लेखक परिचय

शिव शरण त्रिपाठी

शिव शरण त्रिपाठी

वरिष्ठ पत्रकार सम्प्रति सम्पदक-दि मॉरल मो - 9450329077

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कोई यह तो नहीं कह सकता कि मोदी सरकार आतंरिक व वाह्य आतंकी दुश्मनों से निपटने का सतत् व परिणामपरक प्रयास ही नहीं कर रही है पर आम जनता को लग रहा है कि मोदी सरकार निर्णायक कदम न उठाकर राष्ट्र का लगातार नुकसान कर रही है।
मोदी सरकार व मोदी के नेतृत्व पर देश के लोगो का लगातार बढ़ता भरोसा उनसे घोर उपेक्षा कर रहा है कि वो देश के आतंरिक दुश्मनों, नक्सलियों को जड़ से उखाड़ फ ेके तो पाकिस्तान को ऐसा सबक सिखाये कि वह आतंक की परिभाषा ही भूल जाय।

शिवशरण त्रिपाठी
नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ से लेकर जम्मू-कश्मीर तक सप्ताह भीतर आतंकियों ने जो ताडंव मचाया उससे पूरा देश स्तब्ध है। समस्त राष्ट्रवादी क्षुब्ध व रोष में है।
बीती २४ अप्रैल को छत्तीसगढ़ के सुकमा में हुई हृदय विदारक घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। सड़क निर्माण की सुरक्षा में लगी केन्द्रीय सुरक्षाबलों की टुकड़ी पर खाना खाते समय नक्सलियों ने गांव वालों की आड़ में भीषण हमला करके २५ जवानों को मौत के घाट उतार दिया और भारी मात्रा में सुरक्षा बलों के हथियार भी लूट ले गये। इन हथियारों में १२-एके रायफ ल और उनकी ७५ मैग्जीनें, २२ बुलेट प्रूफ जैकेट, लगभग ३ हजार राउड गोलियां प्रमुख रूप से शामिल बतायी जा रही है।
खबरों के अनुसार ऐसे भीषण हमलों के बावजूद बहादुर जवानों ने न केवल निर्माण कार्यो में लगे ४० लोगो की जाने बचाई वरन् ७० से ज्यादा जवान सुरक्षित लौटने में भी सफ ल रहे है। पता चला है कि इस भीषण रक्तपात में नक्सली कमांडर हिडमा का हाथ माना जा रहा है। इस पर सरकार ने २५ लाख का ईनाम घोषित कर रखा है। बताया जाता है कि इसी साल ११ मार्च को सुकमा में ही भेज्जी में सीआरपीएफ जवानों पर हमले में भी हिडमा का ही हाथ रहा है। इसमें १२ जवान शहीद हो गये थे। सुकमा से कनाडा के एक शैलानी को अगवा करने के पीछे भी उसी का हाथ बताया जाता है। मई २०१३ में जीरम घाटी में कांग्रेस नेताओं के काफि ले पर हुये हमले में भी उसी का हाथ था। नक्सलियों ने २७ काग्रेसी नेताओं समेत ३२ लोगो की हत्या कर दी थी। वर्ष २०१० में चितनालार में हमले भी इसी की भूमिका मानी जाती है। इस घटना में ७६ जवान शहीद हुये थे।
दस्तावेजी प्रमाणों के अनुसार हिडमा सुकमा में जंगरहुंडा इलाके के पलोडी गांव का रहने वाला है और वह दक्षिण बस्तर के सुकमा बीजापुर क्षेत्र में नक्सलियों का सुप्रीम कमांडर है। इसे बेहद सफ ल रणनीतिकार और लड़ाका माना जाता है
इस हमले के बाद भी फि र वही सवाल उठ रहे है कि आखिर बीते १० से अधिक वर्षो से छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार कायम है। तीन वर्षो से तो छत्तीसगढ़ के साथ केन्द्र में भी भाजपा की ही सरकार है फि र भी छत्तीसगढ़ नक्सलियों से मुक्त नहीं किया जा सका है। अजीब बात तो यह है कि जब सरकार को हिडमा जैसे नक्सली सरगना से लेकर नक्सलियों के ज्यादातर छिपने की जगहों व उनके अनेक शरणदाताओं का पता है तो उनका अब तक सफ ाया न कर पाना घोर चिंता का विषय है। ठीक है कि नक्सली आतंकी देश में लगातार घट रहे हंै। कभी देश के २० राज्यों में इनका व्यापक आतंक था पर यह १३ राज्यों में सिमट गये है। इनका सर्वाधिक सुरक्षित क्षेत्र छत्तीसगढ़ बना हुआ है।
यह सवाल बेहद तार्किक है कि आखिर नक्सलियों से मोर्चा लेने में छत्तीसगढ़ सरकार प्रदेश के पुलिस बल का भी प्रयोग क्यो नहीं करती जबकि स्थानीय पुलिस बल को क्षेत्र की ज्यादा व ठोस जानकारी होती है। सब कुछ केन्द्रीय सुरक्षाबलों के भरोसे छोड़ देना कैसी अक्लमंदी व रणनीति है। यह भी कम चिंता जनक नहीं है कि राज्य सरकार का खुफि या तंत्र हमेशा ही चूक करता व विफ ल होता दिखता है।
२४ अप्रैल की हृदय विदारक घटना के बाद भले ही केन्द्रीय गृहमंत्री ने आश्वस्त किया है कि जवानों का यह बलिदान किसी सूरत में व्यर्थ नहीं जाने दिया जायेगा। सरकार ने फ ैसला किया है कि नक्सलवाद के खिलाफ रणनीति की समीक्षा की जायेगी और जरूरत पडऩे पर इसमें संशोधन भी किया जायेगा पर सवाल यह उठता है कि आखिर सरकार अभी तक क्या करती रही है। इसी बीच नक्सलियों के सफ ाये की कमान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के संभाले जाने की खबरों से सकारात्मक आस तो बंधती ही है पर ध्यान रखना होगा कि अब देश ज्यादा कुछ इंतजार करने के मूड में नहीं है। ऐसे में केन्द्र व छत्तीसगढ़ सरकार को राज्य में गहरी जड़े जमा चुके आतंकियों के गढ़ को हरहाल में ध्वस्त करना ही होगा। चाहे इसके लिये व्यापक सैन्य अभियान ही क्यो न चलाना पड़े।
२४ अप्रैल के भीषण नक्सली हमले के साथ ही कश्मीर में आतंकियों ने जिस तरह गत गुरूवार से लेकर सोमवार तक पांच जवानों को शहीद कर दिया व ७ पुलिस कर्मियों को भी मौत के घाट उतार दिया उससे देश के लोगो का गुस्सा एक बार पुन: भड़क उठा है। पाकिस्तान के बर्बर सैनिकों द्वारा दो भारतीय जांबाज जवानों का सिर काटकर उनके शवों के क्षत-विक्षत करने की खबर ने आग में घी का काम किया है। हालांकि सोमवार को ही बहादुर भारतीय सेना ने दस पाक सैनिकों को मौत की नींद सुलाकर साफ कर दिया कि भारतीय सेना को कोई भी कमजोर समझने की भूल न करें। बार-बार सवाल यही उठता है कि आखिर पाकिस्तान परस्त आतंकियो व पाकिस्तान सैनिकों की बर्बरता पर सरकार लगाम क्यो नहीं लगा पा रही है?
सूत्रों का कहना है कि भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक के बाद कुछ दिनों की शांति के बाद एक बार पुन: जिस तरह पाक परस्त आतंकियों ने कश्मीर में कहर ढहाना शुरू किया है उससे साफ है पाकिस्तान सेना व सरकार उनकी पूरी मदद को कर ही रही है, देश के गद्दारों की फ ौज भी उन्हे हर संभव सहायता पहुंचा रही है। बार-बार खुलासा हो चुका है कि कश्मीर में बैठे गद्दार ही आतंकियों को न केवल शरण देते है वरन् उनकी हर तरह से मद्द भी करते है। जब भी सेना आतंकियों से मुठभेड़ करती है तब यही गद्दार सेना पर पत्थरबाजी करके आतंकियों को बचाने व हमले का रास्ता साफ करते है।
सूत्रों का कहना है कि जम्मू कश्मीर की सतही व गंदी राजनीति ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। हाल ही में सांसद चुने गये डॉ. फ ारूक अब्दुला ने महज वोटो के लिये पत्थरबाजों की खुली हिमायत की थी, किसी से छिपा नहीं रह गया है ऐसी ही घृणित राजनीति देश के अन्य राजनीतिक दल भी करते दिखते हंै तो कथित मानवाधिकारवादी भी अपनी राष्ट्र विरोधी हरकतों से बाज नहीं आते हंै।
देश के लोगो का साफ कहना है कि भारत सरकार अब तत्काल एकतरफ ा कार्यवाही को अंजाम दें। अब सर्जिकल स्ट्राइक की बजाय भारतीय सेना लगातार सीमा पार पाकिस्तान के आतंकी कैम्पो व मिलैट्री कैम्पों पर हमला करके उन्हे ऐसा वीरान कर दे कि वहां किसी आतंकी छोड़ पाकिस्तान सेना भी कैम्प लगाने की हिम्मत न कर सके। इसी तरह बिना मानवाधिकारियों की छद्म हिमायत की परवाह किये कश्मीर में सघन अभियान चलाकर उन गद्दारों को चुन-चुन कर मौत के घाट उतार दें अथवा जेलों में ठूस दें जो राष्ट्र की अस्मिता का सौदा करने में पीछे नहीं रहते।
आज जब पूरा देश मोदी सरकार के साथ है तो भी यदि यह सरकार आतंकियो व पाकिस्तान को सबक न सिखा पाई तो नि:संदेह इस सरकार का भी भविष्य में वही हश्र होगा जो अतीत में कांग्रेस व अन्य सरकारों का होता रहा है।

ऐसे तो खड़ी होने से रही कांग्रेस!
हाल ही में हुये उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के विधानसभा चुनावों में बुरी तरह मुंह की खाने के बाद कांग्रेस नेतृत्व को आस थी कि गोवा में बड़ी पार्टी होने के नाते वो सरकार तो बना ही लेगी पर गोवा भी उसके हाथों से निकल गया।
लगातार असफ लताओं से जूझ रही कांग्रेस को उम्मीद थी कि दिल्ली के नगर निगम के चुनाव में वो अपनी जीत का परचम अवश्य फ हरायेगी पर यहां भी उसकी हालत इतनी पतली निकली कि उसे ३० सीटे पाकर तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा। पार्टी का सफ ाया होने से सदमे में आये दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष अजय माकन व दिल्ली के प्रभारी पीसी चाको ने अपने पदों से इस्तीफ ा दे दिया। हार दर हार से पस्त कांग्रेस आला कमान ने फि लहाल अपनी निगाहे निकट भविष्य में होने वाले कर्नाटक, उड़ीसा व गुजरात चुनाव पर लगा दी है। गोवा में सरकार न बना पाने का ठीकरा पहले से ही इस प्रदेश के प्रभारी पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह पर फ ोड़ा जा रहा था। आखिरकार शनिवार को आला कमान ने उनसे गोवा के साथ कर्नाटक का प्रभार भी छीन लिया। श्री सिंह के लिये राहत की बात यह रही कि फि लहाल उन्हे आंध्र प्रदेश व तेलांगा का प्रभारी बनाये रखा गया। ज्ञात रहे इसके पूर्व आला कमान गुजरात के प्रभारी श्री गुरूदास कामत को हटाकर अशोक गहलोत को कार्यभार सौप चुकी है। संकेत मिल रहे है कि जल्द ही सीमांचल प्रदेश व अन्य राज्यों में भी फे रबदल किया जायेगा।
उधर डेढ़ माह बाद शनिवार को उत्तर प्रदेश में पार्टी का सूपड़ा साफ होने की समीक्षा की गई पर सिवाय लीपापोती के अंत तक साफ नहीं हो सका कि आखिर ऐसा क्यों कर हुआ कि पार्टी बीते चुनाव से भी नीचे आ गई।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि दरअसल न ही कांग्रेस आला कमान न ही कांग्रेस के चारण के स्थिति में आ चुके रणनीतिकार सच स्वीकारने व सच कहने की हिम्मत जुटा पा रहे है। अलवत्ता यदि कभी कार्यकर्ताओं के बीच सच्चाई की प्रतिध्वनि सुनवाई भी देती है तो सिवाय हवा में उड़ाने या दबाने के उस पर कभी गौर ही नहीं किया जाता है।
उपरोक्त सूत्रों का कहना है कि कौन नहीं जानता कि उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड पंजाब व गोवा के चुनाव का नेतृत्व कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाधी ने किया था। लगभग सभी प्रत्याशियों का चयन भी उन्होने स्वयं किया था। यह सच भी सामने आ चुका है कि उन्ही के हरी झंडी दिखाने पर ऐन मौके पर कांग्रेस ने सपा से चुनावी गठबंधन किया था। ऐसी स्थिति में जब सभी निर्णय स्वयं श्री गांधी ने लिया था तो हार की जिम्मेदारी भी तो उन्हे आगे बढ़कर खुद ही लेनी चाहिये। बेहतर होता वह खुद ऐसा करते और पार्टी अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी से आग्रह करते कि उनकी जगह पार्टी के उपाध्यक्ष का पद भी किसी वरिष्ठ अनुभवी नेता के हवाले कर दिया जाय। अलावा इसके एक ऐसी कमेटी गठित की जाय और उन नेताओं को शामिल किया जाय जो सच बोलने की हिम्मत रखते हो, जिनका वास्तव में पार्टी के प्रति समर्पण रहा हो। कहीं और अधिक बेहतर होगा यदि श्रीमती गांधी किसी कद्दावर वरिष्ठ नेता को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दे।
निश्चित ही इससे कार्यकताओं में अच्छा संदेश जायेगा और उनमें नये जोश का संचार होगा तो आमजन को भी लगेगा कि कांग्रेस आला कमान अपने पुत्र को स्थापित करने की बजाय वास्तव में कांग्रेस के वास्तविक उत्थान के प्रति न केवल चिंतित है वरन् इस दिशा में वो यथेष्ठ प्रयत्न शील भी है।

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