी खरे
    लिमटी खरेhttps://limtykhare.blogspot.com
    हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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