लेखक परिचय

ललित कौशिक

ललित कौशिक

ललित कौशिक एक पत्रकार हैं और कई समाचार पत्रों में काम कर चुके हैं, जैसे "हरिभूमि", "आज समाज" और "उत्तम हिन्दू"

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पूरा देश ख़ुशी के मारे झूम रहा था, चारों ओर नई सुहावनी सुबह के गीत गुनगुनाए जा रहे थे, झूमे भी क्यों नहीं, गाए भी क्यों नहीं, देश को नई सुबह के साथ आजादी जो मिलने वाली थी । आजादी का उत्सव उसी प्रकार का उत्सव नजर आ रहा था, जैसे 14 वर्ष वनवास काट कर मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्रीराम अयोध्या लोटे थे, जिनके अयोध्या आने की ख़ुशी में पूरी अयोध्या नगरी को सजाया गया था, ठीकउसी प्रकार की खुशियाँ ही इस राष्ट्रीय पर्व में देखने को मिल रही थी । लेकिन तभी बीच देश के शत्रु ने देश में साम्प्रदायिकता का बीज बो दिया, चारों तरफ की ख़ुशी एक साथ मायूसी में बदल गई, जिससे देश के खास से लेकर आम जनमानस तक के हृदय को गहरा अघात लगा ! भारत माता के वक्ष-स्थल पर एक तरह से जुल्मों का आरा चलाकर उसे लहूलुहान किया गया, और देश के शत्रुओं ने देश को धर्म के आधार पर दो टुकड़ों में विभाजित करने का षड्यंत्र चला दिया, जिसके कारण षड्यंत्र इतना भयावह था, कि इस षड्यंत्र ने देश के अंदर लोगों को रक्त की होली खेलने पर मजबूर कर दिया और दो सत्ता के लालची लोगों ने देश को दो हिस्सों में बाँट दिया, एक भाग का नाम हिन्दुस्थान और दूसरे भाग का नाम पाकिस्तान रखा गया, बल्कि दोनों देशों का बंटवारारिलीजन के आधार पर किया गया था । पाकिस्तान में जितने भी हिन्दू परिवार थे, उनको गाजर मूली की तरह काटा जाने लगा , माता, बहनों की इज्जत को सरेआम बेआबरू किया जाने लगा ओर पाकिस्तान में जिन हिन्दुओ की निर्मम हत्या की गई उनके शवों को ट्रेनों में लादकर भारत भेजा जाने लगा । उसके बाद भारत में भी इसका प्रतिकार किया गया । इस दौरान देश को अपनी माँ की भांति प्यार करने वाले कई संगठन इस हिंसा से देश के लोगों को बचाने में लगे, जिनमें एक राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय, स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री माधव सदाशिव राव गोलवलकर ने देश भर में लग रहे, संघ के संघ शिक्षा वर्गो को बीच में ही छोड़ कर लोगो की सहायता करने की बात कही, बस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने इस सूचना को सुनते ही सोचना बंद कर दिया ओर दिन देखा न रात देखी बस लग गए, लोगो की सहायता के लिए, इस बंटवारे के दौरान काफी संघ के कार्यकर्ताओं ने समाज की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहूतियाँ देकर भी समाज का रक्षण किया ।
वहीं भारत जब स्वतंत्र हुआ तब देश में छोटी-बड़ी565रियासतें थीं ।जम्मू-कश्मीर भी उन 565में से एक रियासत थी और महाराजा हरि सिंह उसकेशासक थे। इन सभी रियासतों को भारत में विलय कराने का श्रेय प्रथमगृहमंत्री लौहपुरुषसरदार वल्लभभाई पटेल को हीजाता है। जूनागढ़, हैदराबाद, भोपाल जैसे पेचीदा मसले भी सरदार पटेल ने बड़ीकुशलता से और जरुरत पड़ने पर बल प्रयोग कर सुलझाए थे। जम्मू-कश्मीर का मसलाभी वे बड़ी आसानी से सुलझा सकते थे। पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस मसले को अपनेहाथों में ले लिया और हमेशा के लिए भारत के लिए एक सिरदर्द बना कर छोड़ दिया।
नेहरू को कश्मीर के नेता शेख अब्दुल्ला सेबहुत अधिक स्नेह था और अब्दुल्ला के हाथ में राज्य की धुरी सौंपने कीयोजना नेहरू की थी।नेहरू ने शेख अब्दुल्ला के प्रतिस्नेह के चलते कश्मीर मसले को सरदार पटेल से छीना और उसे सुलझाने के बजायऔर भी पेचीदा बना दिया। महाराजा हरि सिंह को नेहरू की इस मंशा का पता चलगया था,इसलिए वे उनके रहते भारत के साथ विलय को लेकर चिंतित थे।
इधर पाकिस्तान सरकार जिन्ना के नेतृत्व में महाराजा पर दबाव बना रही थी, ताकिवे उनके राज्य को पाकिस्तान के साथ मिला दे। पर महाराजा उसके लिए भी तैयारनहीं थे। क्योंकि उनको राज्य की हिन्दू प्रजा की चिंता थी।
पाकिस्तान नेयुद्ध का सहारा लेकर कबाइलियोंको कश्मीर पर आक्रमण करने के लिए उकसाना शुरू कर दिय​|​अब महाराजा खुद को बड़ी मुश्किल में फंसा हुआ पा रहे थे ​|
ऐसे नाजुक दौर में महाराजा की सहायता के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघसामने आया और महाराज को यह समझाने का सफल प्रयास किया कि भारत केसाथ राज्य का विलय करने में भी उनकी और राज्य की जनता की भलाई है।राज्य की स्थिति बेहद नाजुक हो चुकी थी।सरदार पटेल और महात्मा गांधी ने भीमहाराजा को मनाने का प्रयास किया, पर महाराजा नेहरू की अधिसत्ता को माननेके लिए तैयार नहीं थे। ऐसी स्थिति में गृहमंत्री सरदार पटेल ने राज्य केप्रधानमंत्री मेहरचंद महाजन के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केतात्कालीन सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर जिनको श्रीगुरुजी भी कहा जाता था, को सन्देश भेजा कि वे महाराजा को भारत में विलय के लिए मनाने का प्रयास करें।
श्रीगुरुजी ने, बिना किसी विलम्ब के सरदारका प्रस्ताव स्वीकार किया और अपने सारे कार्यक्रम रद्द कर, वे नागपुर सेदिल्ली होते हुए सीधे श्रीनगर पहुँचे। मेहरचंद महाजन और पंडित प्रेमनाथ डोगरा जी के मध्यस्थता से श्रीगुरुजी और महाराजा हरि सिंह के बीच बैठक तय हो गई।
26 अक्टूबर 1947 को, महाराजा हरि सिंह नेभारत के साथ विलय के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिए और इस प्रकार जम्मू-कश्मीर की रियासत भी सम्पूर्ण रूप से भारत का एक अभिन्न हिस्सा बनगई। महाराजा हरि सिंह को मनाने में संघ के सरसंघचालक श्री गुरूजी ने इस प्रकार बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसके बाद किस प्रकार संघ के स्वयंसेवकोंने श्रीनगर के हवाई अड्डे की रात-रात में मरम्मत कर भारतीय सेना के उतरने की व्यवस्था की; किस प्रकार अपनी जान पर खेलकर संघ के निडर स्वयंसेवकों ने दुश्मन की सीमा में गिरे गोला-बारूद के बक्से उठाकर अपनी सेना के शिविर में पहुँचाये,जो लोग संघ पर आए दिन उंगलियाँ उठाते हैं, वे जान लें कि संघ के कारण ही जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा बना है। संघ के स्वयंसेवकों ने जो बलिदान दिए उसके कारण पाकिस्तान के जम्मू-कश्मीर को जितने के मनसूबे कामयाब नहीं हो सके।

 

2 Responses to “जम्मू-कश्मीर, लौहपुरुष और संघ ”

  1. अजय मित्तल

    यह कहना गलत है कि गांधीजी ने कश्मीर के महाराज को भारत में विलय हेतु प्रेरित किया . वास्तविकता उलटी है . गाँधी कश्मीर को पाकिस्तान में चाहते थे . अगस्त 1947 के प्रारंभ में हरिसिंह जी से मिलकर उन्होंने इसी बात का दबाव बनाने की कोशिश की थी . जगमोहन की पुस्तक My Frozen Turbulence in Kashmir में लिखा है कि गांधीजी ने महाराज को समझाया कि अपनी जनता की इच्छा के खिलाफ न जाएँ . The Tribune (3 अगस्त, 1947) में बिलकुल साफ़-साफ़ reported है कि गाँधी ने पाकिस्तान में मिलने की सलाह दी .
    यह भी असत्य है कि नेहरु विलय हेतु तैयार थे, पर महाराज नहीं . हरिसिंह ने अपने उप-प्रधान मंत्री रामदास बत्रा को कई बार दिल्ली भेजकर विलय की कोशिश की. पर नेहरु बात सुनने को ही तैयार न थे . उनकी pre-condition थी कि सबसे पहले शेख अब्दुल्ला को महाराज प्रधानमंत्री बनाये. बातें बाद में होंगी . नेहरु-गाँधी पूरी तरह माउंटबेटन और ब्रिटिश सरकार की भाषा बोल रहे थे . अब्दुल्ला नेहरु की शह पर 1946 में “महाराजा कश्मीर छोडो” आन्दोलन चलाकर जेल जा चुका था . नेहरु स्वयं कुछ दिन कश्मीर जेल में रहे थे .

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      संघ के सिंध और पंजाब के, १९४७ के ग्रीष्म कालीन, ओ. टी. सी. (संघ सिक्षक शिविर) को बीच में ही खतम कर के, गुरुजी ने स्वयम्सेवकों को सिंध, पंजाब (भावि पाकिस्तान ) में बसे हिन्दुओ को सहायता करनेका काम सौंपा था। उन्हें यह अनुमान था, कि, हिन्दुओं को बचाना पडेगा।
      सारे हिन्दू सुखरूप भारत पहुँचाने में संघके करीब करीब ५०० स्वयंसेवक शहीद हुए थे। गुरुजी ने स्वयम्सेवकों को हिन्दू को भेजने के बाद, अंतमें भारत आने की आज्ञा दी थी। गुरुजी इन ५०० स्वयंसेवकों को खोने का दुःख कभी भूले नहीं थे।
      यह ऐतिहासिक तथ्य *ज्योति जला निज प्राण की* नामक, माणिक चंद्र वाजपेयी और श्रीधर पराडकर लिखित ५६५ पृष्ठों की पुस्तक में मिलेगी।
      जिस किसी ने पढी हो, उन से सत्त्यापन का अनुरोध।
      गुरुजी कहा करते थे, **मेरे ५०० वीर कभी लौट नहीं आए।**
      बहुत सारी सामग्री है पुस्तक में। किसी लेखक ने उस पुस्तक की समीक्षा करने की आवश्यकता है।

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