राजनीतिक  असंवेदनशीलता का परिणाम है प्रदूषण

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-ललित गर्ग-

दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में पराली एवं वायु प्रदूषण से उत्पन्न दमघोटू माहौल का संकट जीवन का संकट बनता जा रहा हैं। संपूर्ण राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र घने कोहरे में डूबी हुई जानलेवा होती जा रही है। सब जानते हैं कि यह कोहरा नहीं, बल्कि प्रदूषण का ऐसा विकराल जाल है जिसमें मनुष्य सहित सारे जीव-जंतु फंसकर छटपटा रहे हैं, जीवन सांसों पर छाये संकट से जूझ रहे हैं। अस्पतालों के बाहर लम्बी कतारें देखने को मिल रही है। खासकर दिल्ली में दिवाली के बाद यह समस्या साल-दर-साल गंभीर होती जा रही है। इससे पार पाने के लिए दिल्ली सरकार ने कई उपाय आजमाए, प्रदूषण पर नियंत्रण के लिये निर्देश जारी किये गये मगर वे कारगर साबित नहीं हो पा रहे। प्रदूषण जानलेवा स्तर तक खतरनाक हो गया है, जिसके चलते स्कूल बंद करने और दिल्ली सरकार के आधे कर्मचारियों को घर से काम करने को कहा गया है। दिल्ली और पंजाब सरकारें ने अनेक लुभावने तर्क एवं तथ्य दिये, सरकारें जो भी तर्क दें, पर हकीकत यही है कि लोगों का दम घुट रहा है। अगर वे सचमुच इससे पार पाने को लेकर गंभीर हैं, तो वह व्यावहारिक धरातल पर दिखना चाहिए।
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने बुजुर्गों, बच्चों और सांस की समस्याओं से ग्रस्त लोगों को घर से बाहर न निकलने का सुझाव जारी कर दिया है। पिछले कई दिनों से दिल्ली का एक्यूआइ (एयर क्वालिटी इंडेक्स) 400 से 450 के बीच दर्ज किया जा रहा है। लगभग यही स्थिति गुरुग्राम, नोएडा, गाजियाबाद और फरीदाबाद आदि की है। उत्तर भारत के अन्य अनेक इलाके भी प्रदूषण की चपेट में हैं। प्रश्न है कि पिछले कुछ सालों से लगातार इस महासंकट से जूझ रही दिल्ली को कोई समाधान की रोशनी क्यों नहीं मिलती। सरकारें एवं राजनेता एक दूसरे पर जिम्मेदारी ठहराने की बजाय समाधान के लिये तत्पर क्यों नहीं होते?
इस वर्ष दीपावली पर आतिशबाजी न हो, इसके लिये सरकारों ने ही नहीं गैर-सरकारी संगठनों ने भी व्यापक प्रयत्न किये हैं। दिल्ली सरकार ने इसके लिये सख्ती बरती है एवं अणुव्रत विश्व भारती ने ईको-फ्रेंडली दीपावली का संदेश जन जन के बीच पहुंचाया है, क्योंकि पटाखे जलाने से न केवल बुजुर्गों बल्कि बच्चों के जीवन पर खतरनाक प्रभाव पड़ने और अनेक रोगों के पनपने की संभावनाएं हैं। आम जनता की जिंदगी से खिलवाड़ करने वाली पटाखे जलाने की भौतिकतावादी मानसिकता को विराम देना जरूरी है। प्रदूषण मुक्त पर्यावरण की वैश्विक अभिधारणा को मूर्त रूप देने के लिये इको फ्रेंडली दीपावली मनाने की  दिशा में इस साल कई पायदान हम ऊपर चढ़े हैं, एक सकारात्मक वातावरण बना। लेकिन पटाखों से ज्यादा खतरनाक हैं पराली का प्रदूषण। पराली आज एक राजनीतिक प्रदूषण बन चुका है। दिल्ली एवं पंजाब में एक ही दल ही सरकारें है, दूसरों पर आरोप लगाने की बजाय क्यों नहीं आम आदमी पार्टी की सरकार समाधान देती।  
पराली के प्रदूषण से ”दीपावली“ के गौरवपूर्ण सांस्कृतिक अस्तित्व एवं अस्मिता को धुंधलाने की बजाय पराली का स्थायी हल निकाला जाना चाहिए। पराली के प्रदूषण को पटाखों के प्रदूषण के नाम पर ढकने की कुचेष्टा से बचना चाहिए। ”दीपावली“ हमारी संस्कृति है, सभ्यता है, आपसी प्रेम है, इतिहास है, विरासत है और दीपों की कतारों का आश्चर्य है। पराली से दीपावली के आसपास होने वाले प्रदूषण को पटाखे का प्रदूषण कहना, अतिश्योक्तिपूर्ण विडम्बना है। वास्तव में यह सरकारों का गैर जिम्मेदाराना व्यवहार है, जिसने सबको जहरीले वायुमंडल में रहने को विवश किया है। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग की बैठक में यह साफ हो गया कि अगले कई दिनों तक वायु की गुणवत्ता बहुत गंभीर श्रेणी में रह सकती है, लेकिन दिल्ली और पंजाब की सरकार स्वयं को इसके लिए किंचित भी उत्तरदायी नहीं मानतीं। दिल्ली को सामाजिक-आर्थिक विकास के मॉडल के रूप में गुजरात चुनाव में पेश कर रहे अरविंद केजरीवाल और उनके साथी ही इस बात की चर्चा नहीं करते कि इससे कितनी क्षति हो रही है। बल्कि इस महासंकट की जिम्मेदारी केन्द्र सरकार पर डालते हुए एक भारी भरकम बजट आवंटित करने की मांग की जा रही है। इस विषम एवं ज्वलंत समस्या से मुक्ति के लिये हर राजनीतिक दल एवं सरकारों को संवेदनशील एवं अन्तर्दृष्टि-सम्पन्न बनना होगा। क्या हमें किसी चाणक्य के पैदा होने तक इन्तजार करना पड़ेगा, जो जड़ों में मठ्ठा डाल सके।…नहीं, अब तो प्रत्येक राजनीतिक मन को चाणक्य बनना होगा। तभी विकराल होती वायु प्रदूषण की समस्या से मुक्ति मिलेगी।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार दिल्ली के प्रदूषण में पराली के धुएं की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत के आसपास है। हर दिन पराली जलाने की कई सौ घटनाएं दर्ज हो रहीं है। क्या इसे रोकना वाकई इतना कठिन है? आखिर दिल्ली, पंजाब के साथ केंद्र सरकार इसके लिए क्या कर रही है कि किसान पराली न जलाएं? सच यह है कि इसके लिए कोई प्रभावी कोशिश हो ही नहीं रही है। किसानों से बात करने का साहस कोई भी सरकार नहीं दिखा रही है। ऐसा माहौल बना दिया गया है, मानो खेती के नाम पर कुछ भी करने की छूट है। इसका कारण राजनीतिक ही है। कोई किसान है, इसका यह अर्थ नहीं कि उसे वातावरण को दमघोंटू बनाने एवं लोगों के जीवन को संकट में डालने का अधिकार है। किसानों को विकल्प उपलब्ध कराना सरकारों की जिम्मेदारी है। केंद्र को प्रांत सरकारों के साथ एवं प्रांत-सरकारों को केन्द्र के साथ मिलकर काम करना चाहिए, क्योंकि यह पूरे उत्तर भारत का मुद्दा है, यह आम जनजीवन से जुड़ा मुद्दा है। पराली जलाने की समस्या आज की नहीं है। स्वयं केजरीवाल इसके विरुद्ध आवाज उठाते रहे हैं, लेकिन पंजाब में सरकार बनने के बाद इस मामले पर अपने स्वभाव के अनुरूप उन्होंने यू-टर्न ले लिया। पराली की समस्या को हल करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से 1347 करोड़ रुपये और उपकरण दिए गए। अगर इस पर राजनीति करने की जगह ईमानदारी से काम होता और सरकार किसानों को समझाने-बुझाने की कोशिश करती तो इस महासंकट से निजात पाया जा सकता था। करोड़ों लोगों की जीवन रक्षा का प्रश्न दलीय राजनीति से बड़ा है।

सर्दियां आते ही दिल्ली की आबोहवा बच्चों और बुजुर्गों के लिए विशेष रूप से खतरनाक होने लगती है। दिल्ली की हवा में उच्च सांद्रता है, जो बच्चों को सांस की बीमारी और हृदय रोगों की तरफ धकेल रही है। शोध एवं अध्ययन में यह भी पाया गया है कि यहां रहने वाले 75.4 फीसदी बच्चों को घुटन महसूस होती है। 24.2 फीसदी बच्चों की आंखों में खुजली की शिकायत होती है। सर्दियों में बच्चों को खांसी की शिकायत भी होती है। बुजुर्गों का स्वास्थ्य तो बहुत ज्यादा प्रभावित होता ही है। सर्दियों के मौसम में हवा में घातक धातुएं होती हैं, जिससे सांस लेने में दिक्कत आती है। हवा में कैडमियम और आर्सेनिक की मात्रा में वृद्धि से कैंसर, गुर्दे की समस्या और उच्च रक्तचाप, मधुमेह और हृदय रोगों का खतरा बढ़ जाता है। इसमें पराली के प्रदूषण से घातकता कई गुणा बढ़ जाती है। पटाखों का प्रदूषण उससे भी घातक है। 300 से अधिक एक्यूआइ वाले शहरों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रहने वाले सांस के रूप में जहर खींचने को क्यों विवश है, इसके कारणों पर इतनी बार चर्चा हो चुकी है कि उन्हें दोहराने की आवश्यकता नहीं।
प्रदूषण कम करने और दिल्ली सहित देश के अन्य महानगरों-नगरों को रहने लायक बनाने की जिम्मेदारी केवल सरकारों की नहीं है, बल्कि हम सबकी है। हालांकि लोगों को सिर्फ एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभानी है, एंटीडस्ट अभियान भी निरन्तर चलाया जाना चाहिए। लोगों को खुद भी पूरी सतर्कता बरतनी होगी। लोगों को खुली जगह में कूड़ा नहीं फैंकना चाहिए और न ही उसे जलाया जाए। वाहनों का प्रदूषण लेवल चैक करना चाहिए। कोशिश करें कि हम निजी वाहनों का इस्तेमाल कम से कम करें और सार्वजनिक वाहनों का उपयोग करें। प्रदूषण से ठीक उसी प्रकार लड़ना होगा जैसे एक नन्हा-सा दीपक गहन अंधेरे से लड़ता है। छोटी औकात, पर अंधेरे को पास नहीं आने देता। क्षण-क्षण अग्नि-परीक्षा देता है। पर हां! अग्नि परीक्षा से कोई अपने शरीर पर फूस लपेट कर नहीं निकल सकता।

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