लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

Posted On by &filed under जन-जागरण.


bhrashtacharडॉ. मधुसूदन

प्रवेश:
==>सकल राष्ट्रिय उत्पाद” संयुक्त-राष्ट्र-संघ सूची भारत ९ वाँ क्रम।
==>पर “भ्रष्ट भारत” की प्रतिष्ठा क्रम फिसल कर ९४ वे क्रम पर (लज्जा का विषय )
==>भारत “धनी देश”-पर नागरिक निर्धन हैं”
==>घूस रहित शीघ्रता से–> शीघ्र विकास–> शीघ्र सुविधाएं –> कीमते गिरना –> सुविधाएं सस्ती —> देश में समृद्धि

(एक) चींटियाँ।
कभी आपने चींटियों को गुडका कण खींचकर ले जाते देखा है?
सारी की सारी चींटियाँ, मिल-जुल कर, उस गुड के दाने को एक ही दिशा में खींचकर ले जाती है।
ऐसा नहीं होता, कि, चींटियाँ उस गुड को अपनी अपनी दिशा में खींचते खींचते चली हो।
दुःख की बात है, जो ज्ञान इन चींटियों को है, वो, हमारे अपने देशभक्त नेतृत्व को नहीं है।

(दो)जनता ने देश सेवा का वचन लेकर इन्हें नौकर रखा है।
पर ये नौकर चींटियाँ, (हाँ नौकर ही है आप की,) जिनपर गुड को सुरक्षित ढो कर, सभी के स्वामित्व का गुड, उचित भण्डार तक ले जाकर, संग्रहण करने का उत्तरदायित्व था, वे ही उस गुड को, अपने स्वामित्व का मान कर, मार्ग में ही खाती खाती जाती है। और यदि कोई उन्हें टोकता है, तो गुर्राती हैं। एक तो चोरी ऊपर से सीना जोरी ?
ऐसी भी चोरी की जाती है, कि, चींटियाँ गुड का थोडा थोडा अंश खा खा कर जब भण्डार तक पहुंचती है, तो गुड का दाना इतना छोटा हो जाता है, कि, स्पष्ट दिखाई भी नहीं देता। चौंकना नहीं, यदि कल सबेरे आप को १५ -२० चींटियाँ मार्ग में ही खडी खडी उस कण को खाती दिखाई दे।  और फिर नाम मात्र  कण बचाकर भण्डार तक पहुंचाएँ।कुछ चींटियाँ तो, उस गुड को सारा का सारा ऐसी चतुराई से, उछालकर किसी ’स्विस’ नामक  बॅन्क में जमा भी करवा देती हैं। हम भोले गाँव वालों को तो गाँव के बाहर जाने का टिकट खरिदने की क्षमता नहीं है;  तो, ये स्विस बॅन्क किस स्वर्ग में है, कैसे पता लगे?

(तीन)सिरमौर समस्या है, “भ्रष्टाचार”।
हमारी समस्याओं की सिरमौर समस्या है, “भ्रष्टाचार”। यदि इसीके कपाल पर वज्रांगबली का गदा-प्रहार किया जाए, तो, सारा भारत समृद्धि की ओर अग्रसर होने में देर नहीं होगी। पर, क्या ऐसा अग्रसर कहीं कोई प्रदेश हुआ भी है? हाँ, जी ऐसा गुजरात में हुआ है।
आप जानते तो होंगे, कि, भ्रष्टाचार कुटिलता से  काम में, विलम्ब कर ही पनपाया जाता है।
कर्मचारी विलम्ब ना  करें, तो घूस कहाँ से उगाहेगा? विलम्ब से घूस मिलती है। और घूस पाने के लिए विलम्ब का नाटक करता है। सारी भ्रष्टाचार प्रक्रिया मुख्यतः विलम्ब पर टिकी हुयी है।
(चार) शीघ्रता समृद्धि की जननी।
इससे उलटे, घूस रहित शीघ्रता, शीघ्र विकास करवाती है। शीघ्र विकास से शीघ्र सुविधाएं उपलब्ध होती है। बाजार में  अधिक सुविधाओं की आपूर्ति होने पर माँग के अनुपात में, आपूर्तियाँ अधिक होने से कीमते गिरती है।फिर जनता को सुविधाएं सरलता से कम मूल्य पर उपलब्ध होती है।

(चार)भ्रष्टाचारी की परिपाटी
भ्रष्टाचारी की परिपाटी काम में देरी कर जनता   को  उकताकर रिश्वत उगाहने की होती है।
इस देरी के कारण जितने भी विकास लक्ष्यी काम होते है, सब धीरे धीरे सम्पन्न होते हैं।
जहाँ दिन में आँठ काम निपटाए जा सकते थे, वहाँ दो ही काम यदि सफल  होते हैं, तो विकास की गति एक चौथाई  हो जाती है। देरी करने से घूस की मात्रा जहाँ बढ जाती है, वहाँ विकास की गति धीमी हो जाती है।
भारत में कर्मचारी घण्टो के अनुपात से वेतन पाता है। ८ घण्टे कार्यालय में, आराम करके, संध्या को घर और आराम करने चला जाता है। और ऐसे दोनों जगहों पर आराम करने का हराम में वेतन पाता है।
काम में जितनी देरी होगी, रिश्वत देने में जनता उतनी ही विवश होगी। इसी समीकरण को समझने से सारी प्रक्रिया समझमें आ जाएगी।

(पाँच) गुजरात में भ्रष्टाचार घटा है।
पर, गुजरात में भ्रष्टाचार पर्याप्त मात्रा में घटा कर, विकास हुआ है, अभी तो, केवल शासकीय भ्रष्टाचार के अंत मात्र से ही शीघ्र विकास हुआ है। छुट पुट भ्रष्टाचार, अशासकीय भ्रष्टाचार विशेष समाप्त हुआ है, ऐसा मैं नहीं मानता, न मेरे पास कोई आँकडे हैं। हमने  ६५ वर्षों में, भ्रष्टाचार को हमारी परम्परा में ढाल दिया है; इस में लेनेवाला, और देनेवाला दोनों सम्मिलित हैं, ऐसे परम्परित और परस्पर-पोषित भ्रष्टाचार को कैसे इतनी शीघ्रता से, समाप्त किया जाये?

(छः ) भ्रष्टाचार की समाप्ति असंभव ही मानी जाती थी।
भ्रष्टाचार समाप्त होगा, ऐसा मानने के लिए १०-१२ वर्ष पहले, कोई भी भारतीय तैयार नहीं था। हर कोई भ्रष्टाचार को बडी बडी गालियाँ देता, अपने को छोडकर सबकी निंदा करता, पर जब उसी को घूस पाने का अवसर आता, तो, विवशता जताकर, धन लेने में न हिचकता।हर कोई देनेवाला, भ्रष्टाचार को गालियाँ देता, पर स्वयं इतना घोर स्वार्थी था, कि लेते समय सब कुछ भूल जाता।
नव-नियुक्त अधिकारी नियुक्ति के पहले भ्रष्टाचार का घोर निंदक, पर वही नियुक्ति के बाद भ्रष्टाचारी बन जाता था। मेरे एक मित्र ने, ऊपर का, धन जोड कर, विवाह के हेतु, अपना वेतन बताया था।  ससुराल वालों को भी विशेष आपत्ति नहीं थी। क्यों कि भ्रष्टाचार परम्परा में ढल चुका था। उसने, अपना विवाह भी भ्रष्ट धन को पानी की भाँति बहाकर सम्पन्न किया।
एक मित्र बेटे को विश्व विद्यालय में, प्रवेश दिलाने के लिए कितनी घूस देनी पडी, इसी का बखान किसी स्वर्ण पदक विजेता की भांति गर्व से बताया करता था।

(सात) रूढि की  समाप्ति आज तक, युगान्तर-कारी अवतारों ने ही की है।
जब आप किसी व्यवहार को रूढि में रूपांतरित कर देते हैं, जिसका प्रचलन एक परम्परा बन जाता है। तो नदी के प्रवाह की भाँति फिर उस नदी में विपरित दिशा में तैरना बडा कठिन ही नहीं, असंभव हो जाता है।
सोचिए जहाँ, सभी गाडियाँ, दाहिनी ओर चल रही हैं, आप अपनी गाडी बाँई ओर कब तक चलाओगे?और चलाओगे, तो टकरा जाओगे। कोई भी यह भ्रष्टाचार समाप्त होगा ऐसा कुछ वर्ष पहले तक मानता नहीं था। चारो ओर निराशा ही निराशा थी। इतनी घोर, निराशा मैंने भी कभी अनुभव न की थी। मैं भी प्रामाणिकता से आशावादी न था।

(आँठ ) भ्रष्टाचार रूकनेकी अपेक्षा नहीं थी?
इस लिए,  मुझे आशा नहीं थी, कि रत्तीभर भ्रष्टाचार भी, कोई रोक पाएगा। पर कहीं पर ईश्वरी संकेत ही होगा, कि, गुजरात में बडी चाणक्य चतुराई से भष्टाचार पर अंकुश लाया गया है। ऐसी चतुराई से मैं अतीव प्रभावित हूँ। आज मात्र राम नहीं, पर राम की नैतिकता के साथ चाणक्य की चतुराई की महती आवश्यकता है। हमें चाहिए राम की नीतिमत्ता और चाणक्य की चतुराई। दोनों का मिश्रण चाहिए। केवल राम नहीं !केवल चाणक्य नहीं ! मेरे लिए यह किसी दैवी चमत्कार से कम नहीं है।

(नौ) बहुत कठिन है।
मोदीजी  को अपनी सज्जन छवि को बचाते हुए, सज्जनता से ही, दुर्जनों के पैंतरों को भाँपकर फिर उनको परास्त करना। जब शत्रुओं के पास सारी सुविधाए,यंत्रणाएं और शक्तियाँ हो, और सारी छद्म रीति-नीति का पथ्य भी ना हो;  यह और भी कठिन ही हो जाता है।
कितनी बार उनपर अनेकानेक अपराध मढे गए, अभी तक एक भी प्रमाणित नहीं हो सका।
एक ओर, अनथक रैलियाँ, दूसरी पक्ष में वरिष्ठों का आदर भी, सभी का सम्मान रखते हुए, और बोलना भी कहीं ना फिसलते हुए, इत्यादि  बहुत बहुत कठिन  उत्तरदायित्व हैं। धन्य है, कि, वें इसे सही सही निर्वाह कर रहें हैं। मोदी जैसी चतुराई,और चारित्र्य; शठं प्रति शाठ्यं, और पैंतरेबाजी की कुशलता; नेतृत्व, व्यक्तित्व और वक्तृत्व; मैं आज कहीं, नहीं देखता।यह अनुभव सिद्ध वास्तविकता है, भावनावश विधान नहीं।

(दस ) पर डर भी है।
– कि कहीं “लॅप-टॉप” के बदले  बिकाउ मतदाता अवसर ना खो दे?
–कि, तुष्टिकरण से जनता को लडाने वाली पार्टी कोई नया झुनझुना ना थमा दें?
–या तो, फिर लीक पर मतदान करने वाली जनता, कोई घपला ना कर दें?
–या भारतीय संस्कृति  द्वेष्टा  पार्टियाँ राष्ट्र-हित को अपने पक्ष स्वार्थों से कम ना तोल बैठें?
—पर सबसे बडा डर मुझे मिडीया का है, जिनका स्वामित्व परदेशी है?
—मिडिया जानता है, कैसे तर्क-कुतर्क देकर भोली जनता को उलझा सकता है।
—वही कुछ सिक्कों के लिए निष्ठा बेचकर, झूठी कहानियाँ फैलाकर राष्ट्र द्रोह ना कर बैठें।
—थोक मत बँक, जाति आधारित मतदान,
—-गुजरात के, बिजली चोर, जिनकी बिजली मोदी ने काटी थी, आज विरोधी हैं।
—-ऐसे बहुत समूह है, जिनका डर है।

(ग्यारह) भारत की प्रतिष्ठा का क्रम ।
दूसरी ओर, संसार भर में भारत का डंका बजानेवाले विवेकानंद, अरविंद, योगानंद इत्यादियों के नाम से जाना जानेवाला भारत आज अपनी प्रतिष्ठा खो चुका है।
जिस देशके आध्यात्म और नीति से संसार चकाचौंध था, उस भारत की प्रतिष्ठा फिसल फिसल कर निचले  ९४ वे क्रम पर पहुंच गयी है।  यह वैश्विक सर्वेक्षण के क्रम है। यु.एस.ए.(अमरिका) ११ वे क्रम पर है। गांधी जी, के देश के लिए इससे बडा अपमान क्या हो सकता है?

(बारह) “सकल राष्ट्रिय उत्पाद” क्रम।
उलटे भारत “सकल राष्ट्रिय उत्पाद” में संयुक्त राष्ट्र संघ की सूची में ९ वें क्रम पर है। वर्ल्ड बॅन्क के १० वे, इंटर्नॅशनल मॉनेटरी फण्ड का १० वाँ, सी. आय. ए. वर्ल्ड फॅक्ट बुक का भी १० वे क्रम पर हैं। कितने गौरव की बात है?और हमारा राष्ट्रीय धन जो स्विस बँक में जमा है, उसको जोडा जाए तो भारत में कोई गरीब या निर्धन हो ही नहीं सकता। कुछ अनुमान यही कह रहे हैं।

पर इसी लिए,  माना जाता है, भारत एक धनी देश है, जिसके नागरिक गरीब है।
जैसे ऊपर बताया, वैसे कुछ जानकार अनुमान करते हैं, कि, स्विस बॅंक में जमा काला धन यदि वापस लाया जाए, तो भारत में कोई भी गरीब ही नहीं बचेगा। तो यह काला धन किसका है? पर सुनता हूँ, कि, यह काला धन भी स्विस बॅंक से निकलवा कर कहीं और दक्षिण अमरिका के बनाना रिपब्लिक देशोमें जमा हो रहा है।

अब अषाढ चूकने का अवसर नहीं है। मोदी जी के हाथ सक्षम करें, जान ले, कि, यदि २७२ का आँकडा पार नहीं किया, तो, लिख के रखिए, आप मृत्यु तक पछताते रहोगे। सोचिए,  कैसे भारत को हम हमारी अगली पीढी को देकर जाना चाहते हैं?
शिव लिंग पर दूध का अभिषेक करना था। गाँव में घोषणा की गयी, पर बहुसंख्य ग्रामवासियों ने जल के ही लोटों में दो बूंद दूध डाल  शिव लिंग पर अभिषेक कर आए। सारा जलाभिषेक ही हो गया।

फिर पछताए कुछ नहीं होगा, जब चुनाव की चिडीया खेत चुग जाएगी। हमें २७२ का आँकडा पार करना ही होगा। नहीं तो अन्य साथी पार्टियाँ अडंगे लगाती रहेगी। शीघ्र विकास होने नहीं देंगी।
जय हिंद-जय भारत।

One Response to “हमारा महाकाय राष्ट्रीय कलंक, भ्रष्टाचार”

  1. Dr. Chandra P Trivedi

    चन्द्रा पी. त्रिवेदी
    पूर्व वरिष्ठ अध्येता, स्ंस्कृति विभाग, भारत सरकार,
    नई दिल्ली। पूर्व प्राचार्य, स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिण्ड म.प्र.
    41 एम आई जी विक्रम नगर, रतलाम
    9479720428

    प्रति,
    महामहिम माननीय श्री प्रणब मुखर्जी,
    राष्ट्पति, भारत सरकार
    नई दिल्ली

    विषय- प्राणोत्सर्ग महापर्व अनुमति ।
    माननीय राष्ट्पति महोदय,
    अत्यंत विनम्रता के साथ कष्ट के लिए क्षमा प्रार्थी हूॅं । विष्व मे चेतना की खोज हेतु वैज्ञानिक दिन-रात कार्य कर रहे है, करोडो डालॅर के व्यय के बाद भी जीव चेतना का स्रोत अज्ञात है।
    भारत मे यह कार्य बिना व्यय कल्पना के परे है । इसका हल वैज्ञानिक प्रमाण सहित प्रस्तुत किया है।
    जिसे विष्व के वैज्ञानिको ने प्रषंसा की है। यह विष्व को महान भारत की देन है। इसे व्यक्तिगत स्वार्थ मान नकारना और सहन करना भारत का अवमूल्यन है।
    कृपया संलग्न गीता विज्ञान के अनुरुप प्राणोत्सर्ग महापर्व हेतु अनुमति प्रदान कर अनुग्रहित करे।
    आदर सहित, धन्यवाद।
    चन्द्रा पी. त्रिवेदी
    महामहिम माननीय राष्ट्पति प्रणब मुखर्जी से विनम्र निवेदन है कि नैतिक षिक्षा के अभाव मे भारत भटक गया है। इसे सही मार्ग दर्षन की आवष्यकता है। इसका हल षिक्षा और षिक्षा प्रणाली मे है, जिसका समुचित उपयोग और इसमे आपका सहयोग ही आपका आषीर्वाद है। महामहिम राज्यपाल म.प्र. और प्रधानमंत्री भारत को मरे कार्य की जानकारी है, और इसकी अनुषंसा माननीय मोतीलाल वोरा सांसद राज्य सभा ने की है ।
    आज भारत के अतीत का गौरव अंधविष्वास का पर्याय है। जिसने भारत को स्वतंत्र होते हुए भी स्वतंत्रता के अहसास और आत्म विष्वास से वंचित कर, भ्रष्टाचार की गर्त मे धकेल दिया।
    मानसीक गुलामी का अहम् षासन और प्रषासन पर प्रभावी है। अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के वषीभूत स्व-अनुषासन इसमे बाधक है। इसलिए ष्षासन और प्रषासन इसकी छायाॅ से भी जनता को दूर रखना चाहते है। क्यो कि वे इसका हल खोजने मे असमर्थ है और न ही इसे दूर करना चाहते है। और भारत देष किसी से पुछ नही सकता कि आप देष के लिए क्या करेंगे?

    हम भारत और भारतीय संस्कृति की उपज है। इसे विस्मृत करना घातक है। जिसने संसार को आलोकित किया वह क्षुद्र राजनीतिज्ञो के स्वार्थ के चलते मानव मात्रा को पतन की राह दिखा रहा है। भारत की पहचान और नैतिक मूल्यों को पुनसर््थापित करने का दायित्व आप नही लेंगे तो कौन लेगा?
    सर जाॅन मार्षल ने सिंधु-घाटी सभ्यता की खोज के साथ, भारत को विष्व मे एक नई वैज्ञानिक पहचान दी और भारत को विष्व प्रसिद्ध सभ्यताओं की श्रेणी मे ला खडा किया।
    इस पर तब ग्रहण लग गया जब यह कहा गया कि आर्य बाहर से आये और उन्होने काले द्रविडो को मार कर भगाया । सिंधु घाटी की लिपी को न समझने तथा वेदो की भाषा का ज्ञान न होने के कारण यह सभ्यता रहस्य मे परिवर्तित हो गई, और भारत वासियो पर प्रष्न चिन्ह लग गया। जिसके परिणामस्वरुप भारत का विभाजन हुआ। यही कारण है कि भारत मे राष्ट्रियता का अभाव परिलक्षित होता है, और देष आतंकवादियों के निषाने पर है।
    वेदो की भाषा और सिलो पर सूक्ष्म चित्र संकेत पुरातत्वविद, इतिहासकार, भाषा षास्त्री तथा वैज्ञानिको के लिए अनबुझ पहेली रहे है। जिसके वैज्ञानिक हल की भारत को लम्बंे समय से प्रतिक्षा थी। यह किसी भाषा की लिपी नही है।
    यह निष्कर्ष इस युग की सबसे बडी खोज डीएनए पर आधारित है, जिसकी खोज वाटॅसन और क्रिक 1953 ने की और जैव तकनिकी के क्षेत्र मे क्रांति ला दी। इसी खोज के आधार ने सिंधु घाटी पर से रहस्य का पर्दा हटाया, यह सिंधु-वेदिक अनुवांषिकी विज्ञान का सार है।
    सिंधु घाटी का विज्ञान इस सत्य को रेखोंकित करता है कि जीव का विकास एक सूक्ष्म कोषिका और डीएनए से विकास के द्वारा हुआ है। डीएनए जीवन का प्रकाष है, जो पीढी दर पीढी जीव के गुण और अवगुणो का वाहक है।
    सिंधु घाटी का अनुवांषिकी विज्ञान चरम उत्कर्ष पर था, इसके द्वारा प्रयोगषाला मे जीव विकसीत किए जाते है, इसका प्रमाण भारत और आफ्रिका की विकसीत जैव विविधता है। जीन तकनिकी मे उन्हे महारत हासिल थी, जो विनाष का कारण भी बना।
    सिलो पर जैव अनुवांषिकी के सूक्ष्म चित्र आधुनिक जैव तकनिकी के साकेंतिक प्रतिरूप है। जिसके द्वारा प्रकृतिमे जीव का विकास होता है,और प्रयोगषाला मे कृत्रिम जीवो का विकास किया जाता है। जैव तकनिकी मे सिंधु घाटी को महारत हासिल थी, जो उनका मुख्य व्ष्वसाय था, इसके लिखित प्रमाण वेदो की सांकेतिक भाषा मे है।
    भारत का गौरवषाली अतीत भारत का आधार है, सैकडो सालो की गुलीमी ने इसे नेस्तनाबुत करने के असंख्य प्रयत्न किए, परन्तु यह कालजयी संस्कृति आज भी जीवित है। जो महाकवि इकबाल के षब्दो का जीवंत प्रमाण है।
    बाकी मगर है अब तक नामो निषां हमारा,
    कुछ बात है कि हस्ती मिटती नही हमारी
    सदियों रहा है दुष्मन दौरे जमाॅ हमारा।
    सा विद्या या विमुक्तये । षिक्षा वह जो बंधनो से मुक्त करे। परन्तु हमने षिक्षा के नाम पर साक्षर को ही ज्ञान का पर्याय मान लिया। एतदर्थ पाष्चात्य संस्कृति की होड मे षिक्षा महज धन कमाने का माध्यम है। पेट तो जानवर भी भर लेते है, फिर मनुष्य तो बुद्धिमान है, वह प्रकृति के दोहन से क्यों वंचित हो?व्यवसायिक षिक्षा के साथ नैतिक षिक्षा दी ही नही गई तो युवा पीढी से नैतिकता की दरकार किस मुहॅ से की जा रही है?

    देष की आन, बान, षान और राष्ट्र भावना उचित षिक्षा मे है। दूषित षिक्षा प्रणाली का परिणाम है कि हम भ्रष्टाचार मे उपर से नीचे तक लिप्त है, और राष्ट्रियता का अभाव परिलक्षित होता है। बुद्धिजीवी राजनीतिज्ञ ईमानदार प्रधान मंत्री को सहन नही कर पा रहे है। यहाॅ तक कि आज षिक्षा, चिकित्सा और न्यायपालिका भी भ्रष्टाचार और रिष्वत के आरोप से मुक्त नही है। चिकित्सा षिक्षा मे प्रवेष, नियुक्ति आदि षासन के आदेषानुसार होते है, इसमे घोटाले और रिष्वत ष्षासन की छवि खराब करते है।
    प्रजातंत्र मे जनता के षासन के नाम पर जनता का षोषण राजनीतिज्ञो को अंग्रेजो से विरासत मे प्राप्त हुआ है। 15 अगस्त 1947 को प्राप्त स्वतंत्रता जनता के साथ तथाकथित हिन्दू धर्म के नाम पर छलावा और जनता को जनता के षासन के नाम पर प्रजातंत्र का उपहार षहद युक्त धर्म की ओपियम ष्अफीमष् है, जिसने जनता को अफीमची बना दिया।
    जिसप्रकार से वर्तमान प्रजातंत्र मे नेता एक दूसरे पर आरोप लगाकर आनन्द ले रहे है। इससे लगता है कि नैतिकता महज षब्द कोष तक सिमीत है। नेता लोग जुंॅआ घर, चकला घर किराए पर चला सकते है, जो ब्याज के समान पवित्र है। सरकारी खरीद पर 10 प्रतिषत कमीषन स्थापित सत्य है, जो ईमानदारी का प्रतीक है। जिसे आरोप प्रत्यारोप के घेरे मे लेकर ईमानदार प्रधान मंत्री पर आरोप लगा कर स्वयं को पवित्र सिद्ध करना बुद्धि का बौद्धिक कौषल है। जो वर्तमान षिक्षा की उपज है। इसके कारण स्वर्गीय प्रधान मंत्री राजीव गांॅधी को बोफोर्स मे घोटाले का आरोप झेलना पढा, और बुद्धिजीवी रिष्वत लेने के लिए स्वतंत्र हो गए कि जब प्रधान मंत्री करोडों मे रिष्वत ले सकते है, तो हम क्यों नही ?
    इसका परिणाम है कि भारत मे चारो तरफ भ्रष्टाचार की गंगा बह रही है, और उसमे सभी पुण्य प्राप्त करने का प्रयत्न अपना अधिकार समझते है। यही कारण है कि हम 100 प्रतिषत भ्रष्टाचार मे साॅंस ले रहे है। भ्रष्टाचार इतना व्यापक है कि व्यक्ति अपनी माॅ से भी रिष्वत ले सकता है, और बाप को मार सकता है। जबकि डायन भी एक घर छोड देती है, और वैष्या भी कभी कभी पारिश्रमिक नहीं ले, यह संभव है, परन्तु कौई बिना रिष्वत काम कर दे या सिफारिष मान ले, यह भ्रष्टाचार का अपमान है, इसे रोकने का प्रयत्न आज अपराध है।
    षुन्य से अनन्त जीवन की अनन्त यात्रा ा
    षुन्य का आविष्कार विष्व को भारत की देन है । इसे विष्व ने स्वीकार किया है, परन्तु इसका महत्व हमारे लिए गणित तक ही सिमीत है । षुन्य से सृष्टि और जीवन का विकास हुआ है, यह भारत की मौलिक खोज और विरासत है, इसे विष्व के समक्ष रखना भारत के लिए गर्व का विषय है। परन्तु सदियों की गुलामी इसमे अवरोध उत्पन्न करती है, जो भारत को महज अंध्विष्वास का देष सिद्ध करने मे गौरव अनुभव करते है।
    भारत धर्म के अंधकार से ग्रस्त है। इस दूषित गुलाम मानसीक वृत्ति के कारण हम भ्रष्टाचार को षिष्टाचार मानते है। भारत के अतीत का गौरव साम्प्रदायिक संकिर्ण सोच है। माननीय उच्च न्यायालय की टिप्पणी कहती है कि भारत मे 90 प्रतिषत भ्रष्टाचार है, हम 100 प्रतिषत मे भी जी सकते है, क्यों कि आज हम स्वतंत्रा है। यह आज भारतीय जीवन का अंग है, जहाॅ कभी ताले नही लगते थे, और न ही सुरक्षा के लिए आज के समान पुलिस बल था, फिर भी चोरी या अपराध कल्पना के बाहर था।
    षासन और प्रषासन इसका हल खोजने मे असमर्थ है न ही इसे दूर करना चाहते है। सदियों से गुलामी का बोझ सहन कर रहे मानसीक गुलामो पर षासन ही इनका एक मात्र उद्देष्य है, जो अंग्रेजो से विरासत मे प्राप्त हुआ है।
    महामहिम माननीय राष्ट्पति प्रणब मुखर्जी से विनम्र निवेदन है कि नैतिक षिक्षा के अभाव मे भारत भटक गया है। इसे सही मार्ग दर्षन की आवष्यकता है। इसका हल षिक्षा और षिक्षा प्रणाली मे है, जिसका समुचित उपयोग और इसमे आपका सहयोग ही आपका आषीर्वाद है।
    आदर सहित । धन्यवाद ।
    भवदीय
    प्रोफेसर चन्द्रा पी. त्रिवेदी
    पूर्व वरिष्ठ अध्येता, स्ंस्कृति विभाग, भारत सरकार
    नई दिल्ली। पूर्व प्राचार्य, स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिण्ड म.प्र.
    41 एम आई जी विक्रम नगर, रतलाम 09479720428

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *