अंधभक्ति का दुष्परिणाम, विवश प्रशासन व पीड़ितजन 

यह अत्यंत दुखद है कि गुरु-शिष्य परंपरा हमारी संस्कृति का अटूट अंग होने से प्रायः सामान्य भोले-भाले व अशिक्षित या कम शिक्षित ही इस परंपरा में अधिक सक्रिय होते रहें है। समाजिक जीवन में पुरुषों की जीवनयापन के लिये धनोपार्जन की अधिक व्यस्तता के कारण अधिकांश महिलाएं ही गुरु बना कर उनसे भजन-कीर्तन व सत्संग आदि से जुड़ी रहती है। इसप्रकार सामान्य लोग अपने को धर्म कार्य से जोड़ कर संतुष्टि पाते है। अधिकांशतः महिलाये एक-दूसरे के संपर्क में आकर किसी भी प्रचलित या प्रसिद्ध  “गुरु” की शिष्या सरलता से बन जाती है। इसके अतिरिक्त परिवार सहित भी इस परंपरा को अपनाया जाता आ रहा है। ‘गुरु’ बनाते समय ऐसे सामान्य लोगो में तथाकथित गुरु के चरित्र, आचरण, योग्यता, आध्यात्मिक स्तर व धर्मग्रंथो के ज्ञान आदि के प्रति कोई प्रश्न उत्पन्न ही नही होता ? फिर भी इन तथाकथित धर्मगुरुओं के प्रति अत्यधिक आकर्षण बढ़ता जा रहा है और भोले भाले लोग बिना सोचे समझे इस अंधश्रद्धा भक्ति में जुड़ कर अपने को धन्य समझते है। परंतु क्या इस प्रकार भेड़-चाल से शिष्य बनना सार्थक हो सकेगा ? यहां एक बात अवश्य स्पष्ट है कि इस पद्धति से कुछ गुरुओं के पास अकूत सम्पत्ति एकत्रित होने से भी अनेक सम्पन्न व अभावग्रस्त लोग इनके अंधभक्त बन जाते है। जैसे जैसे यह अंधभक्ति बढ़ती जाती है वैसे वैसे ऐसे गुरुओ में अहंकार के साथ साथ मानसिक दुर्बलता के कारण समाजिक बुराइयां भी आ जाती है।
ऐसे अनेक धर्मगुरु पहले भी समाजिक भावनाओं का दोहन करते रहें है और अब बाबा रामरहीम भी ऐसे ही गुरुओं की श्रेणी में आ गये है। उनके दुश्चरित व विलासतापूर्ण जीवन को अपराध की श्रेणी में लाकर  रामरहीम के कुकर्मों से एक पीड़ित साध्वी ने अपने 17-18 वर्षो की घुटन से मुक्ति पाकर उन लाखों-करोड़ों लोगों पर भी उपकार किया है जोकि नासमझी में बाबा के अंधभक्त बने हुए है। जिस प्रकार  2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल जी को अपनी लगभग 1999 से 2002 तक के शारीरिक उत्पीडन आदि की व्यथा लिख कर गुमनाम पत्र द्वारा पीड़िता ने न्याय की आशा की थी वह अब सार्थक हो रही है। इसके लिये सीबीआई के तत्कालीन अधिकारी श्री एम.नारायण भी बहुत ही बधाई के पात्र है।परंतु यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण हुआ कि सीबीआई कोर्ट के निर्णय आने के बाद अंधभक्तो ने हिंसात्मक उपद्रव करके वातावरण को भयावह बनाने में कोई कसर नही छोड़ी और शासन-प्रशासन बेबस हो गया।
ऐसे में यह अत्यंत विचारणीय है कि जब ‍राजनैतिक इच्छा शक्ति के अभाव में पुलिस सहित अन्य सुरक्षाकर्मी भी असहाय हो जाते है तो भीड़ के उपद्रवों को रोक पाना भी कठिन हो जाता है। यह बड़ी कठिन संविधानिक व्यवस्था है कि सुरक्षाबलों को जब तक सत्ता का सुख भोग रहें राजनेताओं का आदेश नही मिलेगा तब तक वे आगजनी व तोड़फोड़ और अन्य हिंसक कार्यवाही करने वाली भीड़ पर कोई भी कार्यवाही न करने के लिये बाध्य है।‍ क्या भविष्य में जब कभी आधुनिक हथियारों से लैस जिहादियों की भीड़ किसी भी स्थान पर कभी भी कोई आतंकी हमला करेगी तो सामान्य नागरिक अपने जान-माल की सुरक्षा कैसे कर पायेगा ?
अतः ऐसी स्थिति में जैसा कि पंचकूला आदि अनेक नगरों में बाबा गुरमीत सिंह (रामरहीम) को साध्वी के यौन शोषण में न्यायालय द्वारा दोषी घोषित किये जाने के बाद बाबा के भक्तों की भीड़ ने जिस प्रकार एकजुट होकर हिंसा का नंगा नाच करके अराजकता फैलाई है और प्रशासन आम नागरिकों के जान-माल की सुरक्षा में असमर्थ रहा तो असहाय सामान्य नागरिक क्या करें ?
इसे शासन-प्रशासन की भूल या गलती कहना वास्तविकता को छिपाना होगा। जब यह सुनिश्चित था कि बाबा गुरमीत के समर्थक (अंध भक्त) हज़ारो-लाखों की संख्या में उसके मुख्य कार्यालय सिरसा के आश्रम में एकत्रित हो गये और यह संभावना भी थी कि  विपरीत परिस्थितियों में ये अंधभक्त सामान्य क्षेत्रो, मार्गो व बाज़ार आदि में हिंसा भडका कर जान-माल की भारी हानि अवश्य पहुचायेंगें। इसीलिए सरकार ने धारा 144 लगाई व जगह जगह नाकेबंदी भी की थी। परंतु क्या यह सब दिखावा रहा। किसी भी अधिकारी द्वारा  सीआरपीसी की धारा 144 के उल्लंघन पर कोई प्रतिक्रिया नही देखी गई।क्या उन्हें इस धारा के नियमों का ज्ञान नही जिसमें स्पष्ट है कि 4 व्यक्ति से अधिक एक साथ कही भी कोई एकत्रित नही हो सकता और न ही कोई सभा या जुलूस आदि निकाला जा सकता ? लगभग  800 गाड़ियों का एक भारी भरकम जत्था जब जुलूस के रुप में आरोपी के साथ चलें तो क्या सारा प्रशासन कबूतर के समान आंख बंद करलें और आने वाले संकट को भगवान भरोसे छोड़ दें।
क्या सत्ताधारी राजनेताओं को बाबा रामरहीम जैसे आधुनिक व भोगविलासी गुरु के चरित्र और चाल पर कोई संदेह ही नही था ? क्या प्रशासन कठोरता न बरतते हुए अपनी चुनावी जीत का संभावित कारण बनें बाबा का कोई ऋण तो नही उतार रहें थे ? यह विचित्र है कि 3-4 दिन से ही सुरक्षा के प्रबंधों की भरपूर तैयारी का निरंतर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर प्रचार होता रहा परंतु अवसर आने पर बिना गोली की बंदूक बन कर रह गया । जिस कारण ऐसी संकटकालीन मानवीय आपदा में सामान्य नागरिको के जान-माल की सुरक्षा भी असंभव हो गई । परिणामतः  जैसी संभावना थी पंचकूला सहित देश के 4-5 राज्यों में जहां जहां बाबा के अंधभक्तो के ठिकाने वहां वहां हिंसा का नंगा नाच होने से अभी तक के समाचारो के अनुसार अरबो की संपत्ति स्वाहा हुई और 30-40 लोगों की जीवन लीला भी समाप्त हुई है। जबकि 150 के लगभग निर्दोष नागरिक घायल भी है।
यह दुःखद है कि सत्ता भोगी अपने उत्तरदायित्व का संविधान के अनुसार पालन क्यों नही करते ? विशेषतौर पर जब हरियाणा में बार बार कानूनी व्यवस्था को ठेंगा दिखाया जा रहा हो तब भी त्रुटि होती रहें तो यह क्षमा योग्य कैसे हो सकती है ?  पूर्व में हुए जाट आंदोलन के समय भी सरकार भयावह हिंसक आंदोलन के आगे विवश हो गई थी। उससे पहले एक और ढोंगी रामपाल का भी प्रसंग चुनौती भरा था।
निसंदेह आज आम नागरिक अपनी सुरक्षा के प्रति सर्वथा सरकार के भरोसे निश्चिंत है। परंतु ऐसी परिस्थितियों में जब शासन व प्रशासन अपने अपने स्वार्थों के वशीभूत अपना दायित्व न निभाये तो आम नागरिक क्या करें ? क्या भविष्य में हिंसात्मक व आतंकवादी गतिविधियों से सुरक्षित होने के लिए सामान्य नागरिको को कोई प्रशिक्षण नही लेना चाहिये ? अतः आत्मरक्षा में सक्षम होने के लिये अनिवार्य रुप से शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण लेना सामान्य नागरिको की प्राथमिकता होनी चाहिये । साथ ही संगठित होकर मरो या मारो की स्थिति में हथियार उठाने की क्षमता होनी चाहिये। हमको सोचना होगा कि जब दुर्जन एकजुट होकर हमको क्षति पहुचा सकते है तो हम क्यों नही अपनी आत्मरक्षा के लिए संगठित होकर उनके विरुद्ध कार्य करें ? ऐसा करने के लिये सभी देशवासियों को हमारे देश का संविधान भी अधिकृत करता है।

विनोद कुमार सर्वोदय

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