राफेल पर ढह गई झूठ की दीवार

पीयूष द्विवेदी भारत

बीते विधानसभा चुनावों में अगर सबसे ज्यादा कोई मुद्दा चर्चा में रहा तो वो था राफेल सौदा। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी किसी भी रैली में कथित राफेल घोटाले का जिक्र करने से नहीं चूकते थे। राहुल गांधी के आरोपों की हवा में बहते हुए अरुण शौरी, प्रशांत भूषण, जसवंत सिन्हा, संजय सिंह द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करके इस सौदे की सीबीआई जांच कराने की मांग की गयी। याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें सम्बंधित पक्षों के साथ-साथ वायुसेना के अधिकारियों तक ने कोर्ट में आकर सौदे पर सेना का पक्ष प्रस्तुत किया। राफेल की कीमतों संबंधी दस्तावेज सीलबंद लिफ़ाफ़े में न्यायालय को सौंपे गए। इन सबके बाद बीते 14 नवम्बर को न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे अब सुनाया गया है। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि राफेल सौदे में प्रक्रियाओं की कोई अनदेखी नहीं हुई और इसमें किसी तरह के संदेह का कोई कारण नहीं है। इस फैसले ने न केवल सरकार को राहत दी है, बल्कि विपक्ष के आरोपों पर गंभीर प्रश्नचिन्ह भी खड़े किए हैं। होना तो यह चाहिए था कि इस फैसले के बाद राहुल गांधी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मसले पर तथ्यहीन आरोप उछालने के लिए अपनी गलती मान लेते, लेकिन विद्रूप देखिये कि इसके बाद उनके सुर और ऊंचे हो गए। फैसले की एक पंक्ति पकड़कर वे सरकार को घेरने लग गए।दरअसल फैसले में एक जगह जिक्र है कि राफेल की कीमत की चर्चा सीएजी की रिपोर्ट में है और यह रिपोर्ट संसद की लोक लेखा समिति (पीएसी) के पास है। कांग्रेस का कहना है कि इस तरह की कोई रिपोर्ट अभी पीएसी के पास नहीं आई है। वहीं सरकार का कहना है कि कीमतों की रिपोर्ट कैग के पास है जिसके भविष्य में लोकलेखा समिति के पास जाने की बात उसने न्यायालय को बताई थी। टाइपिंग की गलती के कारण यह भ्रम उपस्थित हुआ है। साथ ही सरकार की तरफ से न्यायालय में तथ्य सुधार की याचिका डाल दी गयी है। इस बिंदु पर कांग्रेस हमलावर भले हो रही हो, लेकिन यदि सरकार ने स्वयं न्यायालय में तथ्य-सुधार की याचिका लगाई है, तो इससे यही संकेत मिलता है कि उसकी बात में सच्चाई है। यदि कोई समस्या होगी तो न्यायालय में सामने आएगी।
राफेल प्रकरण की शुरुआत 2007 में हुई थी, जब वायुसेना के प्रस्ताव पर संप्रग सरकार ने 126 लड़ाकू विमान खरीदने का निविदा जारी की थी। वायुसेना द्वारा कई चरणों में परीक्षण के बाद रूस, अमेरिका, फ़्रांस, ब्रिटेन, स्वीडन आदि देशों के कई लड़ाकू विमानों के बीच फ़्रांसिसी कंपनी डसॉल्ट के विमान राफेल को खरीद के लिए चुना गया। 2012 में विमान खरीद की निविदा को सार्वजनिक कर दिया गया, जिसमें स्पष्ट हुआ कि 126 विमानों में से 18 तैयार अवस्था में भारत को प्राप्त होने थे तथा शेष 108 विमानों को भारत में ही बनाया जाना था। इसके बाद 2014 में संप्रग सरकार के सत्ता से जाने तक इस दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई और न ही एक भी विमान भारत आया। जाहिर है, 2007 से 2014 के सात सालों में संप्रग सरकार ने इस सौदे को केवल प्रक्रियाओं में उलझाए रखा, जिसका कोई हासिल नहीं रहा। मोदी सरकार द्वारा इसे कंपनियों की बजाय ‘गवर्नमेंट टू गवर्नमेंट’ का रूप दिया गया। एकदम तैयार अवस्था में 36 विमान का सौदा हुआ।यहाँ तक सब ठीक था, लेकिन विवाद विमानों की कीमत और सौदे की ऑफसेट कम्पनियों में अनिल अम्बानी की कंपनी रिलायंस डिफेन्स का नाम आने पर खड़ा हुआ। कांग्रेस ने कई आरोप लगाए, हालांकि तथ्यों के धरातल पर उसके आरोप टिक नहीं सके। कांग्रेस का एक दावा था कि मोदी सरकार ने हिन्दुस्तान एयरोनॉटिकल लिमिटेड की बजाय सौदे की ऑफसेट पार्टनर के रूप में रिलायंस डिफेन्स को चुनने के लिए डसॉल्ट पर दबाव बनाया जबकि डसॉल्ट के सीईओ ने साक्षात्कार में कहा है कि उनपर रिलायंस को ऑफसेट पार्टनर के रूप में चुनने के लिए कोई दबाव नहीं था।
कीमतें सार्वजनिक करने की मांग पर सरकार का कहना था कि फ़्रांस के साथ गोपनीयता की शर्तों के कारण वो ऐसा नहीं कर सकती। तब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने देश की संसद में यह खुलासा किया कि उनकी फ़्रांस के राष्ट्रपति से बात हुई थी जिसमें उन्होंने बताया था कि राफेल विमान पर भारत के साथ फ़्रांस का कोई भी गोपनीयता की शर्त नहीं है। राहुल के इस वक्तव्य के बाद हंगामा इतना अधिक बढ़ गया कि फ़्रांस को इसका खंडन करने के लिए बयान जारी करना पड़ा। यहाँ भी कांग्रेस और राहुल की बड़ी किरिकिरी हुई।इसके अलावा राफेल की कीमतों पर सवाल उठाते हुए राहुल गांधी अपने भाषणों में अलग-अलग कीमतों का उल्लेख करने के कारण भी सवालों के घेरे में आए। कहीं सात सौ करोड़, कहीं 520 करोड़, कहीं 526 करोड़ तो 540 करोड़ जैसी अलग-अलग कीमतें बताकर उन्होंने अपनी खूब किरकिरी कराई। इन भ्रामक तथ्यों के कारण राफेल पर राहुल के आरोप पहले ही बेदम हो रहे थे, जो सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद एकदम अप्रासंगिक हो गए हैं। इसके बावजूद उनका इस मुद्दे को बनाए रखना नकारात्मक राजनीति का ही उदाहरण होगा।
विचार करें तो राहुल के राफेल मुद्दे को पकड़े रहना यूँ ही नहीं है, इसके पीछे प्रमुख कारण है मोदी सरकार का अबतक का भ्रष्टाचारमुक्त कार्यकाल। गौरतलब है कि संप्रग सरकार में टूजी, कोयला, कॉमनवेल्थ गेम्स आदि केन्द्रीय स्तर पर एक से बढ़कर एक घोटाले सामने आए थे। ये केन्द्रीय भ्रष्टाचार उस सरकार के पतन का एक प्रमुख कारण रहा। लेकिन साढ़े चार साल बीत जाने के बाद भी अभी तक मोदी सरकार में भ्रष्टाचार का ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया है। शायद यही बात कांग्रेस को हजम नहीं हो रही और इसीलिए उसके द्वारा जबरदस्ती कभी राफेल तो कभी नोटबंदी को घोटाला साबित करने की कोशिश की जाती रहती है। कांग्रेस को समझना चाहिए कि उसकी सरकार के घोटाले भाजपा ने नहीं, सरकारी एजेंसियों ने सामने लाए थे, इसलिए उनकी विश्वसनीयत बनी थी। अगर मोदी सरकार में कोई घोटाला होगा तो उसे भी सरकारी एजेंसियां जरूर सामने लाएंगी। अगर कांग्रेस यह समझती है कि इस तरह के हवा-हवाई आरोप लगाकर वो मोदी सरकार को भ्रष्टाचारी साबित कर देगी, तो उसे इस मुगालते से बाहर आ जाना चाहिए, अन्यथा ऐसे ही उसकी किरकिरी होती रहेगी।

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